img


जैसे कुआँ खोदने पर जमीन में मिट्टियों के कई पर्त निकलते हैं, वैसे ही मनोभूमि की स्थिति है। उनके कार्य, गुण और क्षेत्र भिन्न- भिन्न हैं। ऊपर वाले पर्त- मन और बुद्धि हैं। मन में इच्छाएँ, वासनाएँ, कामनाएँ पैदा होती हैं, बुद्धि का काम विचार करना, मार्ग ढूँढऩा और निर्णय करना है। 
स्थूल मन के प्रमुख भाग दो हैं- चित्त, अहंकार। चित्त में संस्कार, आदत, रुचि, स्वभाव, गुण की जड़ें रहती हैं। अहंकार ‘‘अपने सम्बन्ध में मान्यता’’ को कहते हैं। अपने को जो व्यक्ति धनी- दरिद्र, पापी- पुण्यात्मा, स्त्री- पुरुष, जीव- ब्रह्म आदि जैसा भी कुछ मान लेता है, वह वैसे ही अहंकार वाला माना जाता है। आत्मा के अहम् के सम्बन्ध में मान्यता का नाम ही अहंकार है। इन मन, बुद्धि, अहंकार के अनेकों भेद- उपभेद हैं और उनके गुण, कर्म, अलग- अलग हैं। 
जैसे मन और बुद्धि का जोड़ा है, वैसे ही चित्त और अहंकार का जोड़ा है। मन में नाना प्रकार की इच्छाएँ- कामनाएँ रहती हैं, पर बुद्धि उनका निर्णय करती है कि कौन- सी इच्छा प्रकट करने योग्य है, कौन- सी दबा देने योग्य है? इसे बुद्धि जानती है और वह सभ्यता, लोकाचार, सामाजिक नियम, धर्म, कर्तव्य, असम्भव आदि का ध्यान रखते हुए अनुपयुक्त इच्छाओं को भीतर दबाती रहती है। जो इच्छा कार्य रूप में लाये जाने योग्य जँचती है, उन्हीं के लिये बुद्धि अपना प्रयत्न आरम्भ करती है। इस प्रकार यह दोनों मिलकर मस्तिष्क क्षेत्र में अपना ताना- बाना बुनता रहते हैं। 
अन्त:करण क्षेत्र में चित्त और अहंकार का जोड़ा अपना कार्य करता है। जीवात्मा अपने को जिस श्रेणी का, जिस स्तर का अनुभव करता है, चित्त में उस श्रेणी के, उसी स्तर  के पूर्व संस्कार सक्रिय और परिपुष्ट रहते हैं। कोई व्यक्ति अपने को किसी वर्ग विशेष या समाज के निम्न वर्ग का मानता है, तो उसका यह अहंकार उसके चित्त को उसी जाति के संस्कारों की जड़ जमाने और स्थिर रखने के लिये प्रस्तुत रखेगा। जो गुण, कर्म, स्वभाव इस श्रेणी के लोगों के होते हैं, वे सभी उसके चित्त में संस्कार रूप से जड़ जमाकर बैठ जायेंगे। यदि उसका अहंकार अपराधी या शराबी की मान्यता का परित्याग करके लोकसेवी, महात्मा, सच्चरित्र एवं उच्च होने की अपनी मान्यता स्थिर कर ले, तो अति शीघ्र उसकी पुरानी आदतें, आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ बदल जायेंगी और वह वैसा ही बन जाएगा, जैसा कि अपने सम्बन्ध में उसका विश्वास है। अन्त:करण की एक ही पुकार से, एक ही हुंकार से, एक ही चीत्कार से जमे हुए कुसंस्कार उखड़ कर एक ओर गिर पड़ते हैं और उनके स्थान पर नये, उपयुक्त, आवश्यक, अनुरूप संस्कार कुछ ही समय में जम जाते हैं। जो कार्य मन और बुद्धि द्वारा अत्यन्त कष्ट- साध्य मालूम पड़ता था, वह अहंकार परिवर्तन की एक चुटकी में ठीक हो जाता है। 
अहंकार तक सीधी पहुँच साधना के अतिरिक्त और किसी मार्ग से नहीं हो सकती। मन और बुद्धि को शान्त, मूर्छित अवस्था में छोड़कर सीधे अहंकार तक प्रवेश पाना ही साधना का उद्देश्य है। गायत्री साधना का विधान भी इसी प्रकार का है। उसका सीधा प्रभाव अहंकार पर पड़ता है। ‘‘मैं ब्राह्मी शक्ति का आधार हूँ, ईश्वरीय स्फुरणा गायत्री मेरे रोम- रोम में ओतप्रोत हो रही है, मैं उसे अधिकाधिक मात्रा में अपने अन्दर धारण करके ब्राह्मी- भूत हो रहा हूँ।’’ यह मान्यताएँ मानवीय अहंकार को पाशविक स्तर से बहुत ऊँचा उठा ले जाती हैं और उसे देवभाव में अवस्थित करती हैं। गायत्री साधना अपने साधक को दैवी आत्म- विश्वास, ईश्वरीय अहंकार प्रदान करती है और वह कुछ ही  समय में वस्तुत: वैसा ही हो जाता है। जिस स्तर पर उसकी आत्म- मान्यता है, उसी स्तर पर चित्त- प्रवृत्तियाँ रहेंगी। वैसी आदतें, इच्छाएँ, रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ क्रियाएँ उसमें दीख पड़ेंगी। जो दिव्य मान्यता से ओत- प्रोत है- निश्चय ही उसकी इच्छाएँ, आदतें और क्रियाएँ वैसी ही होंगी। यह साधना प्रक्रिया मानव अन्त:करण का कायाकल्प कर देती है।

गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार 


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....