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भारत गाँवों का देश है, यहाँ की ७५ प्रतिशत जनता देहातों में बसती है। इतने बड़े समुदाय की उन्नति तभी संभव है, जब उनमें संव्याप्त निर्धनता एवं अशिक्षा- निवारण के साथ ही जीवन स्तर को ऊँचा उठाने को प्राथमिकता मिले। ग्रामीण विकास की योजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन करके बहुत कुछ इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। इस संदर्भ में पिछले दिनों विविध क्षेत्रों से संबद्ध मूर्धन्य मनीषियों, वैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों एवं अर्थशास्त्रियों का एक सम्मेलन बंगलोर में सम्पन्न हुआ, जिसमें आगामी बीस वर्षों के स्वरूप का निर्धारण करते हुए देश के उज्ज्वल भविष्य की एक झाँकी प्रस्तुत की गई। इसके लिए विभिन्न प्रकार के सामुदायिक विकास आन्दोलनों का प्रारूप सुनिश्चित किया गया। निष्कर्ष निकाला गया कि राजनैतिक जीवन में नैतिकता के ह्रास एवं स्वार्थी प्रवृत्ति ने गाँवों की स्थिति सुधारने के बजाय उसे मात्र अपना उल्लू सीधा करने तक सीमाबद्ध कर दिया है। आर्थिक उन्नति ही देहातों का कायाकल्प कर सकती है, जो अभी न के बराबर ही कही जा सकती है। 
      देहात प्रधान भारत में अभी भी लगभग आधी आबादी गरीबी का जीवन जीने को विवश है। अधिकांश किसान एवं मजदूरों को बेकारी में प्रायः आधा समय गुजारना पड़ता है। बेकारी और गरीबी दोनों अभिन्न सहचरी हैं। जहाँ एक रहेगी वहाँ दूसरी को उपस्थित पाया ही जायेगा। किसान एवं मजदूरों के वर्ष में ३- ४ महीने व्यर्थ ही हाथ पर हाथ धरे बैठे बीत जाते हैं और वे महानगरों की ओर रोजगार के लिए भागने लगते हैं, जहाँ निवास, स्वास्थ्य और शिक्षा सम्बन्धी सुविधाएँ जुटाना भी दुष्कर हो रहा है। फलतः वातावरण की विषाक्तता एवं अपराध जैसी सामाजिक बुराइयाँ अपना फन फैलातीं और भले- चंगों को भी अपना ग्रास बनाती चली जाती है। यह सब सामाजिक असमानता एवं सबको न्याय न मिल पाने का ही प्रतिफल है। इसे मिटाये बिना कहने लायक प्रगति कैसे संभव हो सकती है? 
      मनीषियों एवं विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन हेतु कोई न कोई विकास का विकल्प अवश्य ही ढूँढ़ना होगा। इसके लिए सबसे पहली जरूरत लोगों की जीवन शैली में परिवर्तन लाना है और यह तभी संभव है जब धन एवं साधनों का समान वितरण हो तथा गैर उपयोगी उपभोग पर कड़ाई के साथ प्रतिबंध लगे। आर्थिक ढाँचा कहीं लड़खड़ा न जाये, इसके लिए उपभोक्ता समितियों का निर्माण करना जरूरी है। इसकी पूर्ति सहकारी संगठनों द्वारा ही संभव है, जो उत्पादन एवं उपभोग की क्षमताओं के विकेन्द्रीकरण में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकती हैं। इससे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, साथ- साथ निर्यात के भी सुअवसर उपलब्ध किए जा सकेंगे। गाँवों और शहरों तथा कृषि और उद्योगों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए नई तकनीकि आर्थिक विकास की नीति को क्रियान्वित करने के प्रयत्न चल भी पड़े हैं और परिणाम भी उत्साहवर्धक सामने आये हैं। 
