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संयुक्त परिवार के गुणों और दोषों दोनों का विचार एवं स्मरण आवश्यक है। संगठन और सहयोग से, प्रेम एवं आत्मीयता से उपलब्ध होने वाले आनंद तथा लाभ सम्मिलित परिवारों की स्वाभाविक उपलब्धि हैं; किन्तु ये अच्छाइयाँ, तभी तक बनी रहती हैं, उनके सुफल तभी तक मिलते रहते हैं, जब तक उनके आधार कायम रहें और आवश्यक नियमों का पालन किया जाता रहे। 
संयुक्त परिवार में सुख- शांति एवं सुव्यवस्था का आधार आत्मीयता एवं पारस्परिक सहयोग ही होता है। जिम्मेदारियों का आपसी बँटवारा सभी के सिरों को बोझ उठा सकने योग्य बना देता है। 
सामूहिक उपार्जन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि सम्मिलित सम्पत्ति की मात्रा अधिक होती है और उस पर हर एक को अपना अधिकार प्रतीत होने से प्र्रसन्नता होती है। पारिवारिक समृद्धि परिवार के प्रत्येक सदस्य को हर्ष देती है। वह जानता है कि हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति में उसका उपयोग होगा। उपयोग के अतिरिक्त समृद्धि का होना अपने आप में लोगों की प्रसन्नता का आधार बनता है। इसका कारण उस समृद्धि के कारण हो सकने वाली सुरक्षा का बोध ही है। संयुक्त परिवार में यह बोध गलत सिद्ध नहीं होता; क्योंकि हारी- बीमारी, विपत्ति, दुर्घटना, शोक आदि के क्षणों में परिवार की सम्पत्ति एवं सहायता काम आती है। विवाह- शादियों तथा उल्लास के अन्य आयोजनों, उत्सवों में भी जो विशेष खर्च सिर पर आ पड़ता है, उसे संयुक्त परिवार की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति तथा मिली- जुली पूँजी से सहजता से उठाया जा सकता है। बाद में उसे स्वाभाविक क्रम से पूरा किया जाता रहता है। इससे ऋण के ब्याज तथा मानसिक बोझ दोनों से मुक्ति मिलती है। एक- दूसरे के सहयोग से पहिया लुढ़कता रहता है और अत्यधिक श्रम तथा चिंता का अवसर नहीं आ पाता। 
मनुष्य को आर्थिक सहयोग की तो जब- तब ही आवश्यकता पड़ती है; पर मानवीय सहयोग की सदैव ही पड़ती रहती है। हर्ष- उल्लास और विपत्ति- पीड़ा के अवसर पर जब परिवार के लोग एक के साथ ही उठ खड़े होते हैं तथा अपने- अपने ढंग से सहायता करते हैं, तो उससे होने वाली प्रसन्नता अनुभव की ही वस्तु है। सबके साथ रहने का उल्लास ही अलग है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अपरिचितों के बीच पहुँचकर भी उसका दिमाग एकान्त के तनाव- बोझ से हलका होने लगता है, यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। परिचितों से अपने अनुभवों का सम्प्रेषण करने, आदान- प्रदान करने की ललक हर एक में होती है। फिर आत्मीय- स्वजनों के बीच उत्पन्न होने वाले उल्लास का क्या कहना! माँ की ममता भरी दृष्टि, पिता का गंभीर व्यक्तित्व, भाई- बहिनों का उमड़ता स्नेह, मीठी नोंक- झोंक, पत्नी का प्रेम तथा बच्चों की मधुर- मधुर नटखट, कौतूहल, जिज्ञासा, तुतलाहट, इन सबका सम्मिलित आनंद मन को सरस एवं सक्रिय बनाये रहता है। कष्ट की स्थिति में उपलब्ध सेवा- सुश्रूषा, आत्मीयता की छाया उसे सहज तथा हलका बना देती है। 
