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मन की चाल दोमुँही है। जिस प्रकार दोमुँही साँप कभी आगे, कभी पीछे चलता है, उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किसे रोका जाय, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि इस समय हमारे मन की गति किस दिशा में है? यदि सही दिशा में प्रगति हो रही हैं, तो उसे प्रोत्साहन दिया जाय और यदि दिशा गलत है, तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाय, इसी में बुद्धिमत्ता है। क्योंकि सही दिशा में चलता हुआ मन जहाँ हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है, वहाँ कुमार्ग पर चलते रहने से एक दिन दु:खदायी दुर्दिन का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाना ही उचित है। 
उचित दिशा में चलता हुआ मन आशावादी, दूरदर्शी, पुरुषार्थी और सुधारवादी होता है। इसके विपरीत पतनोन्मुख मन सदा निराश रहने वाला, तुरन्त की बात सोचने वाला, भाग्यवादी, कठिनाइयों की बात सोच-सोचकर खिन्न रहने वाला होता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करता। मन पत्थर या काँच का बना नहीं होता जो बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर मन को सुधारा और बदला जा सकता है। यह सुधार ही जीवन का वास्तविक सुधार है। समाज निर्माण का प्रमुख सुधार यह मानसिक परिवर्तन ही है। हमारा मन यदि अग्रगामी पथ पर बढऩे की दिशा पकड़ ले, तो जीवन के सुख-शान्ति और भविष्य के उज्ज्वल बनने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। 
जिनने आशा और उत्साह का स्वभाव बना लिया है, वे उज्ज्वल भविष्य के उदीयमान सूर्य पर विश्वास करते हैं। ठीक है, कभी-कभी कोई बदली भी आ जाती है और धूप कुछ देर के लिए रुक भी जाती है। पर बादलों के कारण  सूर्य सदा के लिए अस्त नहीं हो सकता है। असफलताएँ और बाधाएँ आते रहना स्वाभाविक है। उनका जीवन में आते रहना वैसा ही है जैसा आकाश में धूप-छाँह की आँख मिचौनी होते रहना। कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और आगे बढऩे की चेतावनी देने आती हैं। आज यदि सफलता मिली है, प्रतिकूलता उपस्थित है, संकट का सामना करना पड़ रहा है, तो कल उस स्थिति में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। आशावादी व्यक्ति छोटी-छोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे रास्ता खोजते हैं और धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं, क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र बताये गये हैं। 
निराशा एक प्रकार की कायरता है। बुजदिल आदमी ही हिम्मत हारते हैं, जिसमें वीरता और शूरता का, पुरुषार्थ और पराक्रम का एक कण भी शेष होगा, वह यही अनुभव करेगा कि मनुष्य महान है, उसकी शक्तियाँ महान हैं, वह दृढ़ निश्चय और सतत परिश्रम के द्वारा असम्भव को सम्भव बना सकता है। यह जरूरी नहीं कि पहला प्रयत्न ही सफल होना चाहिए। असफलताओं का मन पर जो प्रभाव नहीं पडऩे देते और आगामी कल के लिए आशान्वित रहते हैं, वस्तुत: वे ही शूरवीर हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती है। जो मरते दम तक आशा को नहीं छोड़ते और जीवन संग्राम को एक खेल समझते हुए हँसते, खेलते, लड़ते रहते हैं उन्हीं वीर पुरुषार्थी महामानवों के गले में अनन्त विजय वैजयन्ती पहनाई जाती है। बार-बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन कहलाता है। कठिनाइयों और असफलताओं से हताश न होना, वीरता का यह एक ही चिह्न है। जिन्होंने अपने को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है, उनकी जीवन साधना सफल हुई है। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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