img


अनुकरण की प्रवृत्ति मनुष्य स्वभाव का महत्त्वपूर्ण अंग बनकर रहती है। हम जैसा देखते हैं, वैसा करते हैं। बच्चा अभिभावकों को, साथियों को जिस शब्दावली का, भाषा का प्रयोग करते सुनता है, उसी को बोलने और समझने लगता है। चरित्र और स्वभाव के संबंध में भी साथियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। वातावरण का प्रभाव पडऩा एक तथ्य है। जिन लोगों के बीच, जिन परिस्थितियों के बीच रहना पड़ता है, वैसी ही आदतें बन जाती हैं। रुचि विचित्रता, आदतों की भिन्नता और प्रकृति की पृथकता न तो जन्मजात होती है और न अनायास उत्पन्न होती है, इसके निर्माण में समीपवर्ती व्यक्तियों और परिस्थितियों का भारी हाथ रहता है। 
अनाचार समर्थक- अभिरुचि बढ़ जाने से वातावरण में अपराधी प्रवृत्तियों का प्रवाह उत्पन्न होता है। सामान्य मन:स्थिति के लोग उसी की धारा में बहने लगते हैं। हवा के  रुख की ओर पत्ते उड़ते हैं। बहुत लोग जो कुछ करते हैं, उसी का अनुकरण करने की, उसी दिशा में चलने की लोकप्रवृत्ति उभरती है। 
जन- प्रवाह को अवांछनीयता से विरत रहने के लिए उसी प्रकार का वातावरण बनाना आवश्यक है, जिसमें सामान्य लोगों के चल पडऩे की प्रेरणा मिल सके। यह कार्य प्रखर एवं मनस्वी व्यक्तियों के आगे आने से ही संभव होता है। हवा का रुख वे ही बनाते हैं, प्रवाहों को वे ही मोड़ते हैं। वातावरण बनाने का बहुत कुछ श्रेय उन्हीं का होता है। 
विचार और क्रिया को जिन्होंने मिलाकर अपनी आस्था का परिचय दिया है, वे कुमार्गगामी होते हुए भी प्रतिभावान होते हैं और अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। एक वेश्या अनेकों को व्यभिचार सिखा देती है। नशेबाज, चोर, जुआरी आदि कुमार्गगामी अपनी बुरी लतें अधिकांश को सिखा देते हैं, जो उनके सम्पर्क में आते हैं। विचार यदि कर्म में उतर सकने जैसा प्रौढ़ हो तो उनसे प्रतिभा उभरती है और उसका प्रभाव पड़ता है। 
सन्मार्गगामी प्रतिभाएँ अपने समाज एवं समय को प्रभावित कर सकने में पूरी तरह सफल रही हैं। गाँधीजी ने अपने प्रभाव से ऐसा वातावरण बनाया था, जिसने असंख्य लोगों को सत्याग्रही सैनिकों के रूप में कष्टसाध्य त्याग, बलिदान करने के लिए अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। भगवान् बुद्ध की प्रेरणा से लाखों भिक्षु और भिक्षुणी  अपनी सुख- सुविधाओं को छोडक़र जन- प्रवाह बदलने के लिए कर्म- क्षेत्र में उतरे थे। लेनिन के अनुयायी साम्यवादी आन्दोलन को समर्थ बनाने में सफल हुए थे। शिवाजी, प्रताप, गुरुगोविन्द सिंह आदि के ऐसे अगणित प्रमाण इतिहास के पृष्ठों पर भरे पड़े हैं, जिनमें प्रतिभाशाली व्यक्तियों ने अपने प्रभाव से युगांतरकारी वातावरण बनाया और उस प्रवाह से बचने के लिए असंख्यों को प्रोत्साहित किया। 
समय की पुकार जिस परिवर्तन की है, उसके अनुरूप लोकमानस तैयार किया जाना चाहिए। इसके लिए अग्रिम पंक्ति में उन योद्धाओं को आना पड़ेगा, जो अपनी आस्थाओं को कार्यान्वित करते हुए सर्वसाधारण के सम्मुख अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर सकें। 
त्याग और बलिदान की पुण्य- परंपरा अपनाये बिना यह महान् प्रयोजन और किसी भी प्रकार पूरा न हो सकेगा। इसका आरंभ दुर्बल मन:स्थिति के लोगों से नहीं कराया जा सकता। वे पीछे तो चल सकते हैं, पर अग्रिम पंक्ति में खड़े होने का साहसिक शुभारंभ कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। युगपरिवर्तन का शुभारंभ तो त्याग और बलिदान के भावभरे आदर्श प्रस्तुत कर सकने वाले अग्रगामी साहसी शूरवीरों द्वारा ही संभव होगा। युग की माँग और पुकार उन्हीं के उभरने, उठने की प्रतीक्षा कर रही है।

 गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार 


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....