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व्यक्ति और समाज का पारस्परिक घनिष्ठ संबंध है। यदि समाज समुन्नत और शिक्षित व चरित्रवान् है, तो उसमें रहने वाला एक नवीन व्यक्ति भी उसी प्रकार बनने का प्रयत्न करेगा। इसके विपरीत, यदि समाज में बुरे लोगों का बहुमत है, तो हो सकता है कि वह सारा समाज ही एक न एक दिन शिष्ट व शिक्षित लोगों के द्वारा निन्दनीय बन जायेगा। जब हम वर्तमान समाज पर अपनी दृष्टि डालते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि आज मानवता की किरणें प्रकाशहीन सी बन चुकी हैं। मानवता के स्थान पर दानवता ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। 
      जब किसी भी महापुरुष की दृष्टि समाज सुधार की ओर जाती है, तो उसके सामने दो ऐसी बड़ी कमियाँ आती हैं, जो सामाजिक पतन का मुख्य कारण हैं। उनमें एक है- व्यक्तिगत स्वार्थ और दूसरी है- पुरुषार्थ। व्यक्तिगत स्वार्थ की मात्रा यहाँ तक चढ़ चुकी है कि ऐसा व्यक्ति जो स्वार्थ साधन में लगा हुआ है, वह अपने कुटुम्ब अथवा सगे- संबंधियों से भी इस कार्य में नहीं चूकता और इसके साथ ही साथ दानवता का इतना विकास हो चुका है कि हमारे व्यवहार से दूसरे का अहित भले ही हो जावे अथवा दूसरे को अपने प्राणों से ही हाथ क्यों न धोना पड़े; किन्तु हमारे स्वार्थ की पूर्ति अवश्य होनी चाहिए। ब्लैक मार्केट, रिश्वतखोरी और मिलावट इसका छोटा, किन्तु व्यापक उदाहरण है। इससे समाज का कितना प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अहित होता है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इन्हीं बातों से एक सबसे बड़े रोग की उत्पत्ति होती है, जिसे कहते हैं मानसिक चिन्ता। मानसिक चिन्ता का सारे शरीर पर कितना प्रभाव पड़ता है, इसे सीमाबद्ध करना कठिन है। हार्टफेल इस मानसिक चिन्ता की ही देन है। आज अधिकांश व्यक्ति हार्टफेल की बीमारी के शिकार बन जाते हैं। 
      कुछ वर्ष पूर्व की एक सत्य घटना है- एक सेठ ने ४२ रुपये प्रति मन के भाव से कई बोरे शक्कर खरीदी और जब ६२ रुपये भाव हुआ, तो बेच दी। इसका मतलब हुआ कि उसे ५० प्रतिशत लाभ हो गया; किन्तु दूसरे दिन जब उसके मुनीम ने उन्हें ये सूचना दी कि सेठजी शक्कर का भाव आज ८२ रुपये हो गया है, तो यह सूचना सुनते ही सेठजी का हार्टफेल हो गया। ऐसा क्यों हुआ? वास्तव में उनके व्यक्तिगत स्वार्थ और मानसिक चिंता ने उनके हृदय को पहले से ही जर्जर कर दिया था, जो इस आघात को सहन नहीं कर सका। अहर्निश केवल अपने स्वार्थ चिंतन में लगा मनुष्य मानसिक घात- प्रतिघातों का सामना करते- करते आंतरिक संतुलन को स्वयं ही खो बैठता है। प्रत्येक व्यक्ति दंभ, छल, कपट के द्वारा अपने को पूर्ण सच्चा बतलाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है। 
      इसके बाद जो दूसरी कमी आती है, वह है पुरुषार्थ- हीनता। इसी कमी ने भारतवर्ष को अब तक परतंत्र तथा पतनोन्मुख बनाये रखा। जब हमारी दृष्टि दूसरे देशों की ओर पड़ती है, तो हमें उनमें सबसे पहली बात जो दिखाई पड़ती है, वह है उनका पुरुषार्थ एवं अथक परिश्रम। अन्य देशों में पुरुषार्थ का जितना बोलबाला है, भारतवर्ष में उतना ही आलस्य का साम्राज्य है। यहाँ का प्रत्येक व्यक्ति कम से कम पुरुषार्थ के द्वारा अधिक से अधिक धन प्राप्ति की चेष्टा करता है और यदि कहीं उसे बैठे ही बैठे सारी सामग्रियों की उपलब्धि हो जाती है, तो वह अपने को बड़ा सौभाग्यशाली मानता है। मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है, जो शरीर से बिल्कुल स्वस्थ, पुष्ट एवं नवयुवक हैं; किन्तु फिर भी दूसरों के सामने हाथ फैलाकर भीख माँगने से नहीं लजाते; क्योंकि वे अपने शरीर के द्वारा कुछ परिश्रम करना ही नहीं चाहते। एक तो लोगों में शारीरिक शक्ति ही नहीं है; किन्तु जो शरीर से कार्य कर सकते हैं, पोजीशन के भय से वे कार्य में हाथ ही नहीं लगाते। प्रायः ऐसे भी लोग देखे जाते हैं, जो अपना छोटा सा हैण्डबैग लेकर भी नहीं चल सकते और स्टेशन पर कुली की राह देखा करते हैं। यहाँ के नौजवान लड़कों में विलासिता ने इतना घर कर लिया है कि उन्हें स्वयं अपना काम अपने हाथ से करने में शर्म आती है और थोड़े- थोड़े परिश्रम से भी जी चुरा कर भागना चाहते हैं। 
