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राष्ट्रीय एकता का वास्तविक तात्पर्य है- मानवीय एकता। मनुष्य की एक जाति है। उसे किन्हीं कारणों से विखण्डित नहीं होना चाहिए। भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, जाति, लिंग, धन, पद आदि के कारण किसी को विशिष्ट एवं किसी को निकृष्ट नहीं माना जाना चाहिए। सभी को समाज में उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए। उपरोक्त कारणों में से किसी को भी यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि अपने को बड़प्पन के अहंकार से भरे और दूसरे को हेय समझे। 
कई प्रान्तों में सम्प्रदाय विशेष के सदस्य होने के कारण अथवा पृथक् भाषा- भाषी होने के कारण अपने वर्ग- वर्ण को पृथक् मानने और राष्ट्रीय धारा से कटकर अपनी विशेष पहचान बनाने की प्रवृत्ति चल पड़ी है। इसे शान्त करने के लिए वैसे ही प्रयत्न कि ए जाने चाहिए, जैसे अग्रिकाण्ड आरम्भ होने पर उसके फैलने से पूर्व ही किए जाते हैं। समता और एकता के उद्यान उजाड़ डालने की छूट किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए। द्वेष को प्रेम से जीता जाता है। विग्रह को तर्क, तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत करते हुए  विवेकपूर्वक शान्त किया जाता है। इसलिए दुर्भाव और विग्रहों के पनपते ही उनके शमन समाधान का प्रयत्न करना चाहिए। 
यह सामयिक उभार है, जो देश का बुरा चाहने वालों को दुरभिसंधि के कारण उठ खड़े हुए हैं। यह विषवेलि पानी न मिलने पर समयानुसार सूख जायेगी। पर कुछ व्याधियाँ ऐसी हैं, जो चिरकाल से चली आने के कारण प्रथा परिपाटी बन गई हैं और उनके कारण देश की क्षमता तथा एकता दुर्बल होती चली आई है। समय आ गया है कि उन भूलों को अब समय रहते सुधार लिया जाय। अन्यथा यह सड़ते हुए फोड़े समूचे शरीर को विषैला कर सकते हैं। 
जब सभी मनुष्यों की संरचना, रक्त- माँस की बनावट एक जैसी है, तो उनमें से किसे ऊँचा, किसे नीचा कहा जा सकता है? ऊँच- नीच तो सत्कर्म और कुकर्म के कारण बनते हैं। उसका जाति- वंश से कोई सम्बन्ध नहीं। धर्म एक है। सम्प्रदायों का प्रचलन तो समय और क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुरूप हुआ है। उनमें से जो जिसे भावे, वह उसे अपनावे। खाने- पहनने सम्बन्ध विभिन्न रुचि को जब सहन किया जाता है, तो भिन्न- भिन्न देवताओं की पूजा, भिन्न परम्पराओं का अपनाया जाना किसी को क्यों बुरा लगना चाहिए? एक बगीचे में अनेक रंगों के फूल हो सकते हैं, तो एक देश में अनके सम्प्रदायों के प्रचलन में ऐसी क्या बात है, जिसके कारण परस्पर विद्वेष किया जाय और एक- दूसरे को नास्तिक या अधर्मी कहकर निन्दित बताया जाय। सम्प्रदायों की एकता पर हम सबको पूरा जोर देना चाहिए। भाषाओं की भिन्नता पर लडऩे की आवश्यकता नहीं। अनेकता को हटाकर हमें भाषायी एकता अपनानी चाहिए ताकि समूचे देशवासी अपने विचारों का आदान- प्रदान सरलता के साथ कर सकें। 
नर- नारी के बीच बरता जाने वाला भेद- भाव तो और भी निन्दनीय है। हम अपनी ही माताओं, पुत्रियों, बहिनों, पत्नियों को हेय दृष्टि से देखें, यह कैसी अनीति है? इस भूल को अपनाये रहने पर आधा समाज पक्षाघात पीडि़त की तरह अपंग रह जाता है। परिवार वैसे नहीं बन पाते जैसे कि सुयोग्य गृहलक्ष्मी के नेतृत्व में वे बन सकते हैं। 
भारतीय संस्कृति के दो प्रमुख आदर्श हैं। एक ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ दूसरा ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’। इन दोनों को हृदयंगम करने पर एक ता और समता को ही मान्यता देनी पड़ती हैै। इन आदर्शों को हमें किसी देश, क्षेत्र, सम्प्रदाय के सुधार तक ही सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाना चाहिए, ताकि समूची मनुष्य जाति सुख- शान्ति से रह  सके और सर्वतोमुखी कर सके। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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