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रात-दिन के आघात, दुःख, असफलता और निराशाओं के कारण जब मानव हृदय रो पड़ता है, उसे अपनी शक्तियों के ऊपर अविश्वास हो जाता है एवं संसार में उसे अपना कोई भी नहीं दिखलाई पड़ता है, उस समय वह अशरण-शरण मंगलमय भगवान् की ओर आकर्षित होता है और संसार में रहते हुए भी संसार की चहल-पहल से दूर, अपने जीवन पक्ष का निर्माण किसी अन्य दिशा में करने की आकांक्षा करते हुए साधना पथ बदल देता है। उस समय इहलौकिक ध्येय न होकर पारलौकिक ध्येय हो जाता है। बस यही पारलौकिक कर्म का कारण है।
किन्तु बहुधा साधना-उपासना करते हुए भी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। समस्त जीवन चला जाता है, इतना ही नहीं अनेकों जन्म इसमें लग जाते हैं, फिर भी उस परब्रह्म की अनुभूति प्राप्त नहीं होती? अशान्तियों और उद्वेगों से छुटकारा भी नहीं मिलता। इस असफलता का कारण क्या है? यह प्रश्र विचारणीय है।
साधना के दो अंग हैं- एक चेष्टा और दूसरा त्याग। आध्यात्मिक साधना का पथ ठीक इसी प्रकार है। एक ओर पूजा, उपासना, साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है, दूसराी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए निवेदित करना पड़ता है। जब सांसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है, तो उस समग्र, अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा।
पूजा, उपासना, नियम, साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिल जायेंगे, तो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते हैं, किन्तु अपने आपको समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते हैं। यही ब्रह्म साक्षात्कार में अवरोध का रहस्य है। 
तुच्छ मनुष्य केवल अपनी शक्ति, सामर्थ्य व साधना के बल पर उस विश्वात्मा के साथ व्यापार नहीं कर सकता, उस अनन्त, अखण्ड, सर्वव्यापक को नहीं जान सकता है। इनके साथ-साथ उसे अपने आपको सम्पूर्ण रूप से उसके लिए निवेदित, उत्सर्ग करना ही पड़ेगा। बिना इसके सिद्धि प्राप्त नहीं होगी और तभी प्रभु मिलन का पथ सहज, सुगम और लघु बन जायेगा। उसकी दिव्य अनुभूति हमारे हृदय में उसी तरह आलोकित हो उठेगी, जैसे प्रातः होते ही सूर्य की प्रकाश किरणों से विश्व भुवन प्रकाशित हो उठता है, उसके लिए कोई कठिन साधना नहीं करनी पड़ती।
उपासना, साधना, पूजा आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है, वरन् अपने आपको उनके लिए समर्पित करना भी है। दिन-प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा-उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासनादि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छा  पूर्ण होती है।
उपनिषद् में कहा है कि ब्रह्म, तल्लक्ष्यमुच्यते ब्रह्म ही उसका लक्ष्य है। तो फिर लक्ष्य को अपनी ओर नहीं खींचा जा सकता, अपने आपको ही लक्ष्य तक पहुँचाना होता है। जिस प्रकार निशाना लगाकर तीर चलाने पर वह सम्पूर्ण रूपेण अपने लक्ष्य के प्रति अपने आपको अर्पण करता है, उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति के लिए उसी में वर्चस्व अर्पण करके तन्मय हो जाना पड़ेगा। सकल अवस्थाओं में सकल कार्यों, उपलब्धि एवं स्थितियों में वही एक मात्र भाव बनाये रखना पड़ेगा।
प्रभु से हमारी दूरी, दुःख, वेदना, क्लान्ति आदि इसलिए है कि हम अपने अहं को मिटा नहीं पाते। यह अहं ही हमारे और उनके बीच में दीवार बन बैठा है,जो अपनी स्वतंत्र सत्ता, शक्ति सामर्थ्य से उस अखण्ड, सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् को पाने की मिथ्या कल्पना करता है और हमें उनसे दूर रखता है। इसलिए अहंकार को उसके उच्च शिखर से उतार कर निम्र स्थिति में ले जाना होगा। सकल विश्व के साथ समानता एवं एकता रखनी होगी। हम अकिंचनता और दीनता में तब प्रभु की कृपा दृष्टि भी पाकर सदा के लिए उनके बन जायेंगे। जब हम सब प्राणिमात्र के साथ बैठते हैं, एकता स्थापित करते हैं, अपने अहंकार को मारकर परमात्मा के हाथों में अपना समर्पण करते हैं, तभी हम उस ब्रह्म की गोद में बैठने के अधिकारी बनते हैं।
ब्रह्म साक्षात्कार के लिए आत्मसमर्पण उस परम सत्ता में करना होगा, अहंकार को मारना होगा। अपने को उस प्रभु के हृदय देश में स्थापित कर उसी की इच्छा से सर्व क्रियाकलाप जारी रखना होगा। अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसमे निवेदित करना होगा। अहंकार, स्वार्थ, तुच्छता, संकीर्णता को त्यागकर नम्रता, शील, सामंजस्य उदारता की साधना करनी होगी। अकिंचन भावना से परमात्म सत्ता को सर्वत्र ही स्वीकार करते हुए भेद, विविधता, ऊँच-नीच की दृष्टि का त्याग करना होगा। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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