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गायत्री साधना का प्रत्यक्ष परिणाम है- सात्विक आत्मबल की अभिवृद्धि। सात्विक आत्मबल के दस लक्षण हैं- उत्साह, सतत परिश्रम, कर्तव्यपरायणता, संयम, मधुर स्वभाव, धैर्य, अनुद्वेग, उदारता, अपरिग्रह और तत्त्वज्ञान। यदि कोई व्यक्ति सच्ची गायत्री साधना कर रहा है, तो उसमें अवश्य ही ये गुण बढ़ेंगे और जैसे- जैसे यह बढ़ोत्तरीआगे चलेगी, वैसे ही वैसे जीवन की कठिनाइयों का समाधान होता चलेगा। जब साधक की आत्मा गायत्री शक्ति से परिपूर्ण हो जाती है, तो उसे किसी भी प्रकार का कोईकष्ट, अभाव या दु:ख नहीं रह जाता। वह निरंतर पूर्ण परमानन्द का, ब्रह्मानन्द का अलौकिक रसास्वादन करता रहता है। 
भ्रांत, पथ- भ्रष्ट, लालची, गायत्री को मुफ्त में ठगने का षड्यंत्र करने वाले लोग सच्ची साधना नहीं कर सकते। करना तो दूर, उसे ठीक तरह समझ भी नहीं सकते। वेजिह्वा के अग्र भाग से 24 अक्षरों की तोता रटंत करते हैं; अंत:करण में श्रद्धा- विश्वास का नाम भी नहीं होता, मातृ- भक्ति का प्रेमांकुर कहीं दीख नहीं पड़ता। जितने मिनट  चौबीस अक्षर रटते हैं, उतने समय अपनी अवांछनीय, अनैतिक, अवास्तविक मृग तृष्णाओं में ही मन को लपलपाते रहते हैं। दस- पाँच दिन जप करने पर यदि उनकी सब तृष्णाएँ पूरी नहीं हो गयीं, तो उनका साहस टूट जाता है और साधना को छोड़ बैठते हैं। साधना विधि से छोटे- छोटे नियम बंधनों तक को गवारा नहीं करना चाहते। दान- पुण्य के नाम पर एक कौड़ी खर्च करना ब्रज उठाने के समान भारी मालूम पड़ता है। ऐसे लोगों की साधना प्राय: निष्फल रहती है। कई बार तो वह पहले की अपेक्षा भी घाटे में रहते हैं। वे सोचने लगते हैं कि हमारे सब काम गायत्री करके रख जायेगी, इसलिए हमें अब कुछ करना नहीं है। वे अपने रहे बचे प्रयत्न को भी छोड़ बैठते हैं। आलस्य, अकर्मण्यता और परावलम्बन की मनोवृत्ति में केवल कार्य नाश ही हो सकता है। ऐसी दशा में उनका लँगड़ा- लूला विश्वास भी नष्ट हो जाता है और भविष्य में आत्म- विद्या के दुरुपयोग से कोई लाभ उठाने का उनमें उत्साह भी नहीं रहता। 
उपरोक्त प्रकार की छछोरी बुद्धि के साथ, बाल- क्रीड़ा के साथ साधना करना निष्प्रयोजन है। कभी- कभी तत्काल आश्चर्यजनक परिणाम भी होते अवश्य है; पर सदा ही वैसी आशा नहीं की जा सकती। वेदमाता की आराधना एक प्रकार का आध्यात्मिक कायाकल्प करना है। जिन्हें कायाकल्प कराने की विद्या मालूम है, वे जानते हैं कि इस महा अभियान को करते समय कितने धैर्य और संयम का पालन करना होता है, तब कहीं शरीर की जीर्णता दूर होकर नवीनता प्राप्त होती है। गायत्री आराधना का आध्यात्मिक कायाकल्प और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके लाभ केवल शरीर तक ही सीमित नहीं हैं, वरन् शरीर, मस्तिष्क, चित्त, स्वभाव, दृष्टिकोण सभी का नवनिर्माण होता है और स्वास्थ्य, मनोबल एवं सांसारिक सुख- सौभाग्यों में वृद्धि होती है। ऐसे असाधारण महत्त्व के अभियान में समुचित श्रद्धा, सावधानी, रुचि व तत्परता रखनी पड़े, तो इसे कोई बड़ी बात न समझना चाहिए। केवल शरीर को पहलवानी के योग्य बनाने में काफी समय तक धैर्यपूर्वक व्यायाम करते रहना पड़ता है। दण्ड, बैठक, कुश्ती आदि के कष्ट साध्य कर्मकाण्ड करने होते हैं। 
यह सत्य है कि कई बार जादू की तरह गायत्री उपासना का लाभ होता है। आई हुई विपत्ति अति शीघ्र दूर हो जाती है और अभीष्ट मनोरथ आश्चर्यजनक रीति से पूरे हो जाते हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि अकाट्य प्रारब्ध भोग न टल सके और अभीष्ट मनोरथ पूरा न हो। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग का ही उपदेश दिया है। साधना कभी निष्फल नहीं जाती। उसका तो परिणाम मिलेगा ही; पर हम अल्पज्ञ होने के कारण अपना प्रारब्ध और वास्तविक हित नहीं समझते। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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