      इसी स्वार्थ और पुरुषार्थहीनता से आज प्रत्येक व्यक्ति का जीवन चिंताओं से ग्रस्त है। यूँ तो शरीर व्याधि- मंदिर ही होता है; किन्तु चिंतित पुरुष तो स्वयं ही अनेक रोगों का आह्वान करता है। कहावत है कि चिता तो मरने के बाद मनुष्य को जलाती है; किन्तु चिंता जीवित मनुष्य को ही जलाती रहती है। यदि मनुष्य के अंदर चिंताएँ नहीं हैं, पर शरीर से निर्बल है, तो उसे अधिक कष्ट प्रतीत नहीं होगा। किन्तु यदि किसी व्यक्ति का शरीर पुष्ट है, लेकिन उसे मानसिक चिंताएँ घेरे हुए हैं, तो उसे रात में सुख की नींद नहीं आ सकती। उसे भोजन का स्वाद भी पूरा- पूरा नहीं आ सकता। यह मानसिक चिंताओं का प्रभाव है। 
      अब सब से बड़ी समस्या है समाज सुधार की। समाज का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर अलग- अलग पड़ता है। समाज सुधार के आज अनेक उपाय हो रहे हैं, किन्तु सुधार की आशा पूरी होती नहीं दीखती। इसका एक विशेष कारण है, वह यह कि मनुष्य के अंदर प्रत्येक वस्तु को ग्रहण करने की दो शक्तियाँ हैं। वे हैं मस्तिष्क और हृदय। इन दोनों में भी हृदय शक्ति का विशेष स्थान है। जब तक मनुष्य का हृदय किसी वस्तु को ग्रहण करने की गवाही नहीं देता, तब तक वह उसे ग्रहण नहीं करता। यद्यपि बहुत से लोग तर्क करके किसी बात को ग्रहण करते हैं, किन्तु यह बात भी हृदय पर आधारित है। तर्क के पश्चात् उनका हृदय उस वस्तु को ग्रहण करने के लिए बाध्य हो जाता है। 
      साधारण सी बात है, आज मादक वस्तुओं के परित्याग के लिए सरकार की ओर से कितने नये- नये कानून बनते हैं, किन्तु क्या वहाँ मादक वस्तुओं का प्रयोग बंद हो गया? यदि कानपुर में शराबबंदी का कानून जारी हो जाता है, तो लोग लखनऊ में जाकर शराब पीने के शौक को पूरा करते हैं। इन सबका कारण यही है कि कानून आज तक किसी के हृदय को बदल नहीं पाया। जिस दिन उनके हृदय में यह विश्वास हो जायेगा कि मादक वस्तुओं का सेवन बुरा है, उसी दिन से वे उनका उपयोग करना त्याग देंगे। इसकी कई एक घटनाएँ मेरे सामने की हैं- उनमें दो प्रमुख घटनाएँ हैं। 
      जब तक मनुष्य के हृदय का सुधार नहीं होता, तक तक वास्तविक उन्नति दुर्लभ है। आज धनी- निर्धन, गरीब- अमीर, मिल- मालिक, नेता और जनता सभी के हृदयों में अशांति का साम्राज्य छाया हुआ है। एक पक्ष दूसरे पक्ष की कटु आलोचना करने में अपने कर्त्तव्य को अधिकांश पूरा हुआ मानता है, इस प्रकार अशांति के बीज बोकर वे शांति की नींद नहीं सो सकते। इन सब बातों को दूर करने के लिए एक मात्र हृदय का सुधार ही परमावश्यक है। 
महात्मा गाँधीजी ने एक सज्जन के प्रश्रोत्तर में कहा था कि जिस प्रकार एक दूसरा व्यक्ति बिना भोजन किये जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार बिना ईश्वर की प्रार्थना व सत्संग के मैं जीवित नहीं रह सकता। उनका कहना था कि जिस प्रकार अन्न शरीर का भोजन है, उसी प्रकार प्रार्थना व सत्संग हृदय और बुद्धि का भोजन है। महात्मा गाँधी की दैनिक प्रार्थना और प्रातःकाल उनका प्राइवेट सत्संग नित्य होता था। मानव जीवन के सुधार के लिए सत्संग एक अनुभूत साधन है। जिस प्रकार जल, भोजन व वायु से शरीर की रक्षा होती है, उसी प्रकार बुद्धि को प्रबल व हृदय को पुष्ट बनाने के लिए सत्संग, प्रार्थना व स्वाध्याय की परमावश्यकता है। सत्संग ही एक ऐसा सुगम साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य के हृदय का पूर्ण परिवर्तन हो सकता है। सत्संग से ही ऋषि बाल्मीकि की दानवता मानवता में बदल गयी। सत्संग से उनके हृदय में उस दानवता के प्रति घोर घृणा उत्पन्न हो गयी और उन्होंने उसे त्याग दिया। 


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