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भावनाशील प्रतिभाओं को खोजना, एक सूत्र में बाँधना और उन्हें मिलजुल कर सृजन के लिए कुछ करने में जुटाना सतयुग की वापसी का शिलान्यास है। इसके उपरान्त ही उज्ज्वल भविष्य का भव्य भवन खड़ा हो सकने का विश्वास किया जा सकता है। इसलिए इसे सम्पन्न करने के लिए इस आड़े समय में किसी प्राणवान् को निजी कार्यों की व्यस्तता की आड़ लेकर बगलें नहीं झाँकनी चाहिए। युगधर्म की इस प्रारंभिक माँग को हर कीमत पर पूरा करना ही चाहिए। 
इन्हीं दिनों उठने वाला दूसरा चरण है- नारी जागरण। आज की स्थिति में नारी- नर की तुलना में कितनी पिछड़ी हुई है, इसे हर कहीं नजर पसारकर देखा जा सकता है। परम्परा निर्वाह के नाम पर उसे बाधित और प्रतिबन्धित रहने के लिए कोई ऐसी भूमिका निभाने की गुंजाइश नहीं है, जिससे उसे एक समग्र मनुष्य कहलाने की स्थिति तक पहुँचने का अवसर मिले। नारी के रूप में प्राय: आधी जनसंख्या की यही स्थिति है। प्राय: शब्द का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है कि उनमें से कुछ सोने की जंजीरों से जकड़ी हैं, तो कुछ लोहे की जंजीरों से। इनमें से कुछ निश्चिन्त कहलाती और नौकरी प्राप्त कर लेने, धनी घर की वधू बन जाने जैसे स्तर प्राप्त कर लेती हैं, पर उन्हें भी समग्र मनुष्य जैसा स्वावलम्बन उपलब्ध कहाँ है? शेष तो अशिक्षा, अस्वस्थता से ग्रस्त होने के कारण पूरी तरह परावलम्बी ही बनी हुई हैं। नारी का पिछड़ी स्थिति में पड़े रहना समूची मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। इसे अर्धांग- पक्षाघात पीडि़त जैसी स्थिति भी कहा जा सकता है। एक पहिया टूटा और दूसरा साबुत हो, तो गाड़ी ठीक प्रकार चलने और लक्ष्य तक पहुँचने में कैसे समर्थ हो सकती है? आधी जनसंख्या अनगढ़ स्थिति में रहे और दूसरा आधा भाग उसे गले के पत्थर की तरह लटकाए फिरे, तो ऐसी स्थिति में किसी प्रकार समय तो पूरा किया जा सकेगा, पर किसी महत्त्वपूर्ण प्रगति की सम्भावना बन पडऩा तो दुष्कर ही रहेगा। अपंग स्तर का व्यक्ति स्वयं कुछ कर नहीं पाता, दूसरों की अनुकम्पा पर ही जीता है, पर यदि उनकी स्थिति अन्य समर्थों जैसी हो जाय, तो किसी के अनुग्रह पर रहने की अपेक्षा वह अपने परिकर को अपनी उपलब्धियों से लाद सकता है। जब लेने वाला देने वाले में बदल जाय, तो समझना चाहिए कि खाई पटी और उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी हो गई। आधी जनसंख्या तक स्वतंत्रता का आलोक पहुँचाना और उसे अपने पैरों पर खड़ा हो सकने योग्य बनाना उस पुरुष वर्ग का विशेष रूप से कर्तव्य बनता है, जिसने पिछले दिनों अपनी अहमन्यता की पूर्ति की ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न की। पाप का प्रायश्चित्त तो करना ही चाहिए। खोदी हुई खाई को पाट कर समतल भूमि भी बनानी चाहिए, ताकि उसका उपयुक्त प्रयोग हो सके। 
नारी जागरण आन्दोलन इसी पुण्य प्रयास के लिए उभारा गया है। उसके लिए विभिन्न समारोह तो आए दिन होते रहते हैं, पर इतने भर से उतनी गहराई तक नहीं पहुँचा जा सकता, जितनी की इस बड़ी समस्या के समाधान हेतु आवश्यक है। उसके लिए व्यापक जनसम्पर्क साधने और प्रचलित मान्यताओं को बदलने की सर्वप्रथम आवश्यकता है। कारण कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक के मन में यह मान्यता गहराई तक जड़ जमा चुकी है कि नारी का स्तर दासी तक ही रहना चाहिए। यही परम्परा है, यही शास्त्र वचन। स्वयं नारी तक ने अपना मानस इसी ढाँचे में ढाल लिया है। चिरकाल तक अँधेरे में रहने वाले कैदियों की तरह उसका मन भी प्रकाश के सम्पर्क में आने का साहस टूट गया है। आवश्यकता प्रस्तुत समूचे वातावरण को बदलने की है; ताकि सुधार प्रक्रिया की लीपा- पोती न कर उसके जड़ तक पहुँचकर वहाँ अभीष्ट परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सके। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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