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जिन विचारों पर हम विश्वास करते हैं, बार- बार चिंतन करते, हृदय पटल पर लाते हैं, जिन्हें हम मन के अव्यक्त प्रदेश में प्रवेश करते हैं। वे ही हमारे अंत:करण की नींव हो जाते हैं। कुटिल एवं असत्य विचार से मुक्ति का सरल उपाय सुविचार की भावना को दृढ़ कराना है। दुर्विचार से लड़- झगड़ कर हम उसे नहीं निकाल सकते। शांतिदायक सुविचार की गंगा प्रवाहित करने पर ही हम मानसिक दुर्बलता से मुक्त हो सकते हैं। प्रत्येक विचार अंत:करण में एक मानसिक मार्ग का निर्माण करता है। हमारी समस्त आदतें ऐसे ही मानसिक मार्ग हैं, जो लगातार एक ही प्रकार के चिंतन मनन से विनिर्मित हुए हैं। लगातार ये विचार प्रबलता से अंत:स्थल पर लाये गये और वे वस्तु स्वभाव का एक विशिष्ट अंग बन गये। 
       तुम मन: प्रदेश में उत्तम रचनात्मक विचार ही प्रवेश करने दो। पवित्र विचारों का ही स्वागत करो। उत्कृष्ट विचारों को ही मस्तिष्क पर अंकित करो। जो प्रेम, ईश्वर, नीति के विरोधी विचार हों, उन्हें निकाल फेंको। अपनी भ्रमित बुद्धि को ईश्वरीय विचारधारा में बदल दो। जब तुम्हारे विचारों का केन्द्र भगवान, अल्लाह, ईश्वर होंगे, तो सुनिश्चित दिशाओं में ही हृदय का विकास होगा। 
      संसार के अन्य उत्कृष्ट शक्ति सम्पन्न महापुरुषों ने जो अद्भुत कार्य किये हैं, विचार कला मर्मज्ञ के लिए उन कार्यों का संपादन करना कदापि दुष्कर नहीं है। विचार करो। सोचो, तुम किस तत्त्व में, किस बात में, किस दशा में पिछड़ रहे हो? पीछे रह जाने का क्या कारण है? तुम उसे कितने अंशों में पूर्ण कर सकते हो, तुम्हारे मार्ग में कौन- कौन बाधाएँ उपस्थित हैं? तुम गीली मिट्टी के नष्ट हो जाने वाले पुतले, रक्त के थैले, निर्जीव मुर्दे सुदृढ़, केवल देह नहीं हो, आकार प्रकार बाह्य चमक दमक नहीं हो, तुम तो अमर आत्मा हो। शक्ति के महासागर हो। तुम सत्य, स्वतंत्र, शिव, कल्याण, बलवान, तुम आनंदमय, पूर्ण निर्दोष, स्वच्छ और पवित्र हो। 
      तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है। परमेश्वर इस शक्ति का पुंज है। तुम परमेश्वर के राजकुमार हो। अतएव तुम्हारी पैतृक सम्पत्ति शक्ति ही है। शक्ति तुम्हारे अंतर तथा बाह्य अंगों में पूर्णत: व्याप्त है। शक्ति तुम्हारे रोम- रोम में संचार कर रही है। तुम्हारे नेत्रों में उसी शक्ति का प्रकाश है। अनंत शक्ति का विशाल समुद्र तुम्हारे पीछे है। निर्बलता, निराशा, भय तथा चिंता के सब संशयदायक विचार हृदय मंदिर से निकाल दो और शक्ति के विचारों में लीन हो जाओ। 
      परमेश्वर ने सबको समान शक्तियाँ प्रदान की हैं। ऐसा नहीं कि किसी में अधिक किसी में कम हो। किसी के साथ खास रियासत की गयी हो। ईश्वर, अल्लाह के यहाँ अन्याय नहीं है। समस्त अद्भुत शक्तियाँ तुम्हारे शरीर में विद्यमान हैं। तुम उन्हें जाग्रत करने का कष्ट नहीं करते। कितनी ही शक्तियों से कार्य न लेकर तुम उन्हें कुंठित कर डालते हो। अन्य व्यक्ति उसी शक्ति को किसी विशेष दिशा में मोडक़र उसे अधिक परिपुष्ट एवं विकसित कर लेते हैं। 
अपनी शक्तियों को जाग्रत, विकसित कर लेना या उन्हें शिथिल पंगु बना डालना स्वयं तुम्हारे हाथ में है। यदि तुम अपने मन की गुप्त महान सामर्थ्यों को जाग्रत कर लो और लक्ष्य की ओर प्रयत्न, और उत्साहपूर्वक अग्रसर होना सीख लो, तो जैसा चाहो आत्म निर्माण कर सकते हो। मनुष्य जिस वस्तु की आकांक्षा करता है। उसके मन में जिन महत्त्वाकाँक्षाओं का उदय होता है और जो- जो आशा पूर्ण तरंगें उदित होती हैं, वे अवश्य पूर्ण हो सकती हैं यदि वह दृढ़ निश्चय द्वारा अपनी प्रतिभा को जगा ले। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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