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मनुष्य विद्युत- शक्ति का भण्डार है। उसमें प्राण तत्व इतनी प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है कि उसके आधार पर असम्भव और आश्चर्यजनक कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है, किन्तु हम उसका सदुपयोग करना सीख जायें, तो जीवन की दिशा दूसरी हो सकती है। मानवीय विद्युत का समुचित उपयोग करना, सीखना वैसा ही उपयोगी है, जैसे बैंक में जमा हुए रुपये को निकालने की जानकारी रखना। वे मनुष्य बड़े अभागे हैं, जिनकी विपुल सम्पत्ति बैंक में जमा है, किन्तु उसे निकालने की विधि नहीं जानते और पैसे- पैसे को मुहताज फिरते हैं। आध्यात्मिक साधना का यह प्रथम फल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि अपनी अपरिमेय शक्ति का समुचित उपयोग करना मालूम हो जाय। 
      दु:खों को दूर करने और सुख प्राप्त करने का हम सतत प्रयत्न करते हैं, सारा जीवन इन्हीं दोनों की उलट- पुलट में व्यतीत हो जाता है, किन्तु मनोकामना पूरी नहीं होती। यदि कोई ऐसा उद्गम प्राप्त हो जाय, जहाँ से सुख और दु:ख का उदय होता है और वहाँ अपनी इच्छानुसार चाहे जिसे ले लेने की सुविधा हो, तो क्या इसे मामूली चीज समझना चाहिए? विद्या, धन, स्वास्थ्य, स्त्री, सन्तान प्राप्त करने पर भी जिस सुख को हम नहीं प्राप्त कर सकते उसकी सच्ची स्थिति प्राप्ति का सच्चा मार्ग केवल आध्यात्मिक साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। 
      अपनी शक्ति को विकसित करना यह कितना महान लाभ है। मानवीय अन्त:स्थल में ऐसे- ऐसे अस्त्र- शस्त्र छिपे पड़े हैं जो भौतिक विज्ञान द्वारा अब तक न तो बन सके हैं और न भविष्य में बनने की संभावना है। यह हथियार वाल्मीकि जैसे डाकुओं को ऋषि के रूप में परिणित करने की भी शक्ति रखते हैं। सुदामा और नरसी जैसे दरिद्रों के सामने क्षण भर में स्वर्ण सम्पदा के पर्वत खड़े कर सकते हैं, कोढिय़ों को स्वर्णकाय बना सकते हैं और डूबते दरिद्रों को पार कर सकते हैं। यह दिव्य शक्तियाँ भी आत्म- साधना द्वारा ही सम्भव हैं। 
      हम स्वयं क्या हैं? संसार क्या है? स्वर्ग और मुक्ति क्या है? इनका ठीक ज्ञान के बजाय साधना तत्व के बारे में जान लिया जाय। कारण हजारों मन सिद्धान्तों के ज्ञान से एक छटाक भर साधनों का आचरण अधिक लाभप्रद है। इसलिए अपने दैनिक जीवन में योग, धर्म एवं दर्शन शास्त्रों में बताए हुए साधनों का अभ्यास कीजिए, जिससे मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य- ‘आत्म- साक्षात्कार’ की शीघ्र प्राप्ति हो। 
      इस साधनपट में उपरोक्त साधनों का तत्व एवं सनातन धर्म का विशुद्ध स्वरूप ३२ शिक्षाओं द्वारा दिया गया है। उनका अभ्यास वर्तमान काल के अत्यन्त कार्यग्रस्त स्त्री पुरुषों के लिए भी सुशक्य है। उनके समय और परिमाण में यथानुकूल परिवर्तन कर लीजिए और उनकी मात्रा धीरे- धीरे बढ़ाते जाइये। आप अपने चरित्र या स्वभाव में एकाएक परिवर्तन नहीं कर सकेंगे, इसलिए आरम्भ में इनमें थोड़ी ऐसी शिक्षाओं के आचरण का संकल्प कीजिए, जिनसे आपके वर्तमान स्वभाव और चरित्र में थोड़ा निश्चित सुधार हो। क्रमश: इन साधनों का समय और परिमाण बढ़ाते जाइये। यदि किसी दिन बीमारी, सांसारिक कार्यों की अधिकता या किसी अनिवार्य कारणों से आप निश्चित साधनाओं को न कर सकें तो उनके बदले पूरे समय या यथासम्भव ईश्वर नाम स्मरण या जप कीजिए, जो चलते- फिरते या अपने सांसारिक कर्म करते हुए भी किया जा सकता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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