संयुक्त परिवार की सम्मिलित पूँजी और विश्वस्त सहयोग नये उद्योग प्रारंभ करने का आधार बन सकता है। दूसरे सहयोगी या नौकर लाभ के प्रति उतने उत्सुक नहीं होते या फिर निश्छल नहीं होते, अकेले लाभ कमाने के चक्कर में रह सकते हैं, दिन- रात जुटना भी पसंद नहीं कर सकते। घर की पूँजी और घर का श्रम, विश्वस्त आत्मीयों का सहयोग- सहभागिता निश्चय ही अधिक लाभ के आधार बनते हैं। खेती, बागबानी, पशुपालन एवं गृह उद्योग में घर के लोगों का सम्मिलित श्रम ही लाभकारी सिद्ध होता है। छोटे- बड़े, बच्चे- बूढ़े, सबके उपयुक्त काम की गुंजाइश भी होती है। न कोई निठल्ला रहता है, न बेकार। सभी शक्ति अनुसार काम करते और आवश्यकतानुसार सुविधा- साधन प्राप्त करते रहते हैं। 
मिल- जुलकर रहने से समाज में परिवार की साख बढ़ती है। लोग भी सम्मान करते हैं। विरोधी चाहे जब अहित करने की कुचेष्टा का दुस्साहस नहीं कर पाते। 
श्रद्धा- सम्मान, विनम्रता, सौजन्य, संतुलन जैसे सद्गुणों के प्रशिक्षण का सर्वाधिक उपयुक्त स्थल संयुक्त परिवार ही है। बड़ों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति, छोटों के प्रति प्यार- दुलार की मधुरता, शील- संकोच, कब खुलकर बात करना, कब चुप रहना, कैसे, क्या कहना, मनोरंजन आदि के समय में दैनन्दिन जीवन में ही स्वभाव का अंग बनते जाते हैं। अपनी आवश्यकताएँ दूसरों के तारतम्य के अनुसार मर्यादित करना, दूसरों के अंश का भी ध्यान रखना, दूसरों के लिए त्याग की तत्परता जैसे अमूल्य    सद्गुण संयुक्त परिवार में ही स्वाभाविकता से सीखे जाते हैं। पति- पत्नी, बच्चों वाले परिवार में बच्चों को श्रेष्ठ गुण सीखने के अवसर कम ही मिलते हैं। उन्हें लेना ही लेना आता है, देने की, त्याग की वृत्ति का उनका नियमित प्रशिक्षण नहीं हो पाता। यह भावनात्मक प्रशिक्षण संयुक्त परिवार प्रथा की सबसे बड़ी विशेषता है। श्रमशीलता, सहयोग, आत्मानुशासन, मितव्ययिता जैसे प्रगति के लिए आवश्यक गुणों का विकास पारिवारिक भावना की स्वाभाविक निष्पत्ति है। शिष्टाचार, वाक्- संयम, आवेग- आवेश पर नियंत्रण का अभ्यास परिवार के वातावरण में अनायास होता चलता है। 
साथ- साथ रहने पर कई तरह की बचत होती है। चार भाई अलग रहकर चार चूल्हे जलायेंगे। चार कमरे, चार उपकरण, चार अलग- अलग व्यवस्थाएँ जुटानी होंगी। यही बात प्रकाश, साज सामान आदि पर लागू होती है। साथ रहने पर कम खर्च आता है। आमोद- प्रमोद के साधनों में तो अच्छी खासी बचत हो जाती है। एक रेडियो, एक अखबार, सम्मिलित पुस्तकालय से सबका काम चल जाता है। बच्चों की पुस्तकें भी एक दूसरे के काम आती रहती हैं। एक ही कक्षा के बच्चे किताबों के एक सेट से कमा चला लेते हैं। इसी प्रकार के अनेक मदों में बचत होती रहती है। छोटी- छोटी बचतें ही कुल मिलाकर बड़ा रूप ले लेती हैं और ठोस लाभ का आधार बन जाती हैं। 
अपनी पत्नी- बच्चों को लेकर अलग परिवार बसा लेने वालों को रोग- विपत्ति, प्रसव- काल तथा बच्चों के लालन- पालन के समय आटे- दाल का भाव मालूम पड़ता है। ऐसे परिवार में पति या पत्नी अथवा छोटे बच्चों में एक से अधिक बीमार पड़े, तो सारा कामकाज अव्यवस्थित होने लगता है। पत्नी रोग शैय्या पर है, तो घर और बच्चों की व्यवस्था सँभालने के लिए पति अवकाश ले और खीझता- झन्नाता जैसे- तैसे काम निपटाए। घर का काम ही इतना हो जाता है कि रोगी की समुचित सुश्रूषा, देखभाल    नहीं हो पाती और उसके अच्छा होने में अधिक समय लगता है। माता- पिता, भाई- बहन के साथ रहने पर, एक- दो व्यक्तियों की बीमारी से उनकी परिचर्या सामान्य क्रम    में ही होती रहती है, किसी एक को पूरे समय खपना नहीं पड़ता। घर में कोई अस्त- व्यस्तता नहीं आती। 
शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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