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एक ही रक्त और कुल के क्यों न हों, अनेक लोगों का एक साथ रहना मात्र ही पारिवारिक जीवन नहीं है। एक साथ, एक घर में अनेक भाई और उनके बच्चे रहते हों; किन्तु  वे आपस में लड़ते, संघर्ष करते और कलह मचाते रहें, तो इससे पारिवारिक जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इस प्रकार तो वह एक बार परिवार न कहा जाकर संग्राम- स्थल ही कहा जायेगा। 
अनेक पशु- पक्षी, समूह बनाकर रहते हैं। साथ- साथ चरते, घूमते, उठते- बैठते, सोते और जागते हैं; किन्तु उनको एक परिवार नहीं कहा जा सकता। परिवार का प्रमुख लक्षण है, एक- दूसरे से प्रेम, सहानुभूति, आत्मीयता और स्वार्थ रहित सेवा- भाव। एक- दूसरे के लिए त्याग तथा उत्सर्ग की तत्परता। जिस मानव समूह में एक- दूसरे का सुख- दुःख अपना सुख- दुःख न बन सका, वहाँ पारिवारिक भावना नहीं मानी जायेगी। पशु- पक्षी एक साथ रहते हुए भी इसी आत्मभाव के अभाव में पारिवारिक नहीं माने जाते। 
परिवार का अर्थ है- एक दूसरे के सांसारिक सुख में सहायता के साथ आत्मोन्नति में यथासाध्य सहयोग करना। जहाँ लोग एक दूसरे का अधिकार छीनना चाहते हों, एक दूसरे से ईर्ष्या व डाह करते हों, पीछे खींचने का प्रयत्न करते और अपने स्वार्थ पर ही दृष्टि रखते हों, वहाँ परिवार कहाँ? वहाँ तो पाशविक समूह जैसी भावना ही समझनी चाहिए। 
घर में जब प्रत्येक सदस्य दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहे, उसका अपना स्वार्थ दूसरों के स्वार्थ के साथ जुड़ा हो, एक की पीड़ा सबकी पीड़ा और एक की उन्नति सबकी उन्नति बनकर प्रकट हो, तब समझना चाहिए कि हम पारिवारिक जीवनयापन कर रहे हैं। दूसरे हमसे अच्छा खायें, पहनें, घर की सुख- सुविधा का उपभोग पहले दूसरे लोग करें, हमारी खुशी इसी में है। हमारा कर्तव्य तो अधिकाधिक त्याग और दूसरों की सुख- शांति और विकास में सहायक होना है। मेरे रहते किसी को दुःख, तकलीफ न हो आदि की उदार भावना ही पारिवारिक भावना को प्रकट करती है। 
परिवार की प्रतिष्ठा हमारी प्रतिष्ठा, परिवार की उन्नति हमारी उन्नति, उसकी समृद्धि और उसका लाभ- हानि हमारी लाभ- हानि है, ऐसी आत्म- भावना पारिवारिकता का    विशेष लक्षण है। हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे परिवार की प्रतिष्ठा पर आँच आये। किसी सदस्य पर कोई अवांछनीय प्रभाव पड़े, परिवार की उन्नति में अवरोध उत्पन्न हो अथवा उसकी समृद्धि एवं वृद्धि में प्रतिकूलता आये, ऐसा सतर्क भाव ही तो पारिवारिकता कहा जायेगा। जहाँ ये सब बातें पाई जायें, वहाँ समझना चाहिए कि लोग वास्तविक रूप में परिवार बनाकर रह रहे हैं। जहाँ स्वार्थ- वैषम्य, विचार- वैषम्य, भाव- वैषम्य अथवा सुख- दुःख में विषमता की गंध पाई जाये, वहाँ मानना होगा कि एक साथ अनेक के रहने पर भी परिवार भावना नहीं है। लोग किसी कारणवश एक साथ रहे जा रहे हैं। 
परिवार एक पवित्र तथा उपयोगी संस्था है। इसमें मानव की सर्वांगीण उन्नति का आधार सहयोग, सहायता और पारस्परिकता का भाव रहता है। यह भाव वह शक्ति है, जिसके आधार पर मनुष्य आदि- जंगली स्थिति से उन्नति करता- करता आज की सभ्य स्थिति में पहुँचा है। सहयोग की भावना ही मनुष्य जाति की उन्नति का मूल कारण रही है। एकता, सामाजिकता, मैत्री आदि की सहयोग मूलक शक्ति ने आज मानव सभ्यता को उच्चता पर पहुँचा दिया है। सभ्यता के प्रारंभिक युग में जिस व्यक्ति ने सहयोग की शक्ति समझकर उसका प्रकटीकरण तथा प्रवर्तन किया होगा, वह निश्चय ही एक बड़ा दार्शनिक तथा समाज हितैषी महापुरुष रहा होगा। सहयोग की शक्ति जानकर लोगों ने अपनी स्थूल तथा सूक्ष्म विशेषताओं को मिलाकर संगठन की चेतना शक्ति से शक्ति तथा साधन से साधन मिलाकर एक तन- मन से काम किया होगा, जिसके फलस्वरूप सभ्यता तथा मानवीय समृद्धि के एक के बाद एक द्वार खुलते चले गये होंगे। 
