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प्राचीन काल में बिरादरियों की पंचायतें होती थीं। उनमें बुद्धिमान्, परिपक्व और प्रभावशाली लोग पंच, सरपंच की भूमिका निभाते थे। वोट डालकर चुनाव तो नहीं होतेथे;पर उनका सम्मिलित स्वरूप अनायास ही पंचायत जैसा बन जाता था। उन दिनों एक व्यवसाय के लोग एक बिरादरी बन जाते थे। व्यवस्था एवं सुविधा की दृष्टि से वे इर्द- गिर्द ही रहते थे। बिरादरियाँ इसी आधार पर बनती थीं। उनमें अंतर्कलह खड़ी न होने पाये, नैतिक अनाचार न पनपे, कोई उच्छृंखलता न बरते, सामाजिक अनुशासन    का व्यतिक्रम न हो, इसकी देखभाल एवं जिम्मेदारी इन बिरादरी पंचायतों पर रहती थी। छोटे- मोटे आर्थिक झगड़े और मनोमालिन्य भी वे ही निपटा दिया करती थीं। इसी व्यवस्था को एक क्षेत्रीय समुदाय में चलने वाली कार्यपालिका के ऊपर न्यायपालिका का अनुशासन कहा जा सकता है। 
समर्थों का असमर्थों के प्रति अन्याय तभी हर क्षेत्र में उभरता है, जब कुछ उद्दण्ड और मूर्ख प्रकृति के लोग भी हर समुदाय में रहते हों। इनका नियमन लोकमत का दबाव और पंचायत के निर्णय की समन्वित शक्ति से बिना किसी कठिनाई के होता रहता था। स्त्रियों को, बच्चों को सताने की शिकायतें आमतौर से उठती रहती हैं। अवज्ञा, अवहेलना और उद्दण्डता के कौतुक भी आये दिन देखने को मिलते रहते हैं। उनकी ओर से उपेक्षा बरतने और घर- परिवार में उतनी सूझ- बूझ या दबाव व्यवस्था न होने से    अनीति पनपती रहती है और पके फोड़े की तरह सड़ती रहती है। इनका निराकरण मुहल्ले की पंचायतें बड़ी आसानी से कर सकती हैं और पुरानी बिरादरी पंचायतों का स्थान नये सिरे से नये रूप में ग्रहण कर सकती हैं। इस आधार पर सुव्यवस्था और सद्भावना बने रहने में, देखने में छोटा, किन्तु दूरगामी परिणाम की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध होता रह सकता है। 
यही विशाल परिवार प्रक्रिया अपने- अपने क्षेत्र में सुविधा- संवर्द्धन की तरह प्रगतिशील प्रयोजनों को भी कार्यान्वित कर सकने में समर्थ हो सकती है। छोटे गृह- उद्योगों की नींव इसी आधार पर रखी जा सकती है। आगे की शिक्षा प्राप्त करने वालों के सामयिक विद्यालय इसी योजना में सम्मिलित रखे जा सकते हैं। कथा- वार्ता, सत्संग, विचार- विनिमय, संगीत- प्रवचन छोटे- मोटे खेल- मनोरंजन, रेडियो, टेलीविजन जैसे कितने ही प्रबंध इस प्रकार किये जा सकते हैं कि वे सभी सदस्य उनका समुचित लाभ उठा सकें। 
इन दिनों कितनी ही निवास कॉलोनियाँ बस रही हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी होती हैं, जिनमें एक व्यवसाय के या एक जगह काम करने वाले, अपने लिए नये घरों का प्रबंध करते हैं। अच्छा हो, कुछ प्रगतिशील- विचारवान् लोग ऐसी कॉलोनियाँ बसायें, जिनमें ‘लार्जर फेमिली’ स्तर की सुविधाएँ खड़ी की जा सके ।। कुछ छोटे गाँव ऐसे बसाये जा सकते हैं, जिनमें भारत की जलवायु तथा गरीबी को देखते हुए ऐसा ढाँचा खड़ा किया जा सकें, जो दूसरों के लिए अनुकरणीय हो सके। 
प्रयत्न नया होने से उसमें कितने ही उतार चढ़ाव आ सकते हैं। आशा- निराशा उत्पन्न करने वाले घटनाक्रम घटते रह सकते हैं। कुछ लोग आरंभ में उत्साह दिखाकर फिर    किसी छोटी बात पर तुनक सकते हैं। ऐसे अपवादों की चिंता न करके यदि धुन का धनी इसे किसी बड़े परिवार का संचालन करने वाली भारी- भरकम गृहपति की तरह उसे    चलाते रहा जाय, तो कुछ ही समय में ऐसी स्थिति आ जायेगी, जिसमें उसे सरल और सफल माना जा सके। 
कम्युनिस्ट पार्टी के आरंभिक प्रतिपादकों के मस्तिष्क में एक सपना था- ‘कम्यून’। कम्यून का अर्थ लगभग यही होता है, जो लार्जर फेमिली का है। विशाल परिवार की आचार संहिता क्या हो, इसकी अर्थव्यवस्था कैसे चले, पारस्परिक संबंधों का निर्धारण किस रीति -नीति के आधार पर विनिर्मित हो, यही चिंतन उस स्थापना के पीछे काम करता रहा और योजनाएँ बनती रहीं। गली, मुहल्लों और गाँवों में उसका प्रयोग चला। तथ्यों ने उसकी उपयोगिता का पूरा- पूरा समर्थन किया। बड़े मस्तिष्क और दूरदर्शी विचारकों ने इस आधार पर समूचे समाज के गठन की बात सोची। उस व्यापक प्रचलन का तारतम्य बिठाते- बिठाते एक शासन पद्धति का उस आधार पर ढाँचा खड़ा करने की बात आगे बढ़ गई। क्रान्तियाँ हुईं और कम्यून चिंतन को राजनीतिक पार्टी तथा शासन तंत्र के रूप में मान्यता मिल गयी। यही है- संक्षेप में कम्युनिज्म का    बीजारोपण और उसके विशाल उद्यान में परिणत होने का इतिहास। 
बढ़ती हुई जनसंख्या, आकाश चूमती महँगाई बढ़े हुए खर्च जुटाने की व्यवस्था, निर्वाह साधन समेटने में सिरदर्द जैसी दौड़- धूप को ध्यान में रखते हुए उसका समाधान ढूँढ़ना ही पड़ेगा। इस प्रयास में लार्जर फेमिली- बृहत्तर परिवार व्यवस्था ऐसी है, जिसमें समय और पैसे की बचत के अतिरिक्त प्रसन्नता बढ़ाने और सद्भावना का वातावरण बनाने की सुखद संभावनाएँ जुड़ी हुई हैं। 
शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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