      सामाजिक विधि व्यवस्था को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए निर्धारित की गयी आर्थिक नीतियाँ ही करोड़ों की संख्या में बैठे बेरोजगार लोगों को व्यवस्थित एवं सुविधायुक्त जीवनयापन का अवसर दिला सकती हैं। इस उद्देश्य की बहुत कुछ पूर्ति कृषि को प्राथमिकता प्रदान करने से तथा छोटे एवं मध्यम किसानों को प्रोत्साहित करने से हो सकती है। अपने देश में छोटी जोतों का आकार अधिक है। अतः मशीनों की अपेक्षा श्रमिकों को काम देना ही बेहतर होगा, साथ ही उन्हें समुचित प्रशिक्षण भी इस क्षेत्र में देना होगा। जिससे वे उपार्जन एवं हरीतिमा संवर्द्धन के समन्वित उपक्रम को समझ सकें। जिन स्थानों पर कृषि कार्य संभव नहीं है, वहाँ लघुकाय गृह उद्योगों की स्थापना की जा सकती है। यह बेकारी के निवारणार्थ एक बहुत ही प्रभावी उपाय है। जो व्यक्ति काम की अभावग्रस्तता में शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं, उन्हें लघु उद्योगों में आसानी से खपाया जा सकता है। कृषि में उत्तम बीज, उर्वरक, सिंचाई साधनों की सुविधा, चकबंदी तथा उचित बाजार व्यवस्था से उत्पादन क्षमता में तो विशेष प्रकार से अभिवृद्धि होगी ही, इसके साथ- साथ लोगों की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ेगी, जिसके फलस्वरूप जीवन स्तर को ऊँचा उठाया जा सकता है। खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ने के कारण मुद्रा प्रसार की प्रवृत्तियों को आसानी से रोका जा सकता है। उपभोक्ताओं की माँग की पूर्ति तो होगी ही, साथ- साथ छोटे- छोटे कस्बों का स्वरूप भी विकसित होने लगेगा, जहाँ पर लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना सुगमतापूर्वक की जा सकती है। शहरी एवं ग्रामीण इकाइयों को एक- दूसरे का विरोधी नहीं, वरन् पूरक समझा जाय और दोनों को समान रूप से सरकारी सहायता मिले, तो देश का कायाकल्प होते देर न लगेगी। 
       समाजशास्त्रियों के अनुसार क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करना ही सामाजिक न्याय है। आज देश को उच्चस्तरीय शिक्षा की अपेक्षा तकनीकी प्रशिक्षण की नितान्त आवश्यकता है। शिक्षा वही सार्थक हो सकती है,जो मनुष्य तथा समाज के लिए उपयोगी हो। देश की आधी जनसंख्या- नारी वर्ग अभी भी पिछड़ी स्थिति में जीवन जीने को बाध्य है। अशिक्षा इसका प्रमुख कारण है। उन्हें अनपढ़ एवं अनगढ़ रखकर मनुष्य को कुछ मिला नहीं, वरन् हानि ही पग- पग पर उठानी पड़ी है। शिक्षा एवं सांस्कृतिक वातावरण से नारी वर्ग को जब तक परिचित नहीं कराया जाता, तब तक समाज निर्माण की सभी संभावनाएँ अनिश्चित ही बनी रहेंगी। इसे सुखद संभावना ही कहा जाना चाहिए कि विचारशीलों का ध्यान अब इस ओर आकृष्ट हुआ है और नारी- उत्थान के लिए संसार में प्रायः सभी ओर बहुमुखी प्रयास चल पड़े हैं। 
       प्रगति के लिए- उन्नति के लिए आवश्यकता आज इस बात की है कि अनावश्यक उपभोग की प्रवृत्तियों पर पूर्ण रूप से अंकुश लगे, अन्यथा भ्रष्टाचार एवं काला धन जैसे सामाजिक नासूर को प्रोत्साहन मिलेगा। गरीबी और अमीरी के बीच खाई गहरी होती चली जायेगी और सर्वत्र अनैतिकता के ही दर्शन होंगे। एक ओर अभी जहाँ तक सीमित वर्ग विलासितापूर्ण जीवन जी रहा है, वहीं दूसरी ओर बहुसंख्य आबादी अभावग्रस्तता एवं कुपोषण का शिकार है। धन के असमान वितरण पर प्रतिबंध हेतु निम्र वर्ग के लोगों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाना तथा समानता के सिद्धान्तों का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करना, यही उपभोग की नैतिकता का स्वरूप है। गाँधीजी का मत है कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं को कम कर देना चाहिए और भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए ही आर्थिक साधनों का सदुपयोग किया जाना चाहिए, तभी राष्ट्रीय प्रगति संभव है। उत्पादन प्रणाली में आवश्यक सुधार एवं उपलब्ध सुविधा- साधनों का नैतिक उपभोग- दोनों में सामंजस्य का होना वर्तमान युग की एक महती आवश्यकता है। 


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