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मनुष्य की सर्वोपरि सम्पदा उसकी चरित्रनिष्ठा है। यह एक ऐसा शब्द है, जो मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उद्बोधन करता है। व्यक्तिगत जीवन में कर्त्तव्य परायण, सत्यनिष्ठा, पारिवारिक जीवन में स्नेह- सद्भाव एवं सामाजिक जीवन में शिष्टता- शालीनता, नागरिकता आदि आदर्शों के प्रति जिस व्यक्ति में अगाध निष्ठा है और जो प्रतिपल इन आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात् करता है, उसे चरित्रवान् कहा जा सकता है। किसी भी राष्ट्र या समाज की उन्नति का आधार वहाँ के भौतिक साधन, खनिज सम्पदा या उर्वर भूमि नहीं होते, वरन् किसी देश का उत्कर्ष उसके चरित्रवान नागरिकों पर निर्भर करता है। 
      चरित्रवान व्यक्तियों की प्रामाणिकता पर हर कोई विश्वास करता है तथा उन्हें सम्मान देता है। यही नहीं, उनके प्रति श्रद्धा भी लोगों के हृदय में उमड़ती रहती है। यह श्रद्धा ही उनकी मूल्यवान सामाजिक सम्पत्ति होती है। स्वामी विवेकानन्द ने इस संदर्भ में कहा है- संसार का इतिहास उन थोड़े- से व्यक्तियों द्वारा बनाया गया है, जिनके पास चरित्रबल का उत्कृष्ट भण्डार था। यों कई योद्धा और विजेता हुए हैं, बड़े- बड़े चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, किन्तु इतिहास ने केवल उन्हीं व्यक्तियों को अपने हृदय में स्थान दिया है, जिनका व्यक्तित्व समाज के लिए मानव जाति के लिए एक प्रकाश स्तंभ का काम कर सका है। 
चरित्रवान् व्यक्ति के लिए अपना स्वार्थ नहीं, दूसरों का, समाज का हित मुख्य रहता है। इसी कारण वे सामूहिक हितों या परमार्थ प्रयोजनों के लिए अपने स्वार्थ का ही नहीं, अपने अस्तित्व का भी परित्याग कर देते हैं। घटना पेरिस में हुई राज्य क्रान्ति के समय की है। तब क्रान्तिकारियों का दमन कर दिया गया था और उन्हें जेल में बंद किया जा चुका था। उन्मत्त विक्षपी सैनिकों ने उनमें से एक को पहचाना। जिसका नाम था- ऑवी सिफार्ड। वह एक प्रख्यात पादरी था। सैनिकों ने सहज श्रद्धावश उन्हें निकल जाने को कहा। इस पर सिफार्ड ने कहा- यदि तुम लोग मेरे बदले उस तरुण स्त्री को निकल जाने दो, जो गर्भवती है, तो मुझे मरकर भी प्रसन्नता होगी। माना कि हम लोगों ने राजनियम भंग किया है, किन्तु उस नारी के गर्भ में पल रहे मासूम जीव को तो उसकी निर्दोषिता का पुरस्कार मिलना ही चाहिए। दमनकारियों ने पादरी का प्रस्ताव माना या नहीं, यह और बात है, परन्तु पादरी ने जिस करुणा और दयार्द्रता का परिचय दिया- उसने ऑवी सिफार्ड को इतिहास में अमर कर दिया। 
      आदर्शवादी चरित्रवान् व्यक्ति स्वयं अपना जीवन तो धन्य बना ही लेते हैं, समाज में भी एक ऐसी स्वस्थ परिपाटी आरंभ कर जाते हैं कि उसका लाभ समाज को लम्बे समय तक मिलता रहता है। रूसी राज्य क्रांति के समय की घटना है जब वहाँ के नागरिकों में अत्याचार और अन्याय चल रहा था। मास्को के एक पादरी रेबरैण्ड मुलन वर्ग ने अचानक ही अपने जीवन की दिशा बदल दी। जो आजीवन लोगों को शान्ति, क्षमा और ईसा की उस शिक्षा का उपदेश देता रहता था, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई तुम्हारे बाँये गाल पर एक तमाचा मारे तो तुम दूसरा भी उसके आगे कर दो- वह क्रांति की बात करने लगा। मास्को की एक धर्म सभा में उन्होंने कहा- हर जीच का एक समय होता है, पर अब वह समय नहीं है। समय बदल गया है और अब समय लड़ने का है, संघर्ष करने का है। हमें अन्याय और अत्याचार से जूझना चाहिए। इसे युग धर्म कहते हैं। यह कहकर उन्होंने अपनी धार्मिक वेशभूषा उतार दी और क्रांतिकारी का वेश पहनकर धर्म सभा में आ गये। उनके इस कथन का लोगों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि कुछ ही समय में उनके साथ क्रांतिकारियों का एक बड़ा दल सम्मिलित हो गया। रेवरैण्ड ने पहले क्रान्ति में और फिर विश्वयुद्ध के समय जर्मन सेनाओं का मुकाबला करने में वीरता दिखाई, तो उन्हें मेजर जनरल की उपाधि से विभूषित किया गया। 
