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बाबू राजेन्द्र प्रसाद का विद्यारंभ संस्कार उस जमाने के रिवाज के अनुसार एक मौलवी के पास उर्दू- फारसी में कराया गया था। नतीजा यह हुआ कि वे स्कूल और कालेज में भी इण्टर तक अँग्रेजी के साथ उर्दू- फारसी ही पढ़ते चले गये; पर जब वे कलकत्ता जाकर बी.ए. में भर्ती हुए, तो उनके सामने कई भाषाओं में से एक को चुनने का प्रश्र उपस्थित हुआ। यद्यपि उन्होंने अभी तक हिन्दी नहीं पढ़ी थी और कॉलेज में हिन्दी के अध्ययन की व्यवस्था नहीं थी, तो भी उनका झुकाव विशेष रूप से हिन्दी की तरफ हुआ। संभवतः इसका कारण उनकी राष्ट्रीय और जातीय भावनाएँ ही थीं। उनके कई मित्रों ने कहा कि तुम हिन्दी लेकर बड़ी गलती करोगे। जब अभी तक तुमने उसे कभी नहीं पढ़ा, तब एकाएक बी.ए. में उसे लेने का नतीजा यह होगा कि उसमें तुम्हें बहुत कम अंक मिलेंगे और तुम्हारी डिवीजन खराब हो जायेगी; पर राजेन्द्र बाबू ने उनका समाधान यह कहकर कर दिया कि ‘हिन्दी तो हमारी मातृभाषा है, उसके न सीखने या नम्बर कम आने का संदेह करना व्यर्थ है। हमको आखिर अपनी मातृभूमि और मातृभाषा की सेवा करके अपना कर्त्तव्य पालन करना ही होगा। तब उसको बिना सीखे कैसे काम चल सकता है?’ 
      उन्होंने सब प्रकार की शंकाओं को त्यागकर हिन्दी ही ली और घर पर निजी तौर पर अध्ययन करके बहुत अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण हो गये। 
राजेन्द्र बाबू ने जैसे सोचा था, वही कुछ समय पश्चात् सामने आया। राष्ट्रीय आंदोलन के साथ देश में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता और उसके प्रचार के लिए प्रयत्न करने की तरफ नेताओं का ध्यान गया। श्री पुरुषोत्तम दास जी टण्डन तथा उनके सहयोगियों ने प्रयाग में, हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रभाषा के रूप में समस्त भारत में हिन्दी का प्रचार करना था। सम्मेलन का तीसरा वार्षिकोत्सव सन् १९१३ में कलकत्ता में हुआ और राजेन्द्र बाबू को स्वागत समिति का प्रधानमंत्री बनाया गया। उसी समय पटना में ऑल इण्डिया काँग्रेस का अधिवेशन हो रहा था; पर आप हिन्दी साहित्य सम्मेलन की व्यवस्था में इतने व्यस्त रहे कि पटना न जा सके। सन् १९२३ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी बनाये गये। प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनों के कई अधिवेशनों में आपने अध्यक्षता की थी। 
      आपने जो हिन्दी प्रचार का कार्य १९१३ में उठाया था, वह आजन्म चलता रहा। आगे चलकर आप ही सम्मेलन की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष बनाये गये और उसके द्वारा मद्रास तथा आसाम जैसे दूरवर्ती प्रान्तों में वर्षों तक हिन्दी के पठन- पाठन और प्रचार की व्यवस्था की गयी। कुछ लोग उस समय इस प्रचार की उपयोगिता न समझकर उसकी विपरीत आलोचना करते थे। ऐसे लोगों को उत्तर देते हुए आपने लिखा था- 
      ‘राष्ट्र के लिए राष्ट्र भाषा आवश्यक है और वह भाषा हिन्दी ही हो सकती है। इसमें दक्षिण वालों ने पूरा सहयोग दिया। इधर कई वर्षों से इस कार्य में होने वाला वहाँ का सारा खर्च, वहाँ के लोगों से ही मिल जाता है और उत्तर भारत से धन नहीं भेजना पड़ता। मैं समझता हूँ कि इसी प्रकार अन्य हिन्दी प्रान्तों में भी कुछ दिनों काम करने के बाद हमारा वैसा ही अनुभव होगा।’ हिन्दी प्रचार को मैं भीख की झोली नहीं मानता और न यह मानता हूँ कि इसके पीछे कोई द्वेष बुद्धि है। इसका एक उद्देश्य है कि सारे देश के लिए एक राष्ट्र भाषा का प्रचार। किसी भी प्रान्तीय भाषा को मिटाने या कमजोर करने की इच्छा किसी के दिल में स्वप्न में भी नहीं आयी और न आवेगी। हम राष्ट्र के प्रति अपना कर्त्तव्य मात्र कर रहे हैं और उसके करते रहने में ही हमारा और देश का कल्याण है। 


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