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शरीर से कोई महत्त्वपूर्ण काम लेना हो तो उसके लिए उसे प्रयत्नपूर्वक साधना पड़ता है। कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला विज्ञान, खेल आदि के जो भी कार्य शरीर से कराने हैं उनके लिए उसे अभ्यस्त एवं क्रिया- कुशल बनाने के लिए आवश्यक ट्रेनिंग देनी पड़ती है। लुहार, सुनार, दर्जी, बुनकर, मूर्तिकार आदि काम करने वाले अपने शिष्यों को बहुत समय तक सीखते हैं, तब उनके हाथ उपयुक्त प्रयोजन के लिए ठीक प्रकार सधते हैं। पत्रकार, गायक, चित्रकार, अभिनेता, पहलवान आदि को अपने- अपने कार्यों को  ठीक तरह कर सकने की देर तक शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। अस्तु शरीर को अभीष्ट कार्यों के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता सर्वत्र समझी जाती है और उसके लिए साधन भी जुटाए जाते हैं। 

शिक्षा का दूसरा क्षेत्र है- मस्तिष्क। मस्तिष्क का ही शरीर पर नियंत्रण है। जीवन की समस्त दिशा धाराओं को प्रवाह देना मस्तिष्क का ही काम है। ‘बुद्धिर्यस्य बलं निबुद्र्धियस्य कुतोबलम्’ सूक्ति में कहा है- जिसमें बुद्धि है, उसी में बल है। बुद्धिहीन तो सदा दुर्बल ही रहता है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? हाथी को गधे जैसा लदते और सिंह तथा बन्दर को समान रूप से नाचते देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुर्बल काय मनुष्य अपने बुद्धिबल से किस प्रकार सृष्टि के समस्त प्राणियों पर शासन कर रहे हैं। इस शासन के अन्तर्गत वे जीव भी आते हैं, जो शारीरिक प्रतियोगिता में मनुष्य को हजार बार पछाड़ सकते हैं। 

मस्तिष्कीय शिक्षण के लिए ज्ञान और अनुभव को सम्पादित करना पड़ता है। जानकारी और अभ्यास इसके लिए आवश्यक होती है। इसका बहुत कुछ प्रयोजन स्कूली शिक्षा, सत्साहित्य, सत्संग, मनन, चिन्तन आदि के सहारे पूरा होता है। मस्तिष्कीय क्षमता विकास की उपयोगिता भी सर्वविदित है। इसलिए अपनी- अपनी परिस्थिति के अनुसार स्कूली अथवा दूसरी प्रकार की शिक्षा पद्धति अपनायी जाती है और जानकारी, समझदारी बढ़ाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया जाता है। शिक्षा का दूसरा चरण जानकारी की कमी को पूरा करना है। इससे विचार शक्ति बढ़ती है, बुद्धि तीक्ष्ण होती है और व्यवहार में कुशलता आती है। बौद्धिक विकास के लिए शिक्षापरक जो भी  उपाय किए जाते हैं, वे सभी सराहनीय हैं। शारीरिक कुशलता की ही तरह मस्तिष्कीय विकास भी आवश्यक है। अस्तु शिक्षा के इन दोनों क्षेत्रों में अधिकाधिक समावेश करने के प्रयत्नों की प्रशंसा ही की जायेगी। 

शिक्षा का प्रवेश प्राय: शरीर एवं मस्तिष्क तक ही सीमित रहता है, अन्त:करण का स्तर बदलने में तथाकथित ज्ञान सम्पादन की कोई विशेष उपयोगिता सिद्ध नहीं होती। यदि मस्तिष्कीय शिक्षण से आस्थाएँ बदली जा सकतीं, तो समाज के प्रथम पंक्ति के लोग सच्चे अर्थों में देशभक्त होता- हर अधिकारी, कर्मचारी लोकसेवा में उसी निष्ठापूर्वक संलग्न रहता जैसा कि उसे ट्रेनिंग की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया गया था। तब धर्मोपदेशक नीति और सदाचार का ही आदर्श प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते। 
अब प्रश्न उठता है कि व्यक्तिगत को सच्चे अर्थों में सुसंस्कृत और समुन्नत बनाने के लिए क्या किया जाय? इसके उत्तर में एक ही तथ्य सामने आता है कि आस्थाओं के सहारे आस्थाओं को उभारा जाय। जंगली हाथी पकड़ने में प्रशिक्षित हाथियों का उपयोग होता है। काँटे से काँटा निकालने और विष से विष को मारने की कहावत प्रसिद्ध है। लोहे को लोहे से काटा जाता है। डूबे को पानी में से निकालने के लिए स्वयं डुबकी लगानी पड़ती है। अन्त:करण के आस्था क्षेत्र को कुसंस्कारों से मुक्त करने के लिए सदुद्देश्यपूर्ण आस्थाओं की नये सिरे से प्रतिष्ठापना करनी पड़ती है। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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