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लौकिक जीवन में मनुष्य को अनेक कठिनाइयों, समस्याओं और उलझनों का सामना करना पड़ता है। ये गलतियाँ मनुष्य को मानसिक रूप से थका डालती हैं और कभी  जीवन को नीरस तथा बोझिल भी बना देती हैं। यदि मनुष्य पर पारिवारिक उत्तरदायित्व न हों, तो इन चुनौतियों का सामना भी न कर पाये और इन्हें उत्पन्न होने की नौबत भी न आने दे। जबकि प्रगति के लिए संघर्ष करना और प्रतिकूल परिस्थितियों की चुनौतियाँ स्वीकार करना, उनका मुकाबला करना अनिवार्य है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होना चाहता है। इस महत्त्वाकाँक्षा का मूल अपने परिवार को सुखी रखने की भावना ही है, अन्यथा एकाकी व्यक्ति थोड़े से समय और थोड़े से श्रम द्वारा अपनी आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है। लेकिन जब परिवार का दायित्व साथ आकर जुड़ जाता है, तो अधिक श्रम और अधिक समय लगाने की आवश्यकता होती है। यही नहीं, व्यक्ति आर्थिक उत्कर्ष के लिए नयी- नयी योजनाएँ भी बनाने लगता है, उन्हें क्रियान्वित करने के उपाय ढूँढ़ता रहता है तथा क्रियान्वयन    में आने वाली कठिनाइयों को हँसकर झेलने के लिए तैयार रहता है। 
इस अर्थ में परिवार मनुष्य को प्रगति की प्रेरणा देता है। मनुष्य ने जब से परिवार बनाना सीखा, तभी से मानव- सभ्यता का विकास हुआ, अन्यथा जब वह आदिम स्थिति में रहता था, तो पेड़ों पर या गुफाओं में सो लेता, शिकार करके अपना पेट भर लेता तथा नितान्त आदिम पाशविक ढंग से अपनी गुजर- बसर कर लेता था। सर्वप्रथम जब किसी मनुष्य को घर बसाकर रहने की सूझी होगी, तब से उसे अपना परंपरागत जीवनक्रम बदलना पड़ा होगा और उसे जीविकोपार्जन के लिए कोई नियमित व्यवसाय अपनाने के साथ- साथ, पत्नी- बच्चों की सुरक्षा के प्रबंध की बात भी सोचनी पड़ी होगी। उसी बिन्दु से मानवीय सभ्यता की प्रगति आरंभ हुई और आज हम उस बीज से अंकुरित हुए वृक्ष को उन्नत सभ्यता और संस्कृति के रूप में देख रहे हैं। इसीलिए डॉ. बरनार्ड हेल्डर ने कहा है, कदाचित् मनुष्य ने परिवार बसाने की    न सोची होती, तो हम आज इस स्थिति में न रह पाते; क्योंकि परिवार में पत्नी पुरुष की समस्त प्रेरणाओं और बाहरी गतिविधियों को जाग्रत् करती है। वह अपने साथ- साथ पति को भी परिवार सहित ऊँचा उठने तथा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। यदि आदमी ने घर न बसाया होता, तो इसमें जरा भी शक नहीं है कि वह आज भी पेड़ों    पर उछलता फिरता और गुफाओं में निवास करता। 
लेकिन यह सब तभी संभव हुआ है, जबकि पति- पत्नी स्वार्थ और संकुचितता को छोड़कर एक दूसरे के लिए अधिक से अधिक त्याग करने और उदारता बरतने के लिए तैयार रहते हैं। पारिवारिक विषयों पर लिखने वाले एक लेखक का कहना- ‘गृहस्थी एक साझे की दुकान है। इस दुकान के दो प्रधान साझेदार हैं- स्त्री और पुरुष। यह दुकान    तभी फलती- फूलती और लाभ देती है, जबकि यह दोनों साझेदार एक- दूसरे के स्वभाव, प्रकृति, गुण, दोष, आवश्यकता और विशेषता को समझते हों। एक- दूसरे के स्वभाव ज्ञात न होने से उनका साझा भली- भाँति नहीं चल सकता।’ ऐसा इसीलिए है कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को किसी स्वतंत्र इकाई के रूप में नहीं रचा है। उन दोनों के संयोग- समन्वय से ही एक इकाई का निर्माण होता है। जिस प्रकार धन और ऋण विद्युत् के तारों के मिलने पर ही कोई विद्युत् यंत्र चलता है, उसी प्रकार मानवीय व्यक्तित्व या पारिवारिक सुव्यवस्था का निर्माण पति- पत्नी के परस्पर त्याग, उत्सर्ग और उदार व्यवहार से ही होता है। 
