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बहुत से लोग परिस्थितियों का रोना लेकर बैठ जाते हैं, और अपनी कार्य करने की असमर्थता जताने लगते हैं, जो अनुचित है। परिस्थितियाँ ही अनुकूल हो गयीं और हमने अपने कर्त्तव्य पूरे कर लिये, तो इसमें किसी वाहवाही की बात नहीं है। परिस्थितियाँ तो सदैव प्रतिकूल ही रही है। मनुष्य ने अपनी मनः स्थिति को परिस्थितियों  के अनुरूप ढाला है, तब परिस्थितियों का सामना किया है। हमारा इतिहास बताता है कि जितने भी महापुरुष हुए हैं, सबने अपने जमाने की तकलीफों पर पुरुषार्थ एवं पराक्रम से पार पाया है और यशस्वी कीर्तिमान स्थापित किये हैं। यदि परिस्थितियाँ किसी को रोक पायी होतीं, तो आज तक जितने श्रेष्ठ कार्य हुए हैं, कभी भी संभव न हो पाते।
मनुष्य के जीवन में विपरीतता एवं विरोधाभास उसकी कर्त्तव्यनिष्ठा एवं लगनशीलता की परीक्षा लेने आते हैं, उसको कर्त्तव्य पथ से च्युत करने के लिए नहीं। निर्बल प्रकृति के लोग ही हैं, जो इन्हें देखकर भयातुर हो जाते हैं और अपने पथ से डिग जाते हैं।
मनुष्यता का निर्धारण उसके कर्त्तव्यनिष्ठा पर हुआ है, जो व्यक्ति कर्त्तव्य पर विश्वास रखता होगा, वह आत्म निर्भर होगा तथा आत्मविश्वासी भी होगा। आत्म विश्वासी व्यक्ति को विपत्तियाँ कभी परास्त नहीं कर सकतीं। ऐसे व्यक्ति प्रायः ऊँची-ऊँची कल्पनाएँ नहीं करते हैं। प्रायः अपने साधनों के अनुरूप ही कार्य को हाथ में लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि कार्य को उन्हें स्वयं  के साधन एवं शक्ति से पूरा करना है। दूसरों की सहायता की बात तो वे सोचते भी नहींं। दूसरे को इतनी फुरसत कहाँ है कि वह अपना कार्य छोड़कर किसी की सहायता करने दौड़ेगा। यदि कुछ करेगा, भी तो उससे सहायतार्थी की आवश्यकता का निराकरण बिलकुल ही नहीं हो पायेगा। सफलता तो मनुष्य अपने सहारे ही पासकता है। दूसरों की सहायता पर आधारित तानों-बानों पर कहीं भी महल नहीं बनते देखे गये।
इसके विपरीत पराधीन परावलम्बी व्यक्ति हमेशा दूसरों के आश्वासनों पर एवं दूसरे की कृपा पर जीवन के बड़े-बड़े लक्ष्य निर्धारित करते हैं। इससे उस व्यक्ति के जीवन में एक सबसे बड़ी दुर्बलता घर कर लेती है कि उसे संसार में सारे व्यक्ति अधिक पुरुषार्थी एवं शक्तिवान लगते हैं। 
यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि परावलम्बी व्यक्ति निज के पौरुष एवं शक्ति पर तो अविश्वास करता है और दूसरों के सहारे किसी कार्य को पूरा करने की भूमिका बना लेता है। दूसरों के प्रति गहरी निष्ठा जमा लेता है कि और लोग उसके कार्य में सहायक बनेंगे।
वस्तुतः दूसरों का सहारा लेना भीख माँगने के बराबर है। अपने आत्मबल को भुलाकर जो व्यक्ति दूसरों से अपने दवा की भीख माँगता है, वह वस्तुतः पुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं है। ऐसे कायर व्यक्ति जीवन भर चाटुकारिता करते हैं और दरिद्रता तथा हीन भावना से ग्रसित रहते हैं। इन्हें केवल इतना मयस्सर हो पाता है, जो लोगों की आवश्यकता पूर्ण होने के बाद जूठन के रूप में बचता है।
प्रायः देखने में आया कि समाज के कतिपय गणमान्य एवं धनी कहे जाने वाले व्यक्ति भी परावलम्बन के शिकार होते हैं। यह उनका प्रमाद  कहा जायेगा कि स्वयं के घर के कार्यों को भी वे कर्मचारियों के भरोसे छोड़ देते हैं। इसके परिणाम बड़े कभी-कभी दुःखदायी होते हैं। बड़े-बड़े सेठ अपने मुनीमों के वश में इसलिए रहते हैं, क्योंकि उनमें कार्य कुशलता एवं वाकपटुता का वह अपेक्षित ज्ञान नहीं होता, जिसकी कि आज व्यापार जगत् में आवश्यकता है। इसी तरह शासन में कई उच्च अधिकारी स्वयं निर्णय लेने की असमर्थता के कारण अपने अधीन कर्मचारियों के आश्रित रहते हैं। इससे उनकी स्वतंत्र सत्ता हमेशा खतरे में पड़ी रहती है, दूसरों पर निर्भरता तो एक कमजोरी है। इस कमजोरी को यदि अपने से नीचे वाला जान लेता है, तो हमेशा अनुचित लाभ लेने की ताक में रहता है।
परावलम्बी व्यक्ति के पास न अपना विवेक होता है, न अपनी बुद्धि। इसलिए किसी भी आपातकालीन स्थिति में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता उसमें नहीं होती है। किसी भी व्यक्ति में जब आत्म निर्णय का गुण नष्ट हो जाता है, तो वह पराधीन व्यक्ति दीन-हीन की तरह दिखाई देता है और समाज में कलंक का भागीदार बनता है। ऐसे लोगों को संसार काटने दौड़ता है।
अतः यह कहा जा सकता है कि जीवन को समृद्ध, निष्कलंक एवं पूर्ण बनाने के लिए हमें परावलम्बी नहीं होना चाहिए। पराश्रितता को त्यागकर श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए अग्रसर होना चाहिए। क्योंकि पराधीन सपनेहु सुख नाही। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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