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गायत्री उपासना से मानव शरीर में सन्निहित अगणित संस्थानों में से कितने ही जाग्रत एवं प्रखर हो चलते हैं। इस जागृति का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित होने में सहायक सिद्ध होता है। 
व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, अध्ययन से विद्या आती है, श्रम करने से धन कमाया जाता है, सत्कर्मों से यश मिलता है। सद्गुणों से मित्र बढ़ते हैं। इसी प्रकार उपासना द्वारा अंतरंग जीवन में प्रसुप्त पड़ी हुई अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ सजग हो उठती हैं और उस जागृति का प्रकाश मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक विशिष्टता का रूप धारण करके प्रकट करता हुआ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री उपासक में तेजस्विता की अभिवृद्धि स्वाभाविक है। तेजस्वी एवं मनस्वी व्यक्ति स्वभावत: हर दिशा में सहज सफलता प्राप्त करता चलता है। 
मानवीय मस्तिष्क में जो शक्ति केन्द्र भरे पड़े हैं, उनका पूरी तरह उपयोग कर सकना तो दूर, अभी मनुष्य को उनका परिचय भी पूरी तरह नहीं मिला है। मनोवैज्ञानिकों को अंतर्मन की जितनी जानकारी अभी तक विशाल अनुसंधानों के बाद मिल सकी है, उसे वे दो प्रतिशत जानकारी मानते हैं। इसी प्रकार शरीर शास्त्री डॉक्टरों ने बाहरी मस्तिष्क का केवल आठ प्रतिशत ज्ञान प्राप्त किया है शेष के बारे में वे अभी भी अनजान हैं। मस्तिष्क सचमुच एक जादू का पिटारा है। इसमें सोचने समझने की क्षमता तो है ही, साथ ही उसमें ऐेसे चुम्बक तत्त्व भी हैं, जो अनंत आकाश में भ्रमण करने वाली अद्भुत सिद्धियों, विभूतियों एवं सफलताओं को अपनी ओर खींचकर आकर्षित कर सकते हैं, सूक्ष्म जगत् में अपने अनुकूल वातावरण बना सकते हैं। मनोबल बढऩे से ऐसी विद्युत धारा अंतर्मन के प्रसुप्त क्षेत्रों में गतिशील हो जाती है कि अब तक अपने प्रयोजन में आया हुआ मस्तिष्कीय चुम्बक सक्रिय हो उठता है और वे उपलब्धियाँ सामने लाकर खड़ी कर देता है, जिन्हें आमतौर से सिद्धियाँ, विभूतियों का वरदान एवं दैवीय सहायता कहा जा सके। 
उपासना में बरती गई तपश्चर्या से द्रवित होकर गायत्री माता ने अमुक सिद्धि या सफलता प्रदान की। यह भावुक भक्त का दृष्टिकोण है। इसी तथ्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि कठोर नियम, प्रतिबंधों का पालन करने में जो प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ी, उसने मनोबल का विकास किया। उसने अंतर्मन के प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों का चुम्बकत्व जगाया और उसी जागरण ने अभीष्ट सफलताएँ खींचकर सामने ला खड़ी कर दीं। मनुष्य अपने आप में एक देवता है। उसके भीतर वे समस्त दैवी शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान रहती हैं, जो इस विश्व में अन्यत्र कहीं भी हो सकती हैं। अन्यत्र रहने वाले देवता अपनी निर्धारित जिम्मेदारियाँ पूरी करने में लगे रहते हैं। वे हमारे व्यक्तिगत कामों में इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं ले सकते कि अगणित उपासकों या भक्तों की अगणित प्रकार की समस्याओं के सुलझाने में सहयोगी हो सकें। हमारी समस्याओं को हल करने की क्षमता हमारे अपने भीतर रहने वाले देवता में ही होती है और उसी को किसी अनुष्ठान द्वारा सशक्त एवं गतिशील बना करके साधक को अपना प्रयोजन वस्तुत: आप ही पूरा करना पड़ता है। 
गायत्री उपासना मनुष्य जीवन को बहिरंग एवं अंतरंग दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध और समुन्नत बनाने का राजमार्ग है। बाह्य उपचार से बाह्य जीवन की प्रगति होती है, पर अंतरंग विकास के बिना उसमें पूर्णता नहीं आ पाती। बाहरी जीवन की विशेषताएँ छोटा सा शोक, संताप, रोग, कष्ट अवरोध एवं दुर्दिन सामने आते ही अस्त- व्यस्त हो जाती है, पर जिस व्यक्ति के पास आंतरिक दृढ़ता, समृद्धि एवं क्षमता है, वह बाहर के जीवन में बड़े से बड़ा अवरोध आने पर भी सुस्थिर बना रहता है और भयानक भँवरों को चीरता हुआ अपनी नाव पार ले जाता है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक शांति के लिए उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है।

 गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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