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अपने आपको जानना ही आत्मज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्मज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है और दूसरी अमरता। एक  अंधकार है, दूसरा प्रकाश, एक जन्म- मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बंधन है तो दूसरा मुक्ति। नरक और स्वर्ग भी इन्हें ही कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत परिस्थितियाँ हैं, दोनों भिन्न- भिन्न दिशाओं को ले जाती हैं, इसलिए एक को ग्रहण करने के लिए दूसरे को त्यागना अनिवार्य हो जाता है। 
ज्ञान और अज्ञान की समान परिस्थितियाँ इस विश्व में विद्यमान है। जिन्हें पदार्थों से प्रेम होता है, वे प्रेयार्थी अज्ञानी कहे जाते हैं। भले ही उन्हें सांसारिक ज्ञान अधिक हो पर ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें कभी विद्वान नहीं मानते और न ही उन्हें महत्त्व दिया जा सकता है क्योंकि भोग की इच्छा करने वाले व्यक्ति अँधेरे में चलते और अंधों की तरह ठोकरें खाते हैं। 
आत्म ज्ञान प्राप्त करना वस्तुत: ईश्वर की सबसे सुन्दर सेवा और उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है। यहाँ कष्ट और दु:ख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं। 
आत्म तत्त्व का ज्ञान मनुष्य के लिए सभी दृष्टियों से उपयुक्त है। शास्त्रकार का कथन है कि तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषम अर्थात् आत्म ज्ञान के सुख से बढ़कर और कोई सुख  नहीं। कठोपनिषद् अध्याय दो की दूसरी बल्ली में आत्मा की विशदता और उससे प्राप्त होने वाले महान सुख का इस प्रकार वर्णन है। ‘जो समस्त जीवों का मूल, चेतन और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करता है, उस शरीरस्थ आत्मा का जो ज्ञान प्राप्त कर लेेते हैं, उन्हें ही नित्य और शाश्वत शांति उपलब्ध होती है।’ 
यद्यपि यह आत्मा जीव रूप से हृदय में ही अवस्थित है, तो भी वह अति सूक्ष्म है और सहज ही ज्ञान में नहीं आता। किन्तु जब कोई साहसी पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा उसे जानने का प्रयत्न करता है, कठिनाइयों में प्रविष्ट होकर उसे ढूँढ़ने का प्रयत्न करता है, तो वह आत्मा की विशेषताओं से प्रभावित भी होता है। और अंत में उसे प्राप्त कर सांसारिक दु:ख और कष्टों से छुटकारा पा जाता है। 
आत्म तत्त्व निश्चय ही बहुत विशद है। बुद्धिमान व्यक्ति इस परम गोपनीय तत्त्व को प्राप्त कर अपनी मुक्ति के भागी तो बनते ही हैं, साथ ही हजारों औरों को आत्मकल्याण के मार्ग में अग्रसर करने में भी समर्थ होते हैं, किन्तु यह तत्त्व गोपनीय ही नहीं दुःसाध्य भी है। मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अधिकारी नहीं बना देती, वरन् उस तत्त्व के अवगाहन की पात्रता भी होना आवश्यक है। अधिकारी व्यक्ति ही उसे प्राप्त कर सकते हैं, जो भय और मोह की स्थिति में डगमगा न सकें और जिनमें इतनी दृढ़ता, गंभीरता  और कठिनाइयों के सहन करने की क्षमता हो कि वे साधना काल की ऊँची- नीची, टेड़ी- तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें, वस्तुत: वही उसके पात्र होते हैं। ऐसे आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों पर ही समाज के खोजी वर्चस् सम्पन्न व्यक्ति अगले दिनों और अधिक संख्या में पैदा हों, ऐसी नियति की इच्छा है। कोई कारण नहीं कि महाकाल की यह इच्छा पूरी न हो। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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