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संसार में आज जो संस्कृति, सभ्यता दिखाई दे रही है, वह सब महामानवों की ही देन है। उनके ही उपदेशों और चरित्र का आश्रय लेकर हम लोग मानवता के चरम लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं। ऐसी विभूतियों को स्वामी विवेकानन्द ने ‘जीवन्त ईश्वर रूप’ कहा है। महात्मा ईसा की गणना भी उन्हीं में से है। मानवता की प्रगति के मार्ग को निष्कंटक बनाने के लिए उन्होंने जो उपेदश दिया, वह आज भी शाश्वत है।
तुम मुझे प्रभु कहते हो, मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो, सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है, वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है। तुम्हारी यह आकांक्षा वस्तुतः अपने आपको प्यार करने, श्रेष्ठ मानने और आत्मा के सामने आत्मसमर्पण करने के रूप में ही विकसित होगी। दर्पण में सुन्दर छवि देखने की प्रसन्नता वस्तुतः अपनी ही सुसज्जा की अभिव्यक्ति है। दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रकट करना उसी के लिए सम्भव है, जो भीतर से श्रेष्ठ है। प्रभु की राह पर बढ़ाया गया हर कदम अपनी आत्मिक प्रगति के लिए किया गया प्रयास ही है। जो कुछ औरों के लिए किया जाता है, वस्तुतः वह अपने लिए किया हुआ कर्म ही है। दूसरों के साथ अन्याय करना अपने साथ ही अन्याय करना है। हम अपने अतिरिक्त और किसी को नहींं ठग सकते। दूसरों के प्रति असज्जनता बरतकर अपने आपके साथ ही दुष्ट-दुर्व्यवहार किया जाता है।
दूसरों को प्रसन्न करना अपने आपको प्रसन्न करने का ही क्रिया-कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँसपेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है? गेंद को उछालकर हम उस पर कोई एहसान  नहीं करते। इसके बिना उसका कुछ हर्ज नहीं होगा। यदि ख्ेालना बन्द कर दिया जाय, तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आंनद से वंचित रहना पड़ेगा।
ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा  तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि वह कुचाल छोड़े। मन को मना लिया, आत्मा को उठा लिया, तो समझना चाहिए कि ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।
गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशांत हो रहा है, उसे शांतिदायक स्थान पर पहुँचा देना, यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःखी और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं, तो समझना चाहिए कि यह कृत्य ईश्वर के लिए, उसकी प्रसन्नता के लिए किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा-सहायता अपनी ही सेवा-सहायता है।
प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है, जो उसी का होकर जीना चाहता है, उसी को भक्त कहना चाहिए, दूसरे तो विदूषक हैं। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है। भक्ति में तो आत्म-समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है?
ईश्वर का विश्वास  सत्कर्मों की कसौटी पर ही परखा जा सकता है। जो भगवान् पर भरोसा करेगा, वह उसके विधान और निर्देश को भी अंगीकार करेगा, भक्ति और अवज्ञा का ताल-मेल बैठता कहाँ है?
हम अपने आपको प्यार करें, ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया, जिसके चिन्तन और कर्तव्य में प्यार बिखरा पड़ा है, ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा। जो दीपक की तरह जलकर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा। हम संसार में ईश्वरीय राज्य के इच्छुक हैं। ईश्वरीय राज्य वह है, जिसमें अन्याय पूर्ण सामाजिक भेदभाव न हो, गरीबों के कष्ट मिटाये जायें, धन सम्पत्ति को उपेक्षा की निगाह से देखा जाय, सब प्रकार के दमनकारी, पाशविक शक्ति पर आधार रखने वाले शासन का अंत हो जाय और सब लोग परस्पर प्रेम भाव से रहने लगें।
महात्मा ईसा की इस दिव्य वाणी को लोगों ने सुना तो सही, पर इसका मर्म समझने वाले थोड़े ही थे और जो उसका अनुसरण कर सकें, उनकी संख्या तो अँगुलियों पर ही गिनी जा सकती थी, पर इन बातों में एक ऐसी सच्चाई भरी है, जिसका लोगों के हृदय पर प्रभाव दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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