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परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप एवं पवन देव अपनी मर्जी के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। यदि दरवाजे, खिड़कियाँ बन्द कर दिये जाएँ, तो प्रचण्ड धूप एवं तेज हवा का प्रवेश भी भीतर न हो सकेगा। केवल वही स्टेशन अपने रेडियो पर सुना जाता है, जिस पर हम सुई लगाते हैं। अन्य स्टेशनों के ब्राडकास्ट हमारे कानों तक नहीं आ सकते, भले ही वे कितने ही जोरदार प्रसारण चला रहे हों। 
इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि आंतरिक प्रखरता के बल पर लोगों ने अभावग्रस्त एवं विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए प्रगति के पथ- प्रशस्त किये हैं और अनेकानेक अवरोधों को पार करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। इसके विपरीत हर प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ऊपर उठने की बात तो दूर उल्टे नीचे ही गिरते चले गये हैं। 
एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य की प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था, जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गोपाल’ और रामकृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी, वह उनके श्रद्धारोपण से ही उत्पन्न हुई थी और उन्हीं के लिए फलप्रद सिद्ध होती रही। उन्हीं प्रतिमाओं से अन्य लोग वैसा लाभ नहीं उठा सकते। यंत्र- तंत्रों की सिद्धि में विधि- विधानों की इतनी भूमिका नहीं होती, जितनी साधक के श्रद्धा, विश्वास की। भूतप्रेतों से लेकर देवी- देवताओं तक के जो परिचय सामने आते हैं, उनमें व्यक्ति के अपने विश्वास ही फलित हुए पाये जाते हैं। अमुक चिकित्सा से लाभ होना अथवा अमुक चिकित्सक का सफल होना अथवा अमुक चिकित्सक का असफल होना बहुत करके रोगी के विश्वास पर निर्भर रहता है। 
विपुल वर्षा होने पर भी पत्थर की चट्टानें एक बूँद पानी भी नहीं सोख पातीं। इसके विपरीत रेगिस्तानी गर्मी में हरे रहने वाले पेड़- पौधे कहीं से भी अपने निर्वाह के लिए आवश्यक नमी उसी उष्ण वातावरण में से उपलब्ध करते रहते हैं। स्वाति की वर्षा से केवल वे ही सीपें लाभ उठा पाती हैं, जिनके मुँह खुले होते हैं। सरकारी छात्र- वृत्ति उन्हीं  को मिलती है, जो परिश्रमपूर्वक पढऩे और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। बाहरी सहायता उपलब्ध होना न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि व्यक्ति की निजी पात्रता एवं प्रखरता का होना। 
आत्मबोध का तात्पर्य है, अपने से सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है- आंतरिक दोष- दुर्गुणों को निरस्त करके सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवीय और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती  हैं। 
ब्रह्म विद्या का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि अपने आपको जानो, अपने को समझो और अपने को सुधारो। ‘आत्मा वाऽरे श्रोतव्य: निदिध्यासितव्य:’ की उक्ति में यही उद्बोधन भरा पड़ा है। गीता कहती है ‘अपना उद्धार आप करो’ अपने आप को गिराओ मत। ‘उद्धरेत् आत्मनात्मानं नात्मानं अवसादयेत्’ की सूक्ति में यही ब्रह्मवाक्य गूँजता है। मित्रों को ढूँढऩे और शत्रुओं को भगाने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, वे अपने ही भीतर डेरा डाले बैठे हैं- ‘आत्मैव आत्मना बन्धु: आत्मैव रिपुरात्मन:’ का गीता कथन अक्षरश: सत्य है। अपने पौरुष- पुरुषार्थ से अपनी विवेकशीलता और दूरदर्शिता से ही प्रगति के द्वार खुलते हैं। अपनी ही अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता और अनास्था ही हमें ले डूबती है। अपने उत्थान- परिष्कार की तथा पतन- पराभव की कुंजियाँ अपने ही हाथों में हैं, दोनों में से चाहे जिसका द्वार स्वेच्छापूर्वक खोला जा सकता है। यह तथ्य समझ में आ सके, तो प्रतीत होगा कि अपना आपा ही कल्पवृक्ष है, जिसकी जिस कामना से उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जाएँगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाए, पर जीवन- देवता की, आत्म- निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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