img


जिसने कठिन समय में अपने मानसिक संतुलन को कायम रखने का महत्त्व समझ लिया, जो बुरी घड़ी में भी दृढ़ रहता है, अंधकार में रहकर जो प्रकाश पूर्ण प्रभात की आशा लगाये रहता है, वह वीर पुरुष सहज में ही दुर्गमता को पार कर जाता है। मानसिक संतुलन के कायम रहने से न तो शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट होता है और न मानसिक गड़बड़ी। न तो मित्र उदासीन होते हैं और न शत्रु उबलते हैं, इस प्रकार स्वनिर्मित दुर्घटनाओं से वह बच जाता है।
दार्शनिक चुनिंग हांग कहा करते थे कि कठिनाई एक विशालकाय भयंकर आकृति है, किन्तु कागज के बने हुए सिंह के समान है, जिसे दूर से देखने पर बड़ा डर लगता है, पर एक बार जो साहस करके पास पहुँच जाता है, उसे प्रतीत होता  है कि वह केवल एक कागज का खिलौना मात्र था। बहुत से लोग चूहों को लड़ते देखकर डर जाते हैं, पर ऐसे भी लाखों योद्धा हैं, जो दिन रात आग उगलने वाली तोपों की छाया में सोते हैं। एक व्यक्ति को एक घटना वज्रपात के समान असह्य अनुभव होती है। परन्तु दूसरे आदमी पर जब वही घटना घटित होती है, तो वह लापरवाही से कहता है ऊँह क्या चिंता है, जो होगा सो देखा जाएगा, ऐसे लोगों के लिए वह दुर्घटना स्वाद परिवर्तन की एक सामान्य बात होती है। विपत्ति अपना काम करती रहती है, वे अपना। बादलों की छाया की भाँति बुरी घड़ी आती है और समयानुसार टल जाती है। बहादुर आदमी हर नई परिस्थिति के लिए तैयार रहता है। इस प्रकार का साहस रखने वाले वीर पुरुष ही इस संसार में सुखी जीवन का उपयोग करने के अधिकारी हैं। जो भविष्य के अंधकार की दुखद कल्पनाएँ कर-करके अभी से शिर फोड़ रहे थें, वे एक प्रकार के नास्तिक है, ऐसे लोगों के लिए यह संसार दुःखमय, नरक रूप रहा है और आगे भी वैसा ही बना रहेगा। 
पहले सम्पन्न अवस्था में रह कर पीछे जो विपन्न अवस्था में पहुँचते हैं, वे सोचते हैं लोग हमारा उपहास करेंगे। इस उपहास की शर्म से लोग बड़े दुःखी रहते हैं। वास्तव में यह अपने मन की कमजोरी मात्र है। दुनिया में सब अपने-अपने काम से लगे हुए हैं, किसी को इतनी फुरसत नहीं है कि बहुत गंभीरता से दूसरों का उपहास या प्रशंसा करे। टेढ़ी टोपी लगाकर बाजार से निकलने वाला मनुष्य सोचता है, सड़क पर निकलने वाले सब लोग मेरी टेढ़ी टोपी को देखेंगे और उसकी आलोचना करेंगे, परन्तु यह उसका मानसिक बालकपन मात्र है। सड़क पर चलने वाले अपने काम के लिए चल रहे हैं, टोपी की आलोचना करने के लिए नहीं। कोई किसी की तरफ अधिक ध्यान नहीं देता, यदि देता भी है,तो एक हलकी व्यंग भरी दृष्टि एक क्षण के लिए डालकर दूसरे ही क्षण उसे भूल जाता है। लोगों की इतनी मात्र आलोचना या उपहास के भय से अपने आपको ऐसी लज्जा में डुबाये रहना, मानो कोई अपराध किया हो, मनुष्य की भारी भूल है।
चोरी करने में, बुराई, दुष्टता, नीच कर्म पाप या अधर्म करने में लज्जा होनी चाहिए। यह कोई लज्जा की बात नहीं कि कल दस पैसे थे, आज दो रहे गये, कल सम्पन्न अवस्था थी, आज विपन्न हो गयी,  इसके लिए कोई विज्ञ पुरुष उनका उपहास नहीं करता। मूर्ख और बुद्धिहीनों के उपहास का कोई मूल्य भी नहीं, वे तो हर हालत में उपहास करते हैं। इसलिए हँसी होने के झूठे भय को कल्पना में से निकाल देना चाहिए और जब विपन्न अवस्था में रहने की स्थिति आ जाय, तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
कोई योजना निर्धारित करने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निश्चित कार्यक्रम में विघ्र भी पड़ सकते हैं, बाधा भी आ सकती है। कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। सफलता का मार्ग खतरों का मार्ग है। जिसमें खतरों से लड़ने का साहस और संघर्ष में पड़ने का चाव हो, उसे ही सिद्धि के पथ पर कदम बढाना चाहिए। जो खतरों से डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने से भय लगता है, कठोर परिश्रम करना जिन्हें नहीं आता, उन्हें अपने आपको उन्नति शील बनाने की कल्पना न करनी चाहिए। अदम्य उत्साह, अटूट साहस, अविचल धैर्य, निरंतर परिश्रम, और खतरों से लड़ने  वाला पुरुषार्थ ही किसी को सफल बना सकता है। इन्हीं तत्त्वों की सहायता से लोग उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ते और महापुरुष कहलाते हैं।
इस प्रकार की मानसिक दृढ़ता, आत्म विश्वास और दृढ़ चरित्र की मजबूत नींव हर मनुष्यों को अपनी मनोभूमि में जमानी चाहिए कि बुरे लोगों की बुराई उससे टकरा कर उसी प्रकार विफल हो जाय, जैसे गेंड़े की खाल से बनी ढाल से टकराकर तलवार का बार विफल हो जाता है, तभी जीवन में असली उत्साह उमंग लाना संभव है।

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....