      आदर्शों के प्रति निष्ठा, सामाजिक हितों के लिए उत्सर्ग का साहस व्यक्तित्व को इतना तेजस्वी बनाता है कि अनायास ही उस व्यक्ति के प्रति लोकश्रद्धा का उफान उमड़ने लगता है। जब किसी समाज या राष्ट्र पर संकटों के बादल घिर आते हैं, तो जनसमुदाय ऐसे चरित्रवान्, उत्साही और साहसी व्यक्तियों से ही मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है और उसे अपना नेतृत्व सौंपता है। जब रोमन साम्राज्य पर संकट आया था, तो शासन सभा के सदस्यों ने एक ऐसे व्यक्ति को व्यवस्था का सूत्र संचालन सौंपा था, जो सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा था। नाम था उसका सिनसिनेट्स। वह अपने तेजस्वी व्यक्तित्व और आदर्श चरित्र के बल पर एक बार पहले भी राज प्रमुख के पद पर पहुँच चुका था। जब संकट की घड़ियाँ आईं, तो एक बार फिर सभासद उसके पास पहुँचे। उस समय सिनसिनेट्स अपने खेत में काम कर रहा था। सभासदों ने उसके सम्मुख समस्त परिस्थितियों का विश£ेषण किया और उसे असीमित अधिकार दिये। राष्ट्रीय संकट की इन घड़ियों में देश की जनता ने उसके प्रति जो विश्वास व्यक्त किया, उसने उसे न केवल कायम रखा, वरन् उसे और भी पुष्ट बनाया। देश जब संकट के दौर को पार कर चुका, उसने उत्तराधिकारियों को वापस अपने अधिकार सौंप दिये और स्वयं शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। 
      देशभक्ति या राष्ट्र प्रेम, व्यक्ति के चरित्र का एक अनिवार्य अंग है और जिन देशवासियों में अपने राष्ट्र के प्रति जितनी गाढ़ी भक्ति होगी, उसमें सुव्यवस्था, शांति और समुन्नति के आधार उतने ही पुष्ट होते चले जायेंगे। राष्ट्र का अर्थ- अपना समाज, देश परिवार ही तो है। हम सभी उसकी एक- एक इकाई हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि इन दिनों अपने देश समाज में सर्वत्र स्वार्थपरता, बेईमानी, बदनीयती और भ्रष्टाचार ही संव्याप्त है। चरित्रनिष्ठ आदर्श नेतृत्वों का एक प्रकार से अभाव ही दीखता है। जन सामान्य में भी चारित्रिक मूल्यों के प्रति आस्था कम होती जा रही है और आदर्शों की अवहेलना की जाने लगी है। यह अवहेलना- उपेक्षा ही व्यक्तिगत प्रगति एवं राष्ट्र की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। 
      वस्तुतः इतिहास ने उन महापुरुषों का ही गुणगान किया है, जिन्होंने अपने समाज को, राष्ट्र को नये जीवन मूल्य, चरित्र के नये मापदण्ड दिये और आदर्शों की समयानुकूल परिभाषा अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व के माध्यम से की है। चरित्र- मानवीय सद्गुणों के उस समुच्चय का नाम है, जो व्यक्ति के समग्र जीवन को आच्छादित करते हैं और जीवन तथा व्यवहार के सभी क्षेत्रों में उसे प्रामाणिक सिद्ध करते हैं। चरित्र साधना से व्यक्तिगत जीवन में सरसता तथा सामाजिक जीवन में सुव्यवस्था आती है, परिणामस्वरूप राष्ट्रीय प्रगति की संभावना बढ़ती है। 


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