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बाहरी दुनिया में मुलजिम को सजा दिलाने का काम दो महकमों के अधीन है, एक पुलिस, दूसरा अदालत। पुलिस तो मुलजिम को पकड़ती है और उसके कामों का सबूत एकत्रित करके अदालत के सामने पेश करती है। फिर अदालत का महकमा अपना काम करता है। जज महाशय अपराध और अपराधी की स्थिति के बारे में कई दृष्टियों से विचार करते हैं, तब जैसा उचित होता है, वैसा फैसला करते हैं। एक ही जुर्म में आए हुए अपराधियों को अलग- अलग तरह की सजा देते हैं। तीन खूनी पकड़ कर लाए गए, इनमें एक को बिल्कुल बरी कर दिया, दूसरे को पाँच साल की सजा मिली, तीसरे को फाँसी। हत्या तीनों ने की थी, पर सजा देते वक्त मजिस्ट्रेट ने कई बातों पर विचार किया। जिसे बरी कर दिया गया, वह मकान बनाने वाला मजदूर था, छत पर काम करते वक्त पत्थर का टुकड़ा उसके हाथ से अचानक छूट गया और वह नीचे सड़क पर चलते मुसाफिर के सिर में लगा, सिर फट गया, मुसाफिर की मृत्यु हो गई। जज ने देखा कि हत्या तो अवश्य हुई, मजदूर निर्दोष है, उसने जान- बूझकर बुरे इरादे से पत्थर नहीं फेंका था, इसलिए उसे बरी कर दिया गया। दूसरा मुलजिम एक किसान था। खेत काटते हुए चोर को ऐसी लाठी मारी कि वह मर गया। मजिस्ट्रेट ने सोचा- चोरी होते देखकर गुस्सा आना स्वाभाविक है, पर किसान की इतनी गलती है कि मामूली अपराध पर इतना नहीं मारना चाहिए था, इसलिए उसे पाँच साल की सजा मिली। तीसरा मुलजिम एक मशहूर डाकू था। एक धनी पुरुष के घर में रात को घुस गया और उसका कत्ल करके धन- माल चुरा लाया। इसका अपराध जघन्य था इसलिए फाँसी की सजा दी गई। तीनों ही अपराधियों ने खून किया था, जुर्म का बाहरी रूप एक- सा था, पर सूक्ष्मदर्शी मजिस्ट्रेट बाहरी बातों को देखकर ही सजा नहीं दिया, वरन् भीतरी बारीकियों पर भली प्रकार विचार किया, तब कुछ फैसला दिया। 
भीतरी दुनिया में भी गुप्त- चित्र या चित्रगुप्त पुलिस और अदालत दोनों महकमों का काम स्वयं ही करता है। यदि पुलिस झूठा सबूत दे दे, तो अदालत का फैसला भी अनुचित हो सकता है, परन्तु भीतरी दुनिया में ऐसी गड़बड़ी की संभावना नहीं। अंत:करण सब कुछ जानता है कि यह कर्म किस विचार से, किस इच्छा से, किस परिस्थिति में, क्यों किया गया था। वहाँ बाहरी मन को सफाई या बयान देने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि गुप्त मन उस बात के संबंध में स्वयं ही पूरी- पूरी जानकारी रखता है। हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं, उस इच्छा या भावना से ही पाप- पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की नापतौल बाहरी दुनिया में होती है। एक गरीब आदमी दो पैसा दान करता है और एक धनी आदमी दस हजार रुपया दान करता है, बाहरी दुनिया तो पुण्य की तौल रुपये- पैसों की गिनती के अनुसार करेगी। दो पैसा दान करने वाले की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखेगा, पर दस हजार रुपया देने वाले की प्रशंसा चारों ओर फैल जाएगी। भीतरी दुनिया में यह नापतौल नहीं चलती। अनाज के दाने अँगोछे में बाँधकर गाँव के बनिए की दुकान पर चले जाएँ, तो वह बदले में गुड़, रुपये देगा, पर उसी अनाज को इंग्लैंड की राजधानी लंदन में जाकर किसी दुकानदार को दिया जाय, तो वह कहेगा- महाशय! इस शहर में अनाज के बदले गुड़ या रुपया नहीं मिलता, यहाँ तो पौंड, शिलिंग, पेंस का सिक्का चलता है। ठीक इसी तरह बाहरी दुनिया में रुपयों की गिनती से, काम के बाहरी फैलाव से, कथा- वार्ता से, तीर्थयात्रा आदि भौतिक चीजों से यश खरीदा जाता हैं, पर चित्रगुप्त देवता के देश में यह सिक्का नहीं चलता, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप- तौल है। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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