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किसी भी मनुष्य, समाज या राष्ट्र की उन्नति का लक्षण है- सुख, शांति और सम्पन्नता। यह तीनों बातें एक- दूसरे पर उसी प्रकार निर्भर है जिस प्रकार किरणें सूर्य पर और सूर्य किरणों पर निर्भर हैं। जिस प्रकार किरणों के अभाव में सूर्य का अस्तित्व नहीं और सूर्य के अभाव में किरणों का अस्तित्व नहीं, उसी प्रकार सुख- शांति के अभाव में सम्पन्नता की संभावना नहीं और बिना सम्पन्नता के सुख- शांति का अभाव रहता है। 
      यदि गंभीर दृष्टि से देखा जाय, तो पता चलेगा कि आरामदेह जीवन की सुविधाएँ सुख- शांति का कारण नहीं हैं बल्कि निर्विघ्न तथा निर्द्वन्द्व जीवन प्रवाह की स्निग्ध गति ही सुख- शांति का हेतु है। जिसका जीवन एक स्निग्ध तथा स्वाभाविक गति से ही बहता चलता जा रहा है, सुख शांति उसी को प्राप्त होती है। इसके विपरीत जो अस्वाभाविक एवं उद्वेगपूर्ण जीवनयापन करता है, वह दुःखी तथा अशांत रहता है। विविध प्रकार के कष्ट और क्लेश उसे घेरे रहते हैं। ऐसा व्यक्ति एक क्षण के लिए भी सुख- चैन के लिए तरसता रहता है। कभी उसे शारीरिक व्याधियाँ त्रस्त करती हैं, तो कभी वह मानसिक यातनाओं से पीड़ित होता है। 
      उन्नत जीवन के लिए जिस सुख- शांति एवं सम्पन्नता की आवश्यकता है, उसे प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्राकृतिक अनुशासन में रहकर ही क्रियाशील होना पड़ेगा। मनुष्य जीवन की तुलना में यदि इस प्रकृति के जीवन, उसके अस्तित्व को देखें तो पता चलेगा कि जड़ होते हुए भी प्रकृति कितनी हरी- भरी और फल- फूलों से सम्पन्न है, किन्तु मनुष्य सचेतन प्राणी होते हुए भी कितना दीन -हीन और दुःखी है। 
      इसका मूल कारण प्रकृति का निश्चित नियमों के अंतर्गत अनुशासित होकर चलना है। समस्त नक्षत्र, तारे तथा ग्रह- उपग्रह एक सुनिश्चित अवस्था तथा विधान के अनुसार ही क्रियाशील रहते हैं। वे अपने निश्चित विधान का व्यतिक्रम नहीं करते। कोई लाख प्रयत्न क्यों न करें, कोई भी ग्रह अथवा उपग्रह अपने उदय, अस्त एवं परिभ्रमण की गतिविधि में कोई परिवर्तन न करेगा। लाख घड़ों से सींचने पर कोई पेड़- पौधा बिना ऋतु के फल- फूल उत्पन्न न करेगा। 
      जो विश्व विधान समस्त सृष्टि पर लागू है, उसका एक अंश होने से वही विश्व विधान मनुष्य पर भी लागू है। जिस प्रकार निश्चित नियम का उल्लंघन करते ही सितारे टूट जाते हैं। धरती हिल उठती है, उसी प्रकार अपने नैतिक नियमों का उल्लंघन करने पर मनुष्य का सारा जीवन ही अस्त- व्यस्त हो जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है। मानसिक शांति समाप्त हो जाती है और आत्मा का अधःपतन हो जाता है। मनुष्य सुख- शांति का पात्र बनने के स्थान पर दुःख दर्द और कष्ट क्लेशों का भण्डार बन जाता है। 
      मनुष्य को सृष्टि एवं साधन के रूप में जो कुछ मिला है वह समुचित उपयोग के लिए ही मिला है। वह सब इसलिए है कि इसकी सहायता से मनुष्य जीवन को अधिकाधिक समुन्नत तथा सुन्दर बनाये, सुख- शांतिपूर्वक अपनी पूरी आयु का उपयोग करे। मनुष्य जीवन अल्पायु अथवा अरूपता के लिए नहीं मिला है। वह अपने में सत्यं, शिवं, सुंदरम् की उपलब्धि करने के लिए ही प्राप्त हुआ है। नियामक ने मनुष्य को विवेक शक्ति देकर अवश्य ही यह अपेक्षा की होगी कि वह संसार का सबसे स्वस्थ, सुन्दर और शक्ति- सम्पन्न प्रतीक बने। वह अपने कर्त्तव्य से संसार को सुन्दरतम् बनाये और निर्माता का सच्चा प्रतिनिधित्व करे। किन्तु मनुष्य का स्वरूप तथा उसका कार्यकलाप इस अपेक्षा से बिल्कुल विपरीत दृष्टिगोचर होता है। वह दिन- दिन अस्वस्थ, असुन्दर, अस्त- व्यस्त होता जा रहा है। 