परिवार को एक तपोभूमि, आश्रम- स्थली और पुण्यधाम की गरिमा देने का यही कारण है। स्वतंत्र रूप से पुरुष और स्त्री अपूर्ण हैं; क्योंकि विधाता ने उनके व्यक्तित्व को अपने आप में पूर्ण नहीं रचा। उनके व्यक्तित्व में एक अभाव, एक कमी और एक त्रुटि रखी है। उस कमी की पूर्ति वे परिवार संस्था का निर्माण करके ही कर सकते हैं और एक- दूसरे के उत्कर्ष में सहायक हो सकते हैं। स्त्री के स्वभाव का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है- ‘स्त्री में लज्जाशीलता, चारुता, सहज ज्ञान, कोमलता, सूक्ष्मता और भावुकता जैसे गुणों का बाहुल्य रहता है। वे मानसिक संवेगों को तीव्रता से अनुभव करती हैं। वे स्नेह- सरोवर की मीन हैं, उन्हें रूप- लावण्य की अनुपम राशि प्रदान की गयी है। शांतिप्रियता, स्नेहशीलता और धैर्य की मात्रा भी उनमें काफी है।’ 
इसी प्रकार पुरुष- स्वभाव की विशेषताओं का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है- ‘पुरुष की प्रकृति आक्रामक गुणों से भरी पड़ी है। उसमें शक्ति, क्रोध, कार्य- दक्षता तथा अहं की प्रधानता है। क्रियाशीलता और प्रभुता का प्रदर्शन उसके प्रमुख गुण हैं। वह स्वभावतः मजबूत, निर्णायक, प्रामाणिक ,, स्वाभिमानी, प्रचण्ड, उग्रदाता, उदार और कठोर परिश्रमी होता है।’ 
इन विश्लेषणों के बाद यह सिद्ध हो जाता है कि पुरुष क्रियाशक्ति प्रधान है, तो स्त्री के स्वभाव में नियंत्रण करने की सामर्थ्य है। अकेली क्रिया ही क्रिया हो, तो कहीं भी, किसी भी दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाती। दिशाहीन और किनारों को तोड़कर उफनती नदी जिस प्रकार विनाश ही उत्पन्न करती है, उसी प्रकार अनियन्त्रित और अस्थिर क्रियाशीलता से भी कोई सृजनात्मक परिणाम प्राप्त नहीं किये जा सकते। अतएव पौरुष के साथ उसे दिशा देने वाली व्यावहारिक बुद्धि भी चाहिए और उस व्यावहारिक बुद्धि का प्रतिनिधित्व करती है स्त्री, जो प्रेमपूर्वक अपने पति पर शासन करती है तथा उसे दिशा और दायित्व का बोध प्रदान करती है। 
पारिवारिक गरिमा को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि स्वार्थ की भावना को कम किया जाय और जीवन साथी के सुख को प्रधानता दी जाय। अपनी माँग के स्थान पर साथी के संतोष की भावना जैसे ही विकसित की जायेगी, वैसे ही परिवार का महत्त्व और उसके निर्माण का उद्देश्य सार्थक तथा साकार होता चला जायेगा। यह कर्तव्य किसी साथी विशेष का नहीं है, वरन् पति- पत्नी दोनों ही एक- दूसरे क निमित्त,त्याग और बलिदान की भावना विकसित करें, दोनों ही एक दूसरे को सुखी देखने का प्रयत्न करें। अपने जीवन साथी के लिए अधिक से अधिक सचेष्ट रहने को प्रस्तुत हों, तब स्वार्थ और अपनी माँग के स्थान पर उदारता तथा सहिष्णुता का विकास होगा और जीवन क्रम सुख- शांति तथा प्रगति की ओर अग्रसर हो सकेगा। 
सही अर्थों में ऐसे परिवार को ही कर्त्तव्यनिष्ठा गृहस्थ की संज्ञा दी जा सकती है। इसी प्रकार गृहस्थाश्रम में पति- पत्नी के स्वभाव में एकरूपता आकर पूर्णता की प्राप्ति होती है और परिवार तथा समाज के सुख, समृद्धि तथा प्रगति की आधारशिला तैयार होती है। परिवार की गरिमा को बनाये रखने के लिए स्वार्थ का त्याग ही एक मात्र उपाय है, दूसरा और कोई नहीं। 
शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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