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आधुनिक खोजों से सिद्ध हो चुका है कि विभिन्न प्रकार की स्वर लहरियों से रोगियों के रोगों का इलाज किया जा सकता है। इसी कारण संगीत-चिकित्सा को चिकित्सा क्षेत्र में एक नई पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी है। प्राचीनकाल में भी मेघ, मल्हार गाकर भीषण गर्मी में भी घनघोर वर्षा कराई जाती थी तथा राग दीपक गाकर बुझे हुए दीपक को प्रज्वलित कर लिया जाता था। आज भी बहेलिए मृगों को पकड़ने के लिए, सपेरे सर्पों को पकड़ने के लिए वाद्य यंत्रों से स्वर लहरियाँ पैदा करते पाए जाते हैं। प्रयोगों में पाया गया है कि संगीत के प्रभाव से गौएँ दूध बढ़ा देती है। मुर्गियों में अण्डा देने की क्षमता बढ़ जाती है। मछलियाँ संगीत के प्रभाव से जल्दी बढ़ती एवं अधिक बच्चे पैदा करने लगती है। शादी-विवाहों में घोड़ों का नाचना मात्र वाद्य यंत्रों की ध्वनियों के सहारे ही होता है। यहाँ तक कि मेघों की गर्जना के साथ मयूरों का नाच उठना यह सभी ध्वनि विशेष के प्रभावों को ही दर्शाते हैं। 
प्रकृति के अंतराल में तीन शक्तियाँ कार्य कर रही हैं। इन्हीं से सृष्टि संचालन भी होता है, यह हैं-ध्वनि, ताप एवं प्रकाश। इन्हीं की सूक्ष्म तरंगों का कमाल समूचे ब्रह्माण्ड में देखा  जा सकता है। रेडियो, टेलीविजन, टेलेक्स, कम्प्यूटर आदि इन्हीं के द्वारा कार्य करते हैं। एक्स किरणें, लेसर किरणें, रेडियो किरणें आदि आज की दैनिक आवश्यकता बन गयी है। तरंगों की सघनता ही अणु, परमाणु के रूप में परिवर्तित होती हैं। नाना प्रकार के पदार्थों के रूप में इन्हीं तरंगों की सघनता ही होती है। इस प्रकार सार संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि समस्त विश्व ब्रह्माण्ड इन ध्वनि तरंगों का ही खेल है। इसी आधार पर उत्पादन, अभिवर्धन, परिवर्तन की रीति-नीति चलती रहती है। उत्साह, उमंग एवं उल्लास की जड़ में यही ध्वनि तरंगें हैं। इसी प्रकार यह तरंगें मानवीय काया के तीनों शरीरों को भी प्रभावित करती रहती है। 
उपरोक्त विविध तरंगों में ध्वनि तरंगें-स्थूल शरीर को, ताप तरंगें सूक्ष्म शरीर को तथा प्रकाश तरंगें कारण शरीर को प्रभावित करती हैं। सामान्य रूप से यह तरंगे अनायास और अनचाहे रूप में अपना कार्य करती रहती हैं। उनसे उत्पन्न होने वाले प्रभाव भी अनायास एवं अस्त-व्यस्त ही होते हैं,  किन्तु यदि योजनाबद्ध रूप से, वैज्ञानिक पद्धति से इनका उपयोग किया जाय, तो मनोवांछित परिणाम भी प्राप्त किए जा सकते हैं। बेतरतीब ढंग से बिखरी बारूद विस्फोट करके मात्र ध्वनि पैदा कर सकती है, अधिक मात्रा में हो तो थोड़ा बहुत नुकसान भी पहुँचा सकती है, किन्तु यदि थोड़ी बारूद ही हो उसे बंदूक या रायफल की नली में डालकर लक्ष्य साधकर विस्फोट किया जाय, तो उसके प्रभाव से दौड़ने वाली गोली लक्ष्य को तहस-नहस कर सकती है। इसी प्रकार ध्वनि तरंगों का उपयोग स्थूल शरीर को प्रभावित करने के लिए योजनाबद्ध रूप से किया जाय, तो अभीष्ट सुधार, परिष्कार संभव है।
अध्यात्म मार्ग में स्थूल शरीर को प्रभावित एवं जाग्रत् करने के लिए मंत्र योग का, सूक्ष्म शरीर के लिए प्राणयोग का तथा कारण शरीर को जाग्रत एवं प्रभावित करने के लिए ध्यान योग का सहारा लिया जाता है। विभिन्न धर्म साधना पद्धतियों में इन तीनों योगों को किसी न किसी रूप में अपनाया गया है। थोड़ा बहुत अंतर होने पर भी लक्ष्य एक ही है, वह है मानवीय काया के तीनों शरीरों का विकास। 
पदार्थ परिकर को भी ध्वनि तरंगों से प्रभावित, परिवर्तित एवं परिष्कृत किया जा सकता है। इसके लिए मंत्रयोग का प्रयोग किया जाता है। मंत्र में तीन  प्रमुख घटक होते हैं। १.शब्दों का गठन, २. साधक का स्तर, ३. साधक की निष्ठा। इन तीनों का जहाँ कहीं भी समुचित उपयोग किया जाएगा चमत्कारी परिणाम सामने आएँगे। इनमें रंचमात्र की कमी भी सफलता को संदिग्ध बना देती है।
मंत्रों के अक्षरों का क्रमबद्ध गुंथन, ऋषियों मनीषियों ने अंतरात्मा में अनुभव किया था। इसी कारण इन्हें ईश्वरीय वाणी या ब्रह्म वाणी कहा गया है। इसी कारण गायत्री मंत्र, कलमा, बपतिस्मा, णमोंकार मंत्र मणिपदमे हुँ आदि मंत्रों को सनातन नाम दिया गया है।
तंत्र योग में पूरे मंत्र की जगह बीजाक्षरों के प्रयोग पर विशेष जोर दिया गया है। उदाहरणार्थ ऐं, ह्रीं, क्लीं, श्रीं, हुं, फट् आदि बीजाक्षर मंत्र हैं। इनका उच्चारण ईष्ट की प्राप्ति में सुलभता की दृष्टि से जिह्वा, ओष्ठ, कंठ, दाँत, तालु आदि के माध्यम से किया जाता है। इनके उच्चारण से जो समन्वित स्वर बनता है, वह स्थूल शरीर के अंतराल की विशिष्ट ग्रंथियों से टकराकर समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। इनमें से कुछेक को शरीर शास्त्रियों ने हारमोन्स के रूप में जाना समझा भी है। इन उच्चारणों से मात्र काया ही नहीं अंतराल भी प्रभावित होता है। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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