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एकाकी मनुष्य न प्रगति कर सकता है और न प्रसन्न रह सकता है। मानवी संरचना ही कुछ ऐसी है कि जिसमें मिल- जुलकर चलने और सहयोगपूर्वक आगे बढ़ने की व्यवस्था है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे अन्यान्य प्राणियों से आगे बढ़कर जिस ऊँचाई तक चढ़ने और साधन- सम्पन्न बनने का सुयोग मिला है। उसमें उसकी सहकारी, सामाजिक प्रवृत्ति का सबसे बड़ा योगदान है। यदि वह एकाकीपन से ग्रसित रहा होता, तो मनुष्यों में आगे बढ़ सकने की स्थिति उसे प्राप्त ही न हुई होती। अपने अनुदानों को दूसरों के लिए हस्तान्तरित करते रहने, हिल- मिलकर रहने और मिल- बाँट कर खाने की आदत ही वह दैवी वरदान है, जिसके आधार पर मनुष्य को प्रकृति का लाड़ला बेटा और परमात्मा का युवराज कहलाने का अवसर मिला। 
इस प्रवृत्ति में घटोत्तरी नहीं होनी चाहिए। उसे निरंतर अधिकाधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए। परिवार संस्था से समाज आरंभ होता है। दाम्पत्य जीवन के साथ अभिनव    सहकार का नूतन अध्याय जुड़ता है। बच्चे उसे और भी विस्तृत एवं सघन बनाते हैं। वृद्धजनों और भाई- बहिनों के कितने ही उत्तरदायित्व एवं व्यवहार परिवार से जुड़ते हैं, फलतः वह छोटे रूप से एक समाज या राष्ट्र का रूप धारण कर लेता है। संगठन, संचालन एवं सामूहिक निर्वाह की व्यवस्था सीखने के लिए परिवार से अधिक सरल- सरस, किन्तु महत्त्वपूर्ण व्यवस्था और कोई है नहीं। 
आज आवश्यकता है परिवार के सामाजिक स्वरूप को आगे बढ़ाने की; क्योंकि सघनता, एकता, आत्मीयता विस्तार जैसी अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का विकास, साथ रहने और मिल- जुलकर निर्वाह करने की प्रक्रिया अपनाने पर ही संभव होता है। आर्थिक संगठन इस उद्देश्य की पूर्ति में कदाचित् ही कुछ सहायता कर पाते हैं। अर्थ- सुविधा का जितना महत्त्व है, उससे कहीं अधिक भावनात्मक सहकारिता का है। सत्प्रवृत्तियों को यदि मानवीय गरिमा का आधार माना जाय, तो यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि इनका प्रयोग, अभ्यास एवं परिपाक करने के लिए भावनात्मक पारिवारिकता को ऐसा प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जिससे वह व्यवहार में भी उतर सके। 
पारिवारिकता को अग्रगामी बनाने के लिए विज्ञजनों ने ‘लार्जर फेमिली’ व्यवस्था की परिकल्पना की है। निर्वाह जन्य व्यवस्थाओं का बिखराव दूर करके उसे केन्द्रित करने के लिए इस निर्धारण को उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण माना गया है। एक गली- मुहल्ले के लोग मिल- जुलकर ऐसी व्यवस्था बना लें, जिसमें भोजन पकाने, कपड़े धोने, बच्चे खिलाने, बाजार की खरीद- फरोख्त करने, ट्यूशन लगाने, सुरक्षा प्रबंध करने जैसी दैनिक आवश्यकताओं को अलग- अलग न रखकर एक संयुक्त व्यवस्था के अंतर्गत सुनियोजित बना लिया जाय। कहना न होगा कि उपरोक्त प्रयोजनों का अलग- अलग प्रबंध करने पर हर परिवार का ढेरों समय व्यर्थ जाता है। उसी जंजाल में    दिन गुजर जाता है, फलतः और कोई महत्त्वपूर्ण काम करने की गुंजाइश ही शेष नहीं रहती। समय की इस बर्बादी को व्यवस्था बनाकर आसानी से रोका जा सकता है। इस आधार पर जो अवकाश मिले, उसकी अभीष्ट प्रगति के लिए अपने- अपने ढंग से अपने- अपने प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। इसमें पैसे की, समय की बचत होती है और तरह- तरह की चिंताओं में व्यग्र रहने, साधन जुटाने की भाग- दौड़ करने से सहज छुटकारा मिल सकता है। 