आज भी तो पूरा समाज सहयोग और पारस्परिकता के बल पर ही चल रहा है। यदि समाज से सहयोग की भावना नष्ट हो जाये, तो तुरंत ही चलते हुए कारखाने, होती हुई खेती और बढ़ती हुई योजनाएँ व विकास पाती हुई कलाएँ, शिल्प, साहित्य आदि की प्रगति रुक जाये और कुछ ही समय में समाज जड़ता से अभिभूत होकर नष्ट हो जाये। सहयोग मानव विशेषताओं में एक बड़ी विशेषता है, परिवार में जिसका होना नितान्त आवश्यक है। इसी पर परिवार बनता, ठहरता, चलता और उन्नति करता है। 
परिवार में जब तक सच्ची पारिवारिक भावना नहीं होती, उसका उद्देश्य पूरा नहीं होता। आज सच्ची पारिवारिक भावना के अभाव में ही तो परिवार टूटते, बिखरते जा रहे हैं। उनकी शक्ति तथा दक्षता नष्ट होती जा रही है। उनकी वृद्धि, समृद्धि रुकती जा रही है और दिन- दिन उन्हें दीनता, दरिद्रता घेरती चली आ रही है। पारिवारिक भावना के अभाव में ही भाई- भाई लड़ते, बहिनें एक दूसरे से मन- मुटाव मानतीं, सास- बहू के बीच बनती नहीं और देवरानी- जेठानी एक दूसरे से डाह व ईर्ष्या करती हैं। जितने मुकदमे दूसरों से विवाद के नहीं चलते, उससे कई गुने मुकदमे पारिवारिक कलह के कारण दायर होते और चलते रहते हैं। चाचा- ताऊ, बाप- बेटों और बाबा- पोतों तक में संघर्ष होता रहता है। 
इस अनिष्ट का एकमात्र कारण यही है कि एक परिवार होते हुए भी वे सब पारिवारिक भावना से रहित होते हैं। अपना भिन्न तथा पृथक् अस्तित्व मानते और तदनुरूप ही आचरण करते हैं। सच्ची पारिवारिक भावना का विकास तो तब ही होता है, जब परिवार का प्रत्येक सदस्य अपना अस्तित्व पूरे परिवार में मिलाकर अभिन्न हो जाता है। इस आत्मविसर्जन के पुण्य से ही लोगों में सच्चे प्रेम और सच्ची आत्मीयता का विकास होता है। 
परिवारों से मिलकर समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। यदि परिवार संगठित, शक्ति- सम्पन्न और समृद्ध हो जायें, तो समाज तो वैसा आप ही आप बन जायेगा। उसके लिए अलग से कोई प्रयत्न करने की आवश्यकता न रह जायेगी। परिवारों में सच्ची पारिवारिक भावना का अभाव किन कारणों से हुआ है या हो रहा है, यदि इस पर विचार करते हैं, तो यह विदित होता है कि आज का हमारा रहन- सहन और आचार- विचार इसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है। 
हम परिवार तो बड़े शौक से बसा लेते हैं, किन्तु उसका उचित निर्माण नहीं करते। वह अपने आप स्वतंत्र रूप से कुशकंटकों की भाँति जिधर चाहता, बढ़ता और विकसित होता चला जाता है। यदि किसी चतुर माली की तरह हम अपने परिवार को एक सुन्दर वाटिका मान कर उचित पालन और निर्माण करें, तो निःसंदेह उसका एक- एक सदस्य खुशनुमा फूल की तरह गुणों की सुगंध से भर कर खिल उठे, जिससे न केवल परिवार को ही, बल्कि अन्य लोगों को भी सुख की प्राप्ति हो। 
परिवार का निर्माण बच्चों के निर्माण से प्रारंभ होता है। बच्चों का समुचित निर्माण तभी संभाव है, जब हमारे उतने ही बच्चे हों, जितनों का ठीक से पालन और देखरेख की    जा सके, जिनको शिक्षित और सुयोग्य बनाने के लिए हमारे पास साधन हों। परिस्थिति से परे अनावश्यक बच्चे पैदा करते जाने वाला गृहस्थ लाख प्रयत्न करने पर भी अपने परिवार का वांछित निर्माण नहीं कर सकता। जिस बोझ को उठाया ही नहीं जा सकता, उसको लक्ष्य तक कैसे ले जाया जा सकता है। इसलिए परिवार- निर्माण का मुख्य आधार छोटा तथा नियोजित परिवार ही मानकर चलना चाहिए। 
इस प्रकार व्यक्तिगत आचरण, घरेलू वातावरण तथा विचार विकृति दूर कर परिवार का निर्माण कीजिये, आपके घरों से कलह, क्लेश तथा फूट- टूट की दूषित विकृति दूर हो जायेगी और उसके स्थान पर सच्ची पारिवारिकता, सहयोग, प्रेम तथा पारस्परिकता की भावना बढ़ेगी, जिससे परिवार के साथ समाज तथा देश का कल्याण होगा। 

शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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