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परिवार एक संस्था है, जिसमें विभिन्न स्तर के व्यक्तियों का समुदाय न केवल साथ- साथ रहता है, वरन् एक दूसरे के साथ आत्मीयता के सूत्र में बँधता है और कर्तव्य  एवं अधिकार की आचार- संहिता का भी परिपालन करता है। इस प्रकार का जनसमुदाय जहाँ भी बनता हो, उसे निःसंकोच परिवार कहा जा सकता है। आवश्यक नहीं है कि यह परिधि थोड़े से अंश- वंश के लोगों तक सीमित रखी जाय। पारिवारिक दृष्टि जितनी छोटी होगी, उतनी ही सड़न पैदा होगी। जहाँ सड़न होती है, वहाँ मक्खी- मच्छरों, कृमि- कीटकों, दुर्गन्धित प्रवाहों एवं विषाणुओं की सेना उपज पड़ती है। परिवार दर्शन को अंश- वंश तक ही रखना और उतने को ही अनावश्यक दुलार एवं वैभव से लादते रहना, उन्हीं के लिए चिन्तित रहना मोह ग्रस्तता के लक्षण हैं। इससे न परिवार के सदस्यों का हित होगा और न संचालक का। संकीर्ण स्वार्थपरता पर आधारित मोह- ग्रस्तता यदि परिवार में पनपेगी, तो उससे पक्षपात बढ़ेगा। पक्षपात में कुछ को विशिष्ट मानना पड़ता है और उनकी सुख- सुविधा एवं प्रसन्नता का अधिक ध्यान रखना पड़ता है। यह असंतुलन आरंभ होते ही प्रकारान्तर से दूसरों की उपेक्षा होने लगती है। यह उपेक्षा अनीतिमूलक है। परिवार के सदस्यों में उनकी आवश्यकतानुरूप साधनों का न्यूनाधिक अनुमान मिलने से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि यह तर्क- संगत और कारणों पर निर्भर है। उस प्रकार की न्यूनाधिकता चलती रहती है और किसी को अखरती नहीं; किन्तु जन- औचित्य न होने पर भी अमुक को अधिक सुविधा या सम्पदा इस आधार पर दी जाती है कि अमुक अपना है, तो स्वभावतः अन्य लोग बिराने हो जाते हैं। इस स्तर का भेदभाव अन्य सभी में ईर्ष्या, द्वेष, अविश्वास एवं आक्रोश उत्पन्न करता है। विभाजन की पृष्ठभूमि यहीं से बनती है। दरारें पड़ती हैं और वे चौड़ी होती जाती हैं। विघटन का बीजारोपण कुछ के साथ पक्षपात करने से आरंभ होता है। यह वस्तुओं को कम- अधिक देने तक नहीं, प्यार, सहकार और ध्यान देने से भी संबंधित है। एक से घनिष्ठता और दूसरे से उपेक्षा का परिचय वार्तालाप और व्यवहार में ही नहीं, रुझान तक में सम्मिलित रहता है। यह अंतर छिपाये नहीं छिपता। वस्तुएँ छिपाई जा सकती हैं; पर भावनाएँ नहीं। अस्तु, पारिवारिकता को जीवंत और सक्षम रखने के लिए साम्ययोग का अभ्यास करना पड़ता    है। साम्यवाद की चर्चा आये दिन होती रहती है और उसकी व्याख्या- विवेचना में अनेक अर्थशास्त्रियों और दार्शनिकों के खोजपूर्ण प्रतिपादन प्रस्तुत होते रहते हैं, जिसमें अपने- पराये का अंतर नहीं किया जाता। सभी सदस्यों को अपना माना जाता है। न किसी को विशिष्टता प्रदान की जाती है और न किसी की उपेक्षा होती है। मोह को विष कहा गया है। वह पनपता है, तो एक को प्रसन्न करके अनेक को कष्ट देता है। आत्मीयता और संगठन की जड़ों पर मोह की कुल्हाड़ी ही कुठाराघात करती है। अस्तु, प्यार और मोह के अंतर को समझकर चलना होता है। प्यार सृजनात्मक है। मोह ध्वंसात्मक। प्यार आत्मीयता है और मोह में दुरभिसंधि। परिवार को यदि सुसंस्कृत बनाना हो, तो उसके संचालकों को कुछ के प्रति मोह की दृष्टि समाप्त करके सबके प्रति प्रेम की नीति अपनानी होगी। 
समाजवाद की चर्चा बहुत है। उसके स्वरूपों की विवेचना और प्रयोगों की संभावना पर मनोरंजन, विवाद होता रहता है; पर यदि समाजवाद का व्यावहारिक स्वरूप देखना हो, तो वह परिवार- संस्था की सुनियोजित आचार- संहिता के मध्य ही देखा जा सकता है। योग्यतानुसार श्रम, आवश्यकतानुसार ग्रहण की रीति- नीति अपनाने पर ही पारिवारिकता सुसंतुलित रह सकती है। उपार्जन करने वाले अपनी कमाई घर में जमा करते हैं और उसमें से उतना ही अंश अपने लिए स्वीकार करते हैं, जो नितांत आवश्यक है। जो सदस्य कमाऊ नहीं हैं, वे भी पारिवारिक सम्पदा का समान लाभ प्राप्त करते हैँ। बच्चे, बूढ़े, बीमार कमाते कुछ नहीं; किन्तु खर्च अन्यों के बराबर ही नहीं, कई बार अधिक चाहते हैं। उन्हें वह प्रसन्नतापूर्वक दिया जाता है। कमाने वाले का यह दावा नहीं होता कि हम अधिक योग्य हैं, अधिक कमाते हैं, इसलिए हमें