बड़े कुटुम्ब की तरह सभी सदस्यों का समय एकत्रित करके उसे कार्यविभाजन के अनुसार नियोजित कर देने से भी काम चल सकता है। एक रसोईघर में एक ही परिवार के लोग भोजन करें, तो इसमें क्या हर्ज है। स्कूलों के बोर्डिंगों में, सेना की छावनियों में, साधुओं के लंगरों में यह व्यवस्था बड़ी सरलतापूर्वक चलती भी रहती है। यही सोचकर प्रयोग करें और कुछ उत्साही लोग इसकी पहल करें, तो सभी को इसमें अनुकूलता प्रतीत होगी और एक से दूसरे का अनुकरण करने पर यह प्रथा- परंपरा चल पड़ेगी। छोटे बच्चों को खिलाने का प्रबंध एक जगह बन पड़े, तो घर के अन्य उसी में बँधे रहने के स्थान पर अन्य काम कर सकते हैं, विशेषतया महिलाओं के लिए तो प्रगति का एक नया द्वार ही खुल जाता है। बच्चे भी प्रसन्न रहेंगे। पक्षियों में, खिलौनों में उनका मन लगा रहेगा। थोड़े- बड़े होने पर उन्हें बाल- विद्यालयों में अन्यत्र भेजने की अपेक्षा यह अधिक सस्ता और सही है कि मुहल्ले के बच्चों की अपनी पाठशाला हो, जिसमें वे खेलते भी रहें और पढ़ते भी। जब तक वे स्कूल जाने लायक न हों, तब तक यह शिक्षणक्रम बहुत ही सुविधा और सफलता के साथ ‘लार्जर फेमिली’ पाठशाला के अंतर्गत अपने मुहल्ले में ही चल सकता है। इसमें बाल विकास में समीपवर्तियों के अधिक स्नेह- सहकार बढ़ाने में अतिरिक्त सहायता मिल सकती है। बच्चे सुरक्षित भी रहेंगे, प्रसन्न भी और अभिभावकों की देख- भाल के अंतर्गत भी। 
यह सुविधा- संवर्द्धन की बात हुई। समय और पैसे की बचत को उपरोक्त प्रतिपादन में उभारा गया है; किन्तु उससे भी बड़ी बात पारस्परिक स्नेह, सहयोग और सद्भाव- संवर्द्धन की है। यह स्वाभाविक है, जो लोग आँख के सामने रहते हैं, किसी कारण मिलते- जुलते और आदान- प्रदान का सहकारी प्रयोग चलाते हैं, उनके बीच सहज घनिष्टता उत्पन्न होती है। एक- दूसरे के सुख- दुःख में सहचर होते हैं, हाथ बँटाते और हिम्मत बढ़ाते हैं। यह लाभ देखने में सामान्य होते हुए भी वस्तुतः असामान्य है। इस प्रयास से नैतिकता, सामाजिकता और सहकारिता के संवर्द्धन में जो भावनात्मक प्रोत्साहन मिलता है, उसका महत्त्व कम नहीं आँका जाना चाहिए। समयानुसार जब उसकी उपलब्धियाँ सामने आती हैं, तो प्रतीत होता है कि वंशानुक्रम के आधार पर चलने वाले कुटुम्बों की तरह ही यह सम्पर्क क्षेत्र का सुविधा- संवर्द्धन के आधार पर बना परिवार भी कम उपयोगी नहीं है। कमाई मिल- बाँटकर खाने जैसा आधार खड़ा हो सकता, तो उसे संयुक्त परिवार ही कहा जा सकता था; पर उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रारंभिक कदम के रूप में इतना ही कम नहीं है कि एक मुहल्ले के लोग सुविधा- संवर्द्धन के लिए सम्मिलित व्यवस्था सोचें और बिखराव की मनोवृत्ति पर अंकुश    लगाकर केन्द्रीकरण की दिशा में कुछ न कुछ करने के लिए आगे बढ़ें। 

शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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