      यह निर्विवाद सत्य है कि मनुष्य जब तक नियत- नियमों के अनुशासन में होकर नहीं चलेगा, तब तक दिन- दिन उसका पतन ही होता जायेगा, वह दिन- दिन और अधिक विपन्नतापूर्ण अशांति से घिरता जायेगा। वह यों ही रोयेगा- चिल्लायेगा और पग- पग पर नारकीय यातना पाता हुआ कीड़े- मकोड़े की तरह मरता रहेगा। 
      जब सृष्टि के सारे साधन, सारे उपकरण और समस्त संपदाएँ सुख- साधन करने के लिए ही मिली हैं, तो क्या कारण है कि उनके रहते, उनका उपयोग करते हुए भी मनुष्य दीनता, दयनीयता और दुःख को प्राप्त होता जा रहा है, जो दूध, दही, घी अन्न आदि पदार्थ मनुष्य को बच्चे से बड़ाकर जवान कर देते हैं, स्वास्थ्य एवं सुंदरता प्रदान करते हैं, एक दिन मनुष्य उन्हीं का उपयोग करता- करता रोगी बन जाता है, क्षीण हो जाता है और सारी शक्ति खो देता है। 
      इसका कारण है मनुष्य का असंयम एवं नियत नियमों के प्रति विद्रोह। जो विद्युत् शक्ति मनुष्य के बड़े- बड़े कार्य सम्पादित करती है, वही बिजली अनियमपूर्वक छूने अथवा अनियमित रूप से उपयोग करने पर विनाश का कारण बन जाती है। जो अन्न मनुष्य को जीवन देता है, उसको प्राण कहा जाता है उसका अनियमित उपयोग प्राणों का संकट बन जाता है। 
      नियत- नियमों के अनुकूल चलने और नैसर्गिक अनुशासन मानने पर ही मनुष्य उन्नति एवं समृद्धि की दिशा में अग्रसर हो सकता है। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई उपाय नहीं है, जो मनुष्य को सुखी एवं शांत बना सके। 
      मनुष्य की केवल दो गतियाँ हैं। या तो वह ऊपर चढ़ेगा या नीचे गिरेगा। उसके लिए बीच का कोई मार्ग नहीं है। मनुष्य जीवन को यह छूट नहीं है कि वह कुछ अनुशासन में रहकर और कुछ अनुशासनहीनता होकर बिना विशेष कष्ट क्लेशों के चुपचाप मध्य मार्ग से निकल जाये। मनुष्य जीवन या तो उत्कृष्ट ही होगा अथवा निकृष्ट। जो उत्कृष्ट नहीं है वह अवश्य ही निकृष्ट है। उत्कृष्टता और निष्कृष्टता के बीच उसकी कोई स्थिति नहीं है। 
जब मनुष्य जीवन का उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट ही होना निश्चित है, तो उत्कृष्टता प्राप्त करने को बुद्धिमान कहा जायेगा। ऐसा कौन अभागा होगा, जो सहज सुलभ, उत्कृष्ट अथवा निष्कृष्ट जीवनों में से उत्कृष्ट जीवन को न चुने। 
      उत्कृष्ट जीवन प्राप्त करने के लिए मनुष्य को नियति- चक्र का अनुसरण और नैतिक नियमों का पालन करना ही होगा। इसके अतिरिक्त उसके सामने कोई उपाय नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि वह शुभ संकल्पी, शुभदर्शी और शुभाचार वाला बने। अतिचार तथा अत्याचार को त्यागकर परोपकारी, परिश्रमी तथा पुरुषार्थी बने। जो आचरण शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आध्यात्मिक हानि करें उन्हें छोड़कर ऐसे आचार- विचार अपनाने चाहिए, जिनसे इन चारों तथ्यों का विकास हो। नैतिकता ही किसी देश की वास्तविक प्रगति का मूल है। 


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