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सच यही है कि सारा अस्तित्व एक है और हममें से कोई उस अस्तित्व से अलग- थलग नहीं है। हम कोई द्वीप नहीं है, हमारी सीमाएँ काम चलाऊ हैं। हम किन्हीं भी सीमाओं पर समाप्त नहीं होते। सच कहेें, तो कोई दूसरा है ही नहीं, तो फिर दूसरे के साथ जो घट रहा है, वह समझो अपने ही साथ घट रहा है। भगवान् महावीर, भगवान् बुद्ध अथवा महर्षि पतंजलि ने जो अहिंसा की महिमा गायी, उसके पीछे भी यही अद्वैत दर्शन है। इसका मतलब इतना ही है कि शिष्य होते हुए भी यदि तुम किसी को चोट पहुँचा रहे हो, या दु:ख पहुँचा रहे हो अथवा मार रहे हो, तो दरअसल तुम गुरुघात या आत्मघात ही कर रहे हो, क्योंकि गुरुवर की चेतना में तुम्हारी अपनी चेतना के साथ समस्त प्राणियों की चेतना समाहित है। 
ध्यान रहे जब एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पैदा होता है, तो सारा अस्तित्व उसे सुनता है। थोड़ा सा भाव भी हमारे हृदय में उठता है, तो सारे अस्तित्व में उसकी झंकार  सुनी जाती है। और ऐसा नहीं कि आज ही अनन्त काल तक यह झंकार सुनी जायेगी। हमारा नामोनिशाँ भले ही न रहे। लेकिन हमने जो कभी चाहा, किया, सोच, भावना बनायी थी, वह सब इस अस्तित्व में गूँजती रहेगी। क्योंकि हममें से कोई यहाँ से भले ही मिट जाये, लेकिन कहीं और प्रकट हो जायेगा। 
जो लहर मिट गयी है, उसका जल भी उस सागर में शेष रहता है। यह ठीक है कि एक लहर उठ रही है, दूसरी लहर गिर रही है, फिर लहरें एक हैं, भीतर नीचे जुड़ी हुई हैं और  जिस जल से उठ रही हैं यह लहर, उसी जल से गिरने वाली लहर वापस लौट रही है। इन दोनों के नीचे के तल में कोई फासला नहीं हैं। यह एक ही सागर का खेल है। हम सब भी लहरों से ज्यादा नहीं है। इस जगत् में सभी कुछ लहरवत् हैं। 
परमेश्वर से एक हो चुके चेतना महासागर की भाँति है। सारा अस्तित्व उनमें समाहित है। हमारे प्रत्येक कर्म, भाव एवं विचार उन्हीं की ओर जाते हैं, वे भले ही किसी के लिए भी न किये जाये। इसलिए जब हम किसी को चोट पहुँचाते हैं, दु:ख पहुँचाते हैं, तो हम किसी और को नहीं, सद्गुरु को चोट पहुँचाते हैं, उन्हीं को दु:खी करते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने बैल को चोट पहुँचायी। बाद में वह दक्षिणेश्वर आकर परमहंस देव की सेवा करने लगा। सेवा करते समय उसने देखा कि ठाकुर की पाँव पर उस चोट के निशान थे। पूछने पर उन्होंने बताया, अरे! तू चोट के बारे क्या पूछता है, यह चोट तो तूने ही मुझे दी है। सत्य सुनकर उसका अन्त:करण पीड़ा से भर  गया। 
क्या हम सचमुच ही अपने भगवान से प्रेम से करते हैं एवं उनमें भक्ति है? यदि हाँ तो फिर हमारे अन्त:करण को सभी के प्रति प्रेम से भरा हुआ होना चाहिए। हमें किसी को भी चोट पहुँचाने का अधिकार नहीं है। क्योंकि सभी में भगवान ही समाये हैं। सभी स्थानों पर उन्हीं की चेतना व्याप्त है। इसलिए हमारे अपने मन में किसी के प्रति कोई भी द्वेष, दुर्भाव नहीं होना चाहिए। क्योंकि इस जगत् में ईश्वर, खुदा से अलग कुछ भी नहीं है। उन्हीं के चैतन्य के सभी हिस्से हैं। उन्हीं की चेतना के महासागर की लहरें हैं। इसलिए लोगों को सर्वदा ही श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए। 

गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार 


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