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थोड़े से ऐसे जीवों के, जो एक साथ खाते- पीते, सोते और उठते- बैठते हैं, एक ही घर में रहने से परिवार नहीं बन जाता। इस प्रकार तो हम घर की ईंटों को ही परिवार कह सकते हैं। किसी परिवार के आधे लोग चाहे पृथ्वी के भिन्न- भिन्न भागों में रहते हों; पर उसे सुख- संपदापूर्ण परिवार कह सकते हैं। पारिवारिक जीवन के सच्चे अंग तो प्रेमपूर्वक स्मरण, परस्पर का सद्भाव, सब की मंगल कामना, सब के प्रति सच्ची सहानुभूति, माता- पिता का निश्चल आशीर्वाद, पुत्र की आज्ञाकारिता, कर्तव्य पालन, सत्यनिष्ठा, भगिनी का अभिमान, प्रेम तथा सौजन्य, पत्नी का त्याग, बलिदान और सर्वतोमुखी प्रेम, वृद्धों की सेवा, प्रतिष्ठा, अतिथियों का सम्मान और आदर इत्यादि हैं। 
परिवार परमात्मा की ओर से स्थापित एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा हम अपना आत्मविकास सहज ही में कर सकते हैं और आत्मा में सतोगुण को परिपुष्ट कर सुखी, समृद्ध जीवन प्राप्त कर सकते हैं। मानव जीवन की सर्वांगीण सुव्यवस्था के लिए पारिवारिक जीवन प्रथम सोपान है। मनुष्य केवल सेवा, कर्म और साधना में ही पूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है। 
प्रत्येक परिवार में पूर्वजों की जैसी धारणाएँ, विचार, धर्म या रूढ़ियाँ चली आती हैं, उन्हीें के अनुसार गुप्त रूप से प्रत्येक बच्चे के मानसिक संस्थान पर प्रभाव पड़ा करता है। जो बच्चा चार घण्टे स्कूल में जाकर बीस घण्टे घर में अपने पारिवारिक सदस्यों में व्यतीत करता है, उस पर घर का गुप्त प्रभाव निरंतर पड़ता रहता है। आधुनिक बालकों की मानवोचित भावनाओं एवं पुरुषोचित शक्तियों की प्राप्ति में विफलताओं की सर्वाधिक जिम्मेदारी उनके अभिभावकों की है। 
हमारी रूढ़ियाँ और अंधविश्वास- अपने अभिभावकों से प्राप्त होने वाले बुरे परंपरागत संस्कार या सामाजिक रूढ़ियाँ बच्चों के लिए बड़े शत्रु हैं। मैं ब्राह्मण हूँ, वह चमार है, मैं क्षत्रिय हूँ, वह शूद्र है, मैं अमीर हूँ, वह अस्पृश्य है, उसे मेरी समानता का अधिकार नहीं। इस प्रकार की अनेक रूढ़ियाँ छात्रों के दिमागों में पाई जाती हैं। सब बच्चों का मानस स्फटिक की तरह स्वच्छ न होकर, रूढ़ियों, पुराने धार्मिक संस्कारों, घर के रीति- रिवाजों, भोजन संबंधी विचारों तथा सांस्कृतिक विकास से आच्छादित होता है। जब आप बच्चे को ऊँचा उठाना चाहते हैं, तो पहले आपको परिवार का वातावरण परिवर्तित करना पड़ता है। ज्यों- ज्यों परिवार का वातावरण बदलता है, त्यों- त्यों बच्चे में    भी अंतर आना प्रारंभ होता है। बालक परिवार के संस्कारों का प्रतीक है। 
बच्चे में वीर- पूजा (हीरो वरशिप) की जन्मजात भावना बड़ी तीव्र होती है। वह आदर्श के समीप आना चाहता है। उसका सबसे पहला आदर्श माता है। माता के गुण, दोष, आदतें, स्वभाव, दूध के साथ संपर्क और आदेशों के साथ मानसिक जगत् में प्रवेश करते हैं। माँ के पश्चात् पिता वीर- पूजा का पात्र बन जाता है। परिवार में पिता का महत्त्व सर्वाधिक है। वह समस्त परिवार के लिए आदर्श है। उसी के पथ- निर्देश पर सब चलते हैं, उसी की आदतों और योग्यता, शिक्षा, सभ्यता का अनुकरण प्रतिपल किया जाता है। समस्त परिवार पिता की प्रतिच्छाया ही है। उसके मानस की अप्रत्यक्ष किरणें जिस वातावरण का निर्माण कर देती हैं, उसी में प्रत्येक बच्चे का मानसिक और नैतिक संस्थान विनिर्मित होता है। आपका परिवार वैसा ही होगा, जैसे आप स्वयं हैं, जैसे आपके विचार, आदर्श, रूढ़िगत संस्कार, भावनाएँ और अंधविश्वास हैं। 
जैसा पिता, वैसा परिवार 
पिता का महत्त्व मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत अधिक है। प्रत्येक परिवार अनुकरण का दास है। वह बड़ों का अनुकरण करता है, अतः पिता के रहन- सहन, विचारों और आदतों द्वारा घर के बच्चों की आदतों का निर्माण होता है। अतः पिता हर प्रकार से आदर्श रहें। अपने जीवन का कोई भी दोषपूर्ण पहलू परिवार के सामने न लायें। आदर्श पिता का परिवार ही सुखी, समृद्ध और उन्नतिशील जो सकता है। 
घर का वातावरण बनाने वाले अन्य भी तत्त्व हैं। पहले घर में दीवारों पर लगी हुई तस्वीरों को ही लीजिये। यदि यह चित्र अश्लील, कामोत्तेजक, सस्ते, शृंगारपूर्ण जीवन या सिनेमा की अभिनेत्रियों से संबंधित होंगे, तो अप्रत्यक्ष रूप से घर का वातावरण अशुद्ध होता रहेगा। इसका प्रभाव बड़े होने पर बच्चों के चरित्र में प्रकट हो जायेगा। इसी प्रकार जिन परिवारों में गंदी गालियाँ देने, बच्चों या नौकरों को मारने- पीटने, दुःखी करने का क्रम है, उनके बच्चे दुष्ट और निर्मम प्रकृति के होते जायेंगे। पोशाक का दिखावा, अधिक बनाव, पाउडर, सेण्ट- इत्र, खुशबूदार तेल लगाकर सज- धज कर निकलने वाले परिवारों के बच्चे उद्दण्ड और कामुक प्रकृति के निकलेंगे। जैसा घर का वातावरण, वैसे ही बच्चे के संस्कार। 
पिता को अपना महान् दायित्व समझना चाहिए और स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं सेवा- भाव के बीज पारिवारिक सदस्यों में बोने चाहिए। पिता ही प्रथम शिक्षक और पथ    प्रदर्शक है। उसे उत्साही, मिलनसार, भावुक, परोपकारी, अधिक परिश्रमी, अटल विश्वासी, व्यवहार- कुशल, सच्चा समालोचक, विनोदपूर्ण होना चाहिए। जिस संलग्नता से वह पवित्र जीवन व्यतीत करेगा, उसी परोपकारिता, पितृ- भक्ति और मृदुता से उसका परिवार उसके पदचिह्नों पर चलेगा। 

शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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