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मनुष्य को विवेक बुद्धि प्राप्त है। इसलिए वह श्रेष्ठ है, पर यदि मनुष्य इस विवेक बुद्धि को ताक में रखकर केवल पेट- प्रजनन और लोभ- लिप्सा में ही संलग्न रहे, तो बहुत कुछ मायने में पशु भी उससे अच्छे ही सिद्ध होंगे। अप्राकृतिक आहार- विहार पशुओं को पसंद नहीं, जबकि मनुष्य अपनी प्रकृति के विपरीत अभक्ष्याभक्ष्य खाने और उदर  को कब्रगाह बनाने में परहेज नहीं करता। ऐसी स्थिति में मनुष्य को मात्र शरीर संरचना के बल पर ही श्रेष्ठ कहना उचित नहीं। उसमें विद्यमान असीमित शक्ति- सामर्थ्य का जब विवेकपूर्वक समाज उत्थान, राष्ट्र उत्थान में नियोजन किया जाता है, तो वही व्यक्ति सच्चा इंसान, मानव कहलाने का हकदार बनता है, अन्यथा नर पशु का जीवनयापन करता हुआ पूरे समाज के लिए हानिकारक ही सिद्ध होगा। 
बाह्य ज्ञान के समान अंत:ज्ञान का होना भी आवश्यक माना गया है। सुख- सुविधाओं की वृद्धि के साथ- साथ उनके उपयोग, उपभोग की भी समुचित जानकारी होनी चाहिए। आत्म ज्ञान के अभाव में मनुष्य भी दर- दर की ठोकरें खाता फिर रहा है। इस पर उसे विचार करना चाहिए कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? इस विषय में सबसे ज्यादा खोज- अनुसंधान कार्य प्राचीन काल से भारत में ही हुआ है। भारतीय मनीषियों ने इसे सर्वसुलभ भी बनाया था, तभी भारत बहुमुखी विकास के मार्ग में आगे बढ़ सका था। 
परमाणु सुविस्तृत पदार्थ का ही एक छोटा- सा घटक है। इसी प्रकार प्रकाश ऊर्जा क्या है? दिग्- दिगन्त में विस्तृत महासूर्य का ही एक अंश है। महासागरों में उठने वाली लहरें आखिरकार उसी सागर का ही तो एक अंश है। इसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का ही एक अंश मात्र है। देखने में इन सभी का स्वतंत्र अस्तित्व दिखाई पड़ता है, किन्तु यह सभी अपने मूल तत्त्व के ही एक अंश मात्र होते हैं। एक ही आकाश तत्त्व घर- घर में समाया हुआ है, जबकि है वह सभी महाकाश का भाग। ऐसे ही प्राणियों की जीवात्मा भी विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाचेतना का ही एक अंश है। 
आत्मा को उसके सीमित दायरे से निकालकर बाहर कर देने से संकीर्ण स्वार्थपरता का भाव तिरोहित होता चला जाता है। स्वयं को उस समाज का अभिन्न अंग मानकर चलने से अपना महत्त्व व सम्मान भी बना रहता है। मशीन हजारों छोटे- बड़े पुर्जों को जोड़कर बनती व चलती है। उसके एक- एक पुर्जे का पृथक् कोई महत्त्व नहीं होता। इसी प्रकार मानव भी समाज रूपी विस्तृत मशीन का एक पुर्जा ही है। समाज से बाहर पृथक् उसका कोई महत्त्व नहीं है। यह बात जिसके गले जितनी जल्दी उतर सके, समझा जाना चाहिए कि उसने अपना विस्तार कर लिया। समाज में ऐसे ही लोग सम्मानित और प्रशंसित होते हैं। पृथक्तावादी अपनापन प्राणिमात्र के लिए बहुत ही प्रिय है। इस प्रकार की आत्मीयता जिस व्यक्ति, जीव या पदार्थ पर आरोपित कर दी जाती है, वही परम प्रिय प्रतीत होने लगता है। अपना दायरा संकीर्ण कर लेने से अपने शरीर, अपने परिवार की ही सुख- सुविधा का ध्यान रखा जाता है। यदि यही प्यार का दायरा विस्तृत कर पास- पड़ोस और पूरे समाज तक फैला दिया जाय, तो अपना आत्म विस्तार होता चला जाता है। यही दायरा धीरे- धीरे सीमित से असीम तक पहुँचाया जा सकता है। परमात्मा की समस्त शक्तियाँ व गुण आत्मा में अंश रूप में विद्यमान होते हैं। उसे विकसित करने भर की आवश्यकता है। अग्रि की एक चिनगारी में वह सभी गुण विद्यमान होते हैं, जो दावानल में होते हैंं। अणु के परमाणु उसी गति व गुण, धर्म के अनुरूप गतिशील पाए जाते हैं। इस प्रकार समूचा विश्व ब्रह्माण्ड जिसमें मानवीय चेतना भी है, उसी एक महाचेतना के साथ सूक्ष्म रूप में सूत्रबद्ध होकर गतिमान हो रहे हैं। 

गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज, हरिद्वार 


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