img


तथा कथित भक्तजनों में से कुछ सम्पदा पाना या सफलता माँगते हैं, कुछ स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि की फिराक में रहते हैं। कइयों पर ईश्वर दर्शन का भूत चढ़ा रहता है। माला घुमाने और अगरबत्ती जलाने वालों में से अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है। उपासना उतने तक सीमित समझी जाती है। जो इस विडम्बना में से जितना अंश पूरी कर लेते हैं। वे अपने को भक्तजन और बदले में भगवान् ने उनकी मनोकामना पूरी नहीं की तो हजार गालियाँ सुनाते हैं। कई इससे भी सस्ता नुस्खा ढूँढ़ते हैं। वे प्रतिमाओं की, सत्ता की दर्शन झाँकी करने भर से ही यह मानने लगते हैं कि इस अहसान के बदले ये लोग अपना मनोरथ पूरा करेंगे। बुद्धिहीन स्तर की कितनी ही मान्यताएँ समाज में प्रचलित है। लोग उन पर विश्वास भी करते हैं और अपनाते भी है। पर वस्तुतः रोया है नहीं। यदि ऐसा होता, तो यह मण्डली अब तक कब की आसमान के तारे तोड़ लाने में सफल हो गयी होती।
समझा जाना चाहिए कि जो वस्तु जितनी महत्त्वपूर्ण है, उसका मूल्य भी उतना ही अधिक होना चाहिए। इसमें सबसे प्रमुख पाठ है सच्ची उपासना, सही जीवन साधना एवं समष्टि की आराधना। यही वह मार्ग है जो व्यक्ति को नर मानव से देवमानव, ऋषि, देवदूत स्तर तक पहुँचाता है।
जीवन धारण के लिए अन्न, वस्त्र और निवास की आवश्यकता पड़ती है। इनमें एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। आत्मिक प्रगति के लिए उपासना, साधना और आराधना इन तीनों के समान समन्वय की आवश्यकता पड़ती है। उपासना का अर्थ है पास बैठना। यह वैसा नहीं है, जैसा कि रेलगाड़ी के मुसाफिर एक दूसरे पर चढ़ बैठते हैं। वरन् वैसा है जैसा कि दो घनिष्ठ मित्रों को दो शरीर एक प्राण होकर रहना पड़ता है। सही समीपता ऐसे ही गंभीर अर्थों में ली जानी चाहिए। समझा जाना चाहिए कि इसमें किसी को किसी के लिए समर्पण करना होगा। चाहे तो भगवान् अपने नियम, विधान, मर्यादा और अनुशासन छोड़कर किसी भजना नन्दी के पीछे-पीछे नाक में नकेल डालकर फिरे और जो कुछ भला-बुरा वह निर्देश करे, उसकी पूर्ति करता रहे। अन्यथा दूसरा उपाय यही है कि भक्त को अपना जीवन भगवान् की मर्जी के अनुरूप बनाने के लिए आत्म समर्पण करना होगा।
आत्मोत्कर्ष के लिए सर्वप्रथम उपासना का तत्त्वदर्शन और स्वरूप समझना होगा। भगवान् हमारी मर्जी पर नहीं नाचेगा। हमें ही भगवान् का भक्त बनना और  उसके संकेतों पर चलना होगा। ऐसे करने पर तद्रूप होने का लाभ प्राप्त होगा। जैसे ईंधन की हस्ती दो कौड़ी की होती है। पर जब वह अग्रि के साथ जुड़ जाता है, तो उसमें सारे गुण अग्रि के आ जाते हैं। आग ईंधन नहीं बनती, ईंधन को आग बनना पड़ता है। अस्तु, जो भगवान् के समीप बैठना  चाहे, वह उसी का निर्देशन अनुशासन स्वीकार करें। उसी का अनुयायी सहयोगी बने। उपासना क्रिया प्रधान नहीं, श्रद्धा प्रधान होनी चाहिए। भगवान् की सत्ता कारण शरीर में श्रद्धा, सूक्ष्म शरीर में प्रज्ञा और स्थूल शरीर में निष्ठा बनकर प्र्रकट होने लगे। समझदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के रूप में प्रज्ञा का समन्वय आत्म-चेतना की गहराई में होना चाहिए। यदि भाव चेतना में प्रज्ञा का अवतरण हुआ है, तो उपासना फलवती हो चली समझना चाहिए।
दूसरा पक्ष है जीवन साधना का जीवन साधना प्रकारान्तर से संयम साधना है। संयम के अंतर्गत इन्द्रिय संयम, सयम संयम, विचार संयम और अर्थ संयम आदि प्रमुख है। इन्द्रिय संयम में जहाँ आहार-विहार को महत्त्व दिया जाता है, वही सही प्रबंधन अथवा व्यवस्थित दिनचर्या समय संयम के तहत आती है। विचारों का कर्म से और कर्म का व्यक्तित्व से संबंध है। अतः विचार संयम का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिए। जबकि अर्थ का सही नियोजन अर्थात् शरीर तथा परिवार के लिए इतना खर्च करें, जिससे कम में काम चले। दैवी उपलब्धि प्राप्त करने के लिए शुद्ध चरित्र और पात्रता अभिवर्धन की  आवश्यकता है। इसी का नाम जीवन साधना है। इसके लिए अपने गुण, कर्म व स्वभाव में सात्विकता का समावेश करने हेतु आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म विश्वास की दिशा में बढ़ना है। 
तीसरा पक्ष है- आराधना। आराधना अर्थात्- लोकमंगल के लिए निरत रहना। अपना समय, श्रम, धन एवं   प्रतिभा का अंश लोकमंगल के निमित्त नियोजित करना। लोकमंगल का परमार्थ ऐसा है, जिसका प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता है। आत्मसंतोष, लोकसम्मान, दैवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला यह ऐसा व्यवसाय है, जिसमें जिसने भी हाथ डाला कृतकृत्य होकर रहा है। मनुष्य के चिंतन में उपासना चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में यदि  पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय, तो अध्यात्म-अवलम्बन का प्रतिफल व्यक्ति के व्यक्तित्व को महामानव, देवमानव, ऋषितुल्य बनने के रूप में अवश्य प्राप्त होगा। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....