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सहयोग की भावना मनुष्य जाति की उन्नति का मूल कारण है। हमारी एकता- शक्ति, सामाजिकता, मैत्री भावना, सहयोग परायणता ही हमारी आधुनिक सभ्यता का मूल मंत्र है। सभ्यता के प्रारंभ में मनुष्यों ने आपस में एक दूसरे को सहयोग दिया, अपनी स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों को परस्पर मिलाया। इस संगठन से उन्हें ऐसी चेतनाएँ एवं सुविधाएँ प्राप्त हुईं, जिनके कारण अनेक हिंसक पशुओं के ऊपर मनुष्य का आधिपत्य स्थापित हो गया। दूसरे प्राणी जो साधारणतः शारीरिक दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक सक्षम थे, इस मैत्री भावना, सम्मिलित योग्यता के अभाव में जहाँ के तहाँ अविकसित पड़े रहे। उनकी शक्तियाँ विशृंखलित, विघटित, असंगठित रहीं। संघशक्ति का प्रादुर्भाव उनमें न हो सका। 
यही बात परिवारों के संबंध में है। वे परिवार उन्नति कर सके हैं, जिनमें पारस्परिक सहयोग, संगठन, एकता, पारस्परिक सद्भाव रहे हैं। बड़े सेठों, साहूकारों संस्थाओं, फर्मों    का निरीक्षण करके मालूम करें, तो उनका संगठन ही उन्नति का मूल मिलेगा। विद्युत्, अग्रि, गैस, वाष्प की तरह जन- शक्ति भी एक होकर अनेक गुनी अभिवृद्धि को प्राप्त होती है। 
व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठा को संसार अब पहचानता जा रहा है। मजदूर, किसान, कारीगर सभी अपने- अपने संघ विनिर्मित कर रहे हैं, यहाँ तक कि बुरे व्यक्ति भी बुरे कर्मों के लिए घनिष्ठ संघ बनाकर अवांछनीय साहसिक कार्य प्रतिष्ठित कर रहे हैं। 
पृथक्- पृथक् रूप से छोटे- छोटे प्रयत्न करने में शक्ति का अपव्यय अधिक और कार्य न्यून होता है। अकेला मनुष्य थोड़ी देर बाद रुक जाता है, परन्तु सामूहिक और संगठित सहयोग से ऐसी अनेक चेतनाओं और सुविधाओं की उत्पत्ति होती है, जिसके द्वारा बड़े- बड़े कठिन कार्य सहज हो जाते हैं। सम्मिलित खेत, सम्मिलित रसोई, सम्मिलित व्यापार, सम्मिलित संस्था, सम्मिलित परिवार की प्रवृत्ति से मानव प्राणी की सुख, शांति एवं सफलताओं में आश्चर्यजनक रूप से अभिवृद्धि होती है। 
आर्थिक दृष्टि से विचार कीजिए, तो सामूहिकता में धन का मितव्यय होता है तथा सम्पन्नता में अभिवृद्धि होती है। पृथक्- पृथक् रहने पर पृथक् ही चूल्हे जलते हैं, दीपक जलते हैं, भोजन, निवास तथा शिक्षा इत्यादि के निमित्त प्रत्येक छोटे परिवार को पृथक् ही व्यय करना पड़ता है। आजकल मकान की समस्या बड़ी विषम है। चार भाई यदि पारस्परिक स्नेह का विकास कर सम्मिलित रहें, तो चार मकानों के स्थान पर एक से ही कार्य चल जायेगा। चार मकान, चार फर्नीचर, फर्श, सजावट के सामान की आवश्यकता प्रतीत न होगी। अतिथियों के लिए अतिरिक्त पलंग, बिस्तर फिर सब को पृथक्- पृथक् रखने की क्या जरूरत ?? घर के साधारण नौकर जैसे कहार, रसोइया, चौकीदार, दूध दुहने वाले का व्यय भी एक ही स्थान से किया जा सकेगा और चारों भाइयों को आराम भी प्राप्त होगा। चार भाइयों के एक साथ सम्मिलित रहने से यदि सौ रुपये का व्यय है, तो पृथक् रहने से चार सौ का व्यय अवश्य हो जायेगा। एक भाई दूसरे अच्छे भाई का व्यवहार, प्रोग्राम, दिनचर्या, देखकर उसका अनुकरण करेगा, गंदगी से बचेगा, व्यर्थ की आदतों जैसे सिनेमा, मद्य, सिगरेट, सैर- सपाटा इत्यादि अनेक प्रकार के अपव्यय से बचा रहेगा। ‘जो मैं चाहता हूँ, वह सब को भी होना    चाहिए। सब के लिए वही व्यवस्था करने में बहुत व्यय पड़ेगा, केवल मेरे लिए यह वस्तु होने से सबको बुरा प्रतीत होगा।’ ऐसा सोचकर गृह के अन्य सदस्य भी अपनी आवश्यकताओं पर संयम और मन पर नियंत्रण रखेंगे। जब यह नियंत्रण हट जाता है, तो हर एक व्यक्ति खुले हाथ से व्यय करता है। घर की जुड़ी हुई सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। झूठे दिखावे में आदमी बरबाद हो जाता है। 
इस प्रकार जहाँ व्यय में किफायत होती है, वहाँ संपन्नता में वृद्धि होती है। मितव्ययता से धन क्रमशः एकत्रित होता है। घर के विश्वस्त आदमी मिलकर कारोबार में जितना लाभ कर सकते हैं, उतना नौकरों द्वारा नहीं हो सकता। सब की आय एक ही स्थान पर एकत्रित होने से संचित पूँजी में वृद्धि होती है। अर्थशास्त्र का अकाट्य नियम है, ‘अधिक पूँजी, अधिक लाभ’। जैसे किसी व्यापार में एक हजार की पूँजी लगाई जाती है, तो दस प्रतिशत लाभ होता है, पर उसी में दस हजार की पूँजी लगाई जाये, तो पन्द्रह प्रतिशत लाभ होने लगेगा। सब की कमाई एक स्थान पर इकट्ठी होने से पारिवारिक उद्योग धंधे, छोटे- छोटे व्यापार और छोटी कंपनियाँ चालू की जा सकती हैं। ये ही छोटी कंपनियाँ मिलकर बाद में बड़ी कंपनियाँ बन जाती हैं। 
प्रत्येक परिवार की एक साख होती है। अच्छी साख वाले परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवन में अग्रसर होने में यह पूर्व संचित प्रतिष्ठा- संपदा बहुत लाभ पहुँचाती है। 
शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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