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संसार के सभी धर्म-सम्प्रदायों ने मनुष्य जीवन को एक अमूल्य, अनुपम उपहार माना है। सनातन धर्म ने तो इसे ईश्वर का राजकुमार कहकर पराकाष्ठा ही कर दी है, लेकिन आज संसार के करोड़ों-अरबों लोगों में से कितने मानव जीवन की इस गरिमा को जानते हैं, मानते हैं तथा तदनुसार जीवनयापन करते हैं। यह एक विचारणीय गंभीर प्रश्र हम मानव जाति के सामने खड़ा है। आखिर इस गरिमा को हम क्यों नहीं पहचान पाते।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है मनुष्य तभी तक मनुष्य है, जब तक वह पशु प्रवृत्ति से ऊपर उठने  के लिए संघर्ष करता रहता है। भगवान् रामकृष्ण परमहंस ने तो आह्वान करते हुए कहा है-मनुष्यो! जिओ और जीने योग्य जीवन जिओ, ऐसी जिन्दगी बनाओ, जिसे आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। सन्त तिरुवल्लुवर ने भी इसी बात को पुष्ट करते हुए कहा है-भगवान् की इच्छा है कि मनुष्य उसकी इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक सुखी, अधिक समृद्ध और अधिक समुन्नत बनाने में उसका हाथ बँटाए अपनी बुद्धि क्षमता और विशेषता से अन्य पिछड़े हुए जीवों की सुविधा का सृजन करे और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरते, जिससे इस संसार में सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।
उपर्युक्त सोपान तक पहुँचने का सरल मार्ग है सतत जागरूकता। अर्थात् एक ऐसी तत्परता जो निरंतर यह खोजती रहे कि कहाँ पर कुछ भलाई की जा सकती है? प्रतिक्षण और अधिक उदात्त बनने और अपनी आत्मा की पवित्रता विकसित करने के लिए यदि प्रयत्नशील हैं, तब यह कहा जा सकता है कि आपके जीवन की दिशा सही है, लेकिन कहीं-कहीं भटकाव सा आ जाया करता है। यह भटकाव है मनुष्य के विचारों का। संसार में जितने भी मनुष्य हैं, उनके प्रत्येक क्रियाकलापों में विचारों की ही झलक परिलक्षित होती है। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के अनुसार मनुष्य का जन्म तो सहज हो जाता है, लेकिन मनुष्यता प्राप्त करने के लिए उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, अक्सर लोग इन कठिनाइयों से डरकर जीवन की उपेक्षा करने लगते हैं। इसमें अपना ही नहीं सीधे परमात्मा का अपमान है। परमात्मा की ही उपेक्षा है, क्योंकि  मनुष्य जीवन एक ईश्वरीय प्रसाद-उपहार है। अतः उसका अनादर करना परमात्मा का अपमान करना है। जीवन खोकर जीवन का मूल्य समझने वालों को युगों तक पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।
स्वामी विशुद्धानन्द भारती ने कहा कि जो सुविधाएँ इस शरीर में प्राप्त हैं, वे अन्य किसी शरीर में नहीं है। जो अवसर अन्य किसी जीवधारी को प्राप्त न हो, उसे मनुष्य को प्रदान करते हुए भगवान् ने कुछ विशेष उत्तरदायित्व भी इसे सौंपे हैं। उचित यही है कि वह उनकी अवहेलना न करे। महर्षि रमण ने उन उत्तरदायित्वों को स्पष्ट करते हुए बताया है कि  ओछी आकांक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठकर यदि इस विश्व में अपनी आत्मा का दर्शन किया जा सके, औरों को सुखी बनाने के लिए भी यदि अपने सुख की तरह प्रयत्नशील रहा जा सके, तो ईश्वर की प्राप्ति किसी को भी हो सकती है। इसे अध्यात्म की भाषा में आत्म-शोधन एवं आत्म-निर्माण का संयोग कहते हैं। आत्म निर्माण अर्थात् जिन कार्यों से आत्मा को सुख-संतोष मिले। अगर कहा जाय तो जनसेवा ही है, जिससे परम सुख संभव है। महापुरुषों, समाजसेवियों ने हर साधना का नियोजन भगवान् की इस बगिया पर  न्योछावर किया और लाभ उठाया। अगर हम भगवान् से प्यार करते हैं, तो उसकी इस वाटिका से भी उतना ही प्यार आवश्यक है।
ऐनीबेसेण्ट ने कहा है- अपनी रचना से सभी को प्रेम होना स्वाभाविक ही है और जो रचना जितनी ही अधिक उत्कृष्ट होती है, उससे उतना ही अधिक प्रेम भी होता है। इसकी कृतज्ञता स्वरूप मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह परमात्मा की कृपा और उसके व्यक्तित्व का उसी के अनुरूप प्रतिनिधित्व भी करे। अब जो ऐसा नहीं करता है, वह उसकी कला को अपमानित करता है। यह उसकी कृपा के प्रति कृतघ्रता है और उसका कोपभाजन बनना है।
ईश्वर का पुत्र अपने लिए नहीं, ईश्वर के लिए ही जी सकता है। इसके अतिरिक्त उसके पास और दूसरा मार्ग ही क्या है? यदि अपने लिए ही जिया गया, तो मनुष्य में पशुओं की अपेक्षा श्रेष्ठता कैसे बनी रहेगी। हमें जीवन की सफलता के लिए, जीवन की समग्रता के लिए पशुता से निकलकर परमार्थ - परोपकार जैसे गुणों का वरण करना होगा। यह कठिन होकर भी सबके लिए स्वीकार्य होना चाहिए। समर्थ गुरु रामदास ने कहा है- परोपकारी सबका हृदय जीत लेता है। सभी का सहयोग उसे मिलता है। शिवा जी ने बहुत थोड़ी ताकत लगाकर भी बहुत ज्यादा विजय पाई है, क्योंकि उसे भगवान् का आशीर्वाद मिला है और जन-सामान्य मनुष्य का प्यार और सहयोग भी प्राप्त हुआ है। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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