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आज जन- जीवन एक विडम्बना मात्र बनकर रह गया है, जिसे ज्यों- त्यों करके काटना पड़ता है। निर्वाह की आवश्यकता जुटाने, गुत्थियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं के अनुकूलन में माथा- पच्ची करते- करते मौत के दिन पूरे हो जाते हैं। अभावों और संकटों से पीछा नहीं छूटता। कई बार तो गाड़ी इतनी भारी हो जाती है कि खींचे नहीं खिंचती। फलत: प्रयत्नपूर्वक अथवा बिना प्रयत्न ही अकाल मृत्यु के मुँह में प्रवेश करना पड़ता है। नीरस और निरर्थक जीवन एक ऐसा अभिशाप है, जिसे दुर्भाग्य के रूप में स्वीकार करना पड़ता है, किन्तु लगता यही रहता है- बेकार जन्मे और निरर्थक जिये। साधारण जीवन का यही स्वरूप है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में तो अन्य प्राणियों से भी गया- बीता प्रतीत होता है। 
असामान्य जीवन इससे आगे की बात है। सफल, समर्थ और समुन्नत स्तर के व्यक्ति सौभाग्यशाली दीखते हैं और उनकी स्थिति प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है। भौतिक सम्पन्नता से सम्पन्न और आत्मिक विभूतियों के धनी लोगों की- न प्राचीन काल में कमी थी और न अब है। पिछड़े और समुन्नत वर्गों के व्यापक अन्तर देखने  से आश्चर्य होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले मनुष्यों के बीच इतना ऊँच और नीच होने का कारण क्या हो सकता है? स्रष्टा का पक्षपात और प्रकृति का अन्तर कहने से भी काम नहीं चलता, क्योंकि दोनों को सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित करने में कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। यह व्यतिक्रम रहा होता तो ग्रह- नक्षत्र अपनी धुरी पर न घूमते, परमाणुओं के घटक उच्छृंखलता बरतते और परस्पर टकराकर उसी मूल स्थिति में लौट गए होते, जिसमें कि महत्त्वत्व अपनी अविज्ञात स्थिति में अनन्त काल  से पड़ा था। फलस्वरूप न यह सृष्टि बन पाती और न एक दिन चलती- ठहरती। यह सब कुछ परिपूर्ण व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है। 
फिर मनुष्यों के बीच पाये जाने वाले अन्तर का क्या कारण है? इसका सुनिश्चित उत्तर यही है कि जीवन की उथली परतों तक ही जिनका वास्ता रहा उन्हें छिलका ही हाथ लगा किन्तु जिन्होंने नीचे उतरने की चेष्टा की उन्हें एक के बाद एक बहुमूल्य उपलब्धि भी मिलती चली गईं। गहराई में उतरने को अध्यात्म की भाषा में साधना कहते हैं। साधना किसकी? इसका उत्तर है- जीवन की। जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है, जो उसकी जितनी सदुपयोग साधना कर लेता है, वह उतना ही कृत- कृत्य हो जाता है। जीवन का  मूल्य, महत्त्व और उसकी उपलब्धि न समझना पाना ही वह अभिशाप है, जिसके कारण गई- बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं। यदि स्थिति को बदल दिया जाय, जीवन देवता की अनन्त सामर्थ्यों तथा उसके वरदानों की असीम शृंखला को समझा जा सके, तो प्रतीत होगा कि स्रष्टा ने बीज रूप से वैभव का भाण्डागार उसी मानवीय काय कलेवर के भीतर सँजोया हुआ था। भूल इतनी ही होती रही कि न उसे खोजा गया और न काम में लाया गया। इस भूल का परिमार्जन ही आत्म- ज्ञान है। यह जागृति जब सक्रिय बनती है, तो आत्मोत्कर्ष के लक्षण तत्काल दृष्टिकोण होने लगते हैं। इसी आत्म परिष्कार की प्रक्रिया का नाम साधना है। 
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त शाश्वत सत्य की तरह स्पष्ट है। न उसमें सन्देह की गुंजाइश है और न ही विवाद की। भौतिक जगत् के विभिन्न क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी अनेकानेक सफलताएँ अर्जित करते देखे जाते हैं। जीवन भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे जड़- जगत् के किसी भी घटक एवं वर्ग से अत्याधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है।

 गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार 


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