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संयुक्त परिवार पद्धति को अब वैज्ञानिकता के आधार पर व्यावहारिक स्तर पर नये रूप से पुनर्जीवित करना ही उचित है। 
संयुक्त परिवार व्यवस्था के विघटन के बाद अभी जो वैकल्पिक संस्थाएँ प्रचलित हुई हैं, उनमें से कोई भी उस व्यवस्था के आधारभूत तत्त्वों की पूर्ति नहीं कर सकी है। वे    आधारभूत तत्त्व हैं- आत्मीयता का विस्तार, समानता, संगठन, सहयोग, सामूहिकता, सुव्यवस्था, शिशुओं की ममतामय स्नेह के साथ निरंतर देखभाल और कार्यों का संयोजित विभाजन जिससे समय तथा श्रम की बचत हो। मानवीय प्रगति के लिए ये नितांत आवश्यक तत्त्व हैं। अतः इनके पोषण, अभिवर्द्धन की आवश्यकता है। 
संयुक्त परिवार के पुराने ढर्रे की विकृतियों से सबक सीखकर उनसे बचने की भी आवश्यकता है। इसलिए नई व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे कि इस दिशा में क्रमशः    अग्रसर हुआ जाय। संयुक्त परिवार के लाभों से लाभान्वित रहने और विकृतियों से बचने का नया प्रयोग ‘लार्जर फैमिली’ ही हो सकता है। उसके प्रथम चरण में तीन व्यवस्थाएँ हाथ में ली जानी चाहिए। पहली सहकारी वस्तु भण्डार की व्यवस्था, दूसरी संयुक्त भोजनालय की व्यवस्था, तीसरी संयुक्त शिशु पालन की व्यवस्था। किसी न किसी रूप में ये तीनों व्यवस्थाएँ प्रचलन में हैं। आवश्यकता इन्हें सुसम्बद्ध, संगठित और सुव्यवस्थित रूप देने की है। 
सहकारी वस्तु भण्डार अभी भी प्रचलित हैं; पर वे पारिवारिकता से जुड़े नहीं हैं। कारखानों आदि में कई स्थानों पर श्रमिक संगठनों ने अपने लिए आवश्यक वस्तुओं की स्वयं ही व्यवस्था करने के लिए ऐसे सहकारी स्टोर खोले हैं और जहाँ सुव्यवस्था है, वहाँ ये स्टोर अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हुए हैं। सभी आवश्यक वस्तुएँ अच्छे किस्म की और बाजार से सस्ती एक ही स्थान पर सुलभ हो जाती हैं। अलग- अलग व्यक्तियों द्वारा अलग- अलग खरीदी में नष्ट होने वाले समय की भी बहुमूल्य बचत होती है, जिसे प्रौढ़ पाठशाला आदि सृजनात्मक कामों में लगाया जा सकता है। 
लार्जर फैमिली के रूप में रहने वाले एक मुहल्ले- टोले के लोग मिलकर यदि अपने सहकारी स्टोर का संचालन करें, तो वे इससे बहुत लाभ उठा सकते हैं। स्टोर के संचालन    के लिए गठित समिति में लार्जर फैमिली के सभी वयस्क सदस्य रहें या जो लोग इस दिशा में रुचि रखते हों, अनुभवी एवं प्रामाणिक हों, वे ही रहें। सुविधानुसार व्यवस्था बनाई जा सकती है। कार्यकारी समिति में ५- ६ से १०- ११ तक सदस्य रहें। यह समिति महीने, दो महीने या ६ महीने में चक्रीय क्रम से बदलती रहे। कार्यकारी समिति ही स्टोर की दैनन्दिन व्यवस्था, वस्तुओं की खरीद, बिक्री भंडारण, रक्षण, स्टाक- रजिस्टर आदि नियमित रखने तथा हिसाब- किताब व्यवस्थित रखने का काम देखे। इसमें लार्जर फैमिली की समर्थ, शिक्षित, समझदार महिलाएँ भी विभिन्न उत्तरदायित्व सँभाल सकती हैं। 
स्टोर के बजट की रूपरेखा लार्जर फैमिली के पारिवारिक गोष्ठी में प्रतिमास प्रस्तुत हुआ करे। इसी गोष्ठी में प्रत्येक परिवार अपनी मासिक आवश्यकताओं की सूची प्रस्तुत किया करे, ताकि वस्तुओं की खरीदी उसी अनुपात में की जाये। अनावश्यक मात्रा में कोई वस्तु न आ जाये, अन्यथा बाजार में उसके दामों की घट- बढ़ से लेकर अधिक समय तक उसे रखे रहने तक की कई समस्याएँ आ जाती हैं। इसी गोष्ठी में मासिक आय- व्यय का विवरण प्रस्तुत हुआ करे तथा स्टोर संचालन संबंधी सामान्य निर्णय लिये जायें। दैनन्दिन व्यवस्था संबंधी निर्णय कार्यकारी समिति कर लिया करे, उसके लिए आम सभा यानी पारिवारिक गोष्ठी की प्रतीक्षा से झंझट तथा हानि हो सकती है। 
सामूहिकता, सहकारिता, स्नेह, सहयोग और अपनत्व विस्तार की यह प्रक्रिया चल पड़े, तो आगे और भी विकास होता जायेगा। सामूहिक घरेलू शाक- वाटिकाएँ, सहकारी लघु- उद्योग व्यवस्था आदि के रूप में इससे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक लाभों का क्रम बढ़ता ही जायेगा। सहकारिता और पारिवारिकता का यह समन्वय ही आज की आवश्यकता है। इससे संयुक्त परिवार व्यवस्था के रक्षणीय मूल्यों को नवजीवन मिलेगा और नारी उत्कर्ष की नयी दिशाएँ भी खुलेंगी। 

शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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