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एक दार्शनिक का मत है कि संसार एक निष्प्राण वस्तु है। इसे हम जैसा बनाना चाहते हैं, यह वैसा ही बन जाता है। जीव चैतन्य है और कर्ता है। संसार पदार्थ है और जड़ है। चैतन्य कर्ता में यह योग्यता होती है कि वह जड़ पदार्थ की इच्छा और आवश्यकता का उपयोग कर सके। कुम्हार के सामने मिट्टी रखी हुई है, वह उससे घड़ा भी बना सकता है और दीपक भी। संसार ठीक इसी प्रकार हमारे सामने रखा हुआ है। उसमें सत, रज, तम तीनों का मिश्रण है। चुनने वाला आदमी अपनी मर्जी के मुताबिक़ उनमें से चाहे जो वस्तु चुन सकता है। बाग में कीचड़ भी है, गंदगी भी और फूलों की सुगंध भी है। कीड़े कीचड़ में घुस पड़ते हैं, मक्खियाँ गंदगी खोज निकालती हैं और भौंरे सुगंधित फूल पर जा पहुँचते हैं। सबको अपनी इच्छित वस्तु मिल जाती है। 
त्रिगुणामयी प्रकृति के दोनों पहलू मौजूद हैं, एक भला, दूसरा बूरा। एक धर्म, दूसरा अधर्म, एक सुख, दूसरा दु:ख। चुनाव की पूरी- पूरी आजादी आपको है। एक व्यक्ति चोर  है, उसके मानसिक आकर्षण से बहुत से चोरों से उसकी मैत्री हो जायगी और सब जगह उसे चोरी की ही चर्चा मिलेगी। घर वाले उससे बात करेंगे, तो चोरी की, माता बुरा बताएगी। स्त्री अच्छा, कोई चोरी का समर्थन करेगा, कोई विरोध करेगा। घर के बाहर निकलने पर उसके परिचित लोग उससे जब मिलेंगे, उसके पेशे चोरी के बारे में ही भला- बुरा वार्तालाप करेंगे, अपने साथी चोरों से मिलेगा, तो वही चोरी की बातें होगी, जेल में भी चोर- चोर मौसेरे भाई की तरह मिल बैठेंगे और अपने प्रिय विषय की बातें करेंगे। इस प्रकार उस चोर के लिए यह सारा संसार चोरी की धुरी पर नाचता हुआ दिखाई देगा, उसको विश्व का सबसे बड़ा काम चोरी ही दिखाई पड़ेगा। अन्य बातों की ओर उसका ध्यान बहुत ही स्वल्प हो जाएगा। अन्य कार्यों पर उसकी उपेक्षा दृष्टि ही पड़ेगी। 
एक व्यक्ति कई लोगों को कई प्रकार का दिखाई पड़ता है। माता उसे स्नेह भाजन मानती है, पिता आज्ञाकारी पुत्र मानता है, गुरु सुयोग्य शिष्य समझता है, मित्र हँसोड़ साथी समझते हैं, स्त्री प्राणवल्लभ मानती है, पुत्र उसे पिता समझता है, शत्रु वध करने योग्य समझता है, दुकानदार ग्राहक समझता है, घोड़ा सवार समझता है। इस सभी  संबंधियों की माता, पिता, गुरु, मित्र, स्त्री, पुत्र, शत्रु, दुकानदार, नौकर, घोड़ा आदि की उन मानसिक भावनाओं का चित्र आपको दिखाया जा सके, तो आप देखेंगे कि उस एक की व्यक्ति के संबंध में यह सब संबंधी कैसी- कैसी विचित्र कल्पना किए हुए हैं, जो एक- दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलतीं। इसमें से एक भी कल्पना ऐसी नहीं है, जो उस व्यक्ति के ठीक- ठीक और पूरे स्वरूप को प्रकट करती हो। जिसे उससे जितना एवं जैसा काम पड़ता है, वह उसके संंबंध मेें वैसी ही कल्पना कर लेता है। तमाशा तो यह है कि वह मनुष्य स्वयं भी अपने बारे में एक ऐसी कल्पना किए है। मैं लखपति हूँ, वृद्ध हूँ, पुत्र रहित हूँ आदि नाना प्रकार की कल्पनाएँ कर लेता है और उस कल्पना लोक उसके बारे में इंद्रियों की अनुभूति के आधार पर अपने संबंध में एक लँगड़ी- लूली कल्पना कर लेता है और उसी कल्पना में लोग नशेबाज की तरह उड़ते रहते हैं। ‘‘मै क्या हूँ?’’ इस मर्म को यदि वह किसी दिन समझ पाए, तो जाने कि मैंने अपने बारे में कितनी गलत धारणा बना रखी थी। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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