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इस संसार में जड़ के साथ चेतन भी गुँथा हुआ है। काम करती तो काया ही दीखती है, पर वस्तुत: उसके पीछे सचेतन की शक्ति काम कर रही होती है। प्राण निकल जाएँ तो  अच्छी- खासी काया निर्जीव हो जाती है। कुछ करना- धरना तो दूर, मरते ही सडऩे- गलने का क्रम आरंभ हो जाता है, और बताता है कि जड़ शरीर तभी तक सक्रिय रह सकता है, जब तक कि उसके साथ ईश्वरीय चेतना जुड़ी रहती है। दोनों के पृथक् होते ही समूचे खेल का अंत हो जाता है। 
एकाकी चेतना का अपना अस्तित्व तो है। उसकी निराकार सत्ता सर्वत्र समाई हुई है। साकार होती तो किसी एक स्थान पर, एक नाम- रूप के बंधन में बँधकर रहना पड़ता और वह ससीम बनकर रह जाती। इसलिये उसे भी अपनी इच्छित गतिविधियाँ चलाने के लिये किन्हीं शरीर कलेवरों का आश्रय लेना पड़ता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष परिचय  प्राप्त करना संभव है। निराकार तो प्रकृति की लेजर, एक्स- किरणें आदि अनेक धाराएँ काम करती हैं, पर उनको समझ सकना खुली आँखों से नहीं वरन् किन्हीं सूक्ष्म उपकरणों के सहारे ही संभव हो पाता है। गाड़ी के दो पहिए मिल- जुलकर ही काम चलाते हैं। इसी प्रकार इस संसार की विविध गतिविधियाँ विशेषत: प्राणि समुदाय की इच्छित हलचलों के पीछे अदृश्य सत्ता ही काम करती है, जिसे ईश्वर आदि नामों से जाना जाता है। 
विराट बांड में संव्याप्त सत्ता को विराट् ब्रह्म या परमात्मा कहते हैं। वही सर्वव्यापी, न्यायकर्ता, सत- चित आदि विशेषणों से जाना जाता है। उसका एक छोटा अंश जीवधारियों के भीतर काम करता है। मनुष्य में इस अंश का स्तर ऊँचा भी है और अधिक भी, इसलिये उसके अंतराल में अनेक विभूतियों की सत्ता प्रसुप्त रूप में विद्यमान पाई जाती है। यह अपने निजी पुरुषार्थ के ऊपर अवलंबित है कि उसे विकसित किया जाए या ऐसे ही उपेक्षित रूप में गई गुजरी स्थिति में वहीं पड़ी रहने दिया जाए। 
इस सम्मिश्रण का जहाँ भी अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत स्वरूप दिखाई पड़ता है, उसे प्रतिभा कहते हैं। सदुद्देश्यों के लिये प्रयुक्त किये जाने पर यही प्रतिभा देव- स्तर की बन  जाती है और अपना परिचय महामानवों जैसा देती है, किंतु साथ ही यदि मनुष्य अपनी उपलब्ध स्वतंत्रता का उपयोग अनुचित कामों में करने लगे तो वह दुरुपयोग ही दैत्य बन जाता है। दैत्य अपने और अपने संपर्क वालों के लिये विपत्ति का कारण ही बनते है; जबकि देवता पग- पग पर अपनी शालीनता और उदारता का परिचय देते हुए  अपने प्रभाव- क्षेत्र में सुख, शांति एवं प्रगति का वातावरण बनाते रहते हैं। दैत्य- स्तर के अभ्यास बन जाने पर तो पतन और पराभव ही बन पड़ता है। उसमें तात्कालिक लाभ दीखते हुए भी अंतत: दुर्गुणों का दुष्परिणाम ही प्रत्यक्ष होता है। 
सृष्टि के नियम में कर्म और फल के बीच कुछ समय लगने का विधान है। बीज बोने पर उससे वृक्ष बनने में कुछ समय लग जाता है। अभक्ष्य खा लेने पर दस्त- उल्टी आदि होने का सिलसिला कुछ समय बाद आरंभ होता है। मनुष्यों मेें यह बालबुद्धि देखी जाती है कि वे तत्काल कर्मफल चाहते हैं, देर लगने पर अधीर हो जाते हैं और यह चाहते हैं कि हथेली पर सरसों जमे; कल तक उसमें पौधे जमने की प्रतीक्षा न करनी पड़े। उतावली आतुरता उत्पन्न करती है और मन:स्थिति प्राय: अर्धविक्षिप्त की- सी बना देती है, जिसमें तात्कालिक लाभ भर दीख पड़ता है, चाहे वह कितना ही क्षणिक या दु:खदाई ही क्यों न हो। वह विवेकवान् दूरदर्शिता न जाने कहाँ चली जाती है जिसे  अपनाकर विद्यार्थी विद्वान, दुबले पहलवान, मंदबुद्धि तीव्रबुद्धि एवं निर्धन और पिछड़े धनवान् बनते हैं। यह एक मनुष्य की प्रधान भूल है, जिसके कारण वह अपने जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और वरिष्ठता तक भूल जाता है- मार्ग से भटककर झाड़- झंखाड़ों में मारा- मारा फिरता है। इस भूल को देखकर कई बार यह भी स्वीकारना पड़ता है कि ‘मनुष्य वस्तुत: ईश्वर की संतान तो है ही नहीं वरन् डार्विन के कथनानुसार वह बंदर की ही अनगढ़ औलाद है।’ 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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