सुख- साधन अधिक मात्रा में मिलने चाहिए। चूँकि असमर्थ कम कमाते हैं, अस्तु, उन्हें या तो मिलना ही नहीं चाहिए, अन्यथा यत्किंचित् देकर टरका देना चाहिए। योग्यता के अनुसार अयोग्यों के विकास का रास्ता बंद होता है। जिसकी लाठी तिसकी भैंस के पीछे यही दर्शन काम करता है कि छीन- झपट में जिसका दाँव जितना चढ़ सके, अपनी    समर्थता के आधार पर उतना ही पाने की स्वेच्छाचारिता बरते। समाज में यही दृष्टिकोण अनीति बढ़ाता और असंतोष भड़काता है। समाजवादी समाज की संरचना यदि सचमुच ही अभीष्ट हो, तो उसे परिवारों की नर्सरी में उगाया और समाज के सुविस्तृत उद्यान में लगाया जाना चाहिए। 
परिवार एक समूचा शासन- तंत्र है। उसे लगाने में प्रशासक को पूरी कुशलता अपनानी पड़ती है। शासन के अनेक पक्ष हैं। उत्पादन, संरक्षण, अभिवर्द्धन, उन्मूलन की अनेक व्यवस्थाएँ सरकार को बनानी पड़ती हैं और उनके बीच संतुलन बिठाना पड़ता है। कुशल प्रशासन के लिए ऐसी दूरदर्शिता आवश्यक है, जिसमें सर्वतोमुखी विकास का संतुलित उपक्रम भी चलता रहे और ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को खूब खेलने का अवसर भी न मिले। सरकारों के अनेक मंत्रालय होते हैं, वे अपने- अपने कार्यक्षेत्र की योजनाएँ बनाते और कार्यान्वित करते हैं। साथ ही, यह भी ध्यान रखते हैं कि उनके अत्युत्साह से अन्य विभागों में अवरोध उत्पन्न न होने पाये। शतरंज की चाल चलने में प्रतिपक्षी के आक्रमण से बचाव करते हुए अपनी गोट आगे बढ़ाने का प्रयत्न करना होता है। शासन- तंत्र भी इसी नीति से चलते हैं। परिवार का आकार छोटा है और देश का बड़ा। फिर भी देानों के बीच नीतिमत्ता, कुशलता एवं दूरदर्शिता का समान उपयोग करना होता है। अकुशल प्रशासक स्वयं बदनाम होते हैं और देश को बर्बाद करते हैं। इसी प्रकार परिवार संचालन में जहाँ सर्वतोमुखी श्रेय है, वहाँ अपयश भी कम नहीं है। प्रशासन की, नियोजन एवं संचालन की योग्यता ही इस संसार की सबसे बड़ी योग्यता मानी जाती है। मैनेजर, गवर्नर आदि के पद अति महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। हर क्षेत्र में, हर काम में सफलता व्यवस्था बुद्धि पर ही निर्भर रहती है। परिवार के सदस्यों को यही सीखना और सिखाना पड़ता है। कुशल गृह- संचालक स्वयं प्रशासक की भूमिका निभाते हैं और परामर्श में साथ रखकर अन्य सभी सदस्यों को उस कौशल में प्रवीण करते हैं। 
पारिवारिकता एक दर्शन है, जो गृहस्थी के लिए ही नहीं, विरक्तों के लिए भी अपनाये जाने योग्य हैं। कुमार और कुमारी उसमें बँधे रहते हैं। स्त्री- बच्चों का परिवार भी परिवार की परिधि में गिना जा सकता है; किन्तु इस महान् संस्था को इतने ही लोगों तक सीमित कर दिया जाना सर्वथा आपत्तिजनक है। घर में स्वभावतः कई व्यक्ति रहते हैं और वे कई स्तर के होते हैं। वयोवृद्ध, कामकाजी, प्रौढ़, विद्यार्थी, किशोर नन्हें- मुन्ने, वयस्क, महिलाएँ, छोटे- बड़े बहिन- भाई, विधवाएँ, आश्रित संबंधी आदि कई    संबंध सूत्रों से जुड़े हुए, कई व्यक्तियों को मिलाकर एक परिवार बनता है। इन सबकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति एक दूसरे से भिन्न होती हैं। कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भी भिन्न- भिन्न होते हैं। उनकी आवश्यकताएँ एवं अपेक्षाएँ भी एक- दूसरे से भिन्न प्रकार की होती हैं। इन सबका तालमेल बिठाना, हर एक को उचित सुविधा देना और हर किसी में पनपने वाली सहज विशृंखलता का नियमन करना, देखने में छोटा, किन्तु समझने में बहुत बड़ा काम है। इन्हें ठीक तरह सम्पन्न करने के लिए कुशल प्रशासक की दूरदर्शिता, संत जैसी उदार निस्पृहता और माता जैसी ममता चाहिए। इन तीनों का जो समन्वय कर लेगा, वही सफल परिवार संचालक सिद्ध हो सकेगा, अन्यथा कांजी हाउस में बंद बहेलियों को जिस तरह एक ग्वाला भूसा- पानी देता और उछल- कूद करने वालों को डण्डे से पीटता रहता है, उसी प्रकार कोई भी अनाड़ी, अविचारी कुटुम्ब को बढ़ाता और उसकी दुर्गति का भौंडा खेल खेलता रह सकता है। 

शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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