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दो कदम जीवन की उन्नति और प्रगति के लिए हैं। उनमें से एक- एक कदम समय रहते बढ़ा लेना चाहिए। 
पाप घटाएँ- विचार करना चाहिए कि हमारे शारीरिक- मानसिक और आध्यात्मिक पाप क्या- क्या हैं? और जो पाप अब तक हम करते रहे हैं? उनमें से एक पाप को छोड़ ही देना चाहिए। 
शारीरिक पापों में मैं हमेशा ऐसे तीन पापों को प्रमुखता देता रहा हूँ। एक पाप- मांस खाना। हृदयवान व्यक्ति और दयावान व्यक्ति मांस नहीं खा सकता है। इसीलिए मांस खाना छोडऩा चाहिए। दूसरा शारीरिक पाप। शारीरिक पापों में समय का दुरुपयोग करना और आलसी आदमी के तरीके से पड़ा रहना। आलस्य एक बहुत बुरे किस्म का पाप है। समाज के प्रति व्यक्ति को उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए। हराम की कमाई खाना भी एक बहुत बड़ा पाप है। बिना परिश्रम किये आप क्यों खायें? आपने मजदूरी करने के लिए प्रतिज्ञा की है, पूरी मजदूरी क्यों नहीं करें? पूरी मजदूरी का अर्थ है- पसीने की ही कमाई खानी चाहिए और हराम का पैसा नहीं ही खाना चाहिए। 
पुण्य बढ़ाएँ- बाप- दादा की मृत्यु हो जाए, घर में किसी की मृत्यु हो जाए, दावत खाई जाए। ये क्या वाहियात है? घर में जिसकी मृत्यु हो गई है तो सहायता की जानी चाहिए, उसकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जाना चाहिए, उसकी हिम्मत बढ़ाई जानी चाहिए। घर में बेचारे के यहाँ दो मन अनाज है, उसको भी खा- पी करके, उसको भी दावत उड़ा करके मूछों पर ताव दे करके भाग जाना चाहिए। हमको देखना चाहिए कि हमारी बिरादरी, हमारी कौम और हमारे समाज में क्या- क्या सामाजिक बुराइयाँ हैं? उनमें से कोई न कोई एक को तो छोड़ ही देनी चाहिए। 
इसी तरह से कोई एकाध अच्छाई ग्रहण करनी चाहिए। अच्छाइयों में से एक अच्छाई ये है कि हम में से हर आदमी को भगवान्, ईश्वर खुदा पर विश्वास करना आना चाहिए। उनकी पूजा, दुआ के साथ उन पर अटूट विश्वास सख्त जरूरी है। बहुत से मनुष्य ऐसे हैं, जो पूजा- प्रार्थना तो करते हैं, पर उन पर विश्वास बिलकुल नहीं करते हैं। उन पर विश्वास करते, तब उनको पाप करने की इच्छा क्यों होती? ईश्वर पर विश्वास कर लिये होते, तो बात- बात में रोते- चिल्लाते, डरते और कमजोर होते क्यों? हानि जरा- सी हो जाती और आपे से बाहर हो जाते हैं, ये क्यों होता? खुदा पर विश्वास करने वाला ऐसा नहीं कर सकता है। बड़ा धीर, वीर और गंभीर होता है। उन पर विश्वास तो आदमी को होना चाहिए। भगवान् का भक्त हो, तो वो भी अच्छी बात है। उसको मैं आस्तिक कहता हुँ। आस्तिकता को अपने मन में धारण करने वाली बात हर आदमी को करनी चाहिए। 
इसी प्रकार से आदमी को एक और बात शुरू करनी चाहिए कि हम अपनी संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग जो बहुत छोटा है, उसको हम पालन, पूरा किया करेंगे। एक महत्त्वपूर्ण अंग ये है कि हमको अपने बड़ों- बुजुर्गों की इज्जत करनी सीखना चाहिए। मैं उनकी हर बात मानने के लिए नहीं कहता। जो बात मुनासिब नहीं है, बिलकुल नहीं मानना चाहिए। लेकिन बड़ों की इज्जत जरूर करनी चाहिए। बड़ों के पैर छूना, नमस्कार करना चाहिए। सबेरे जल्दी उठना चाहिए। ये हमारी शालीनतापरक प्रक्रिया है। इससे परिवारिक वातावरण अच्छा होता है। छोटे और बड़ों के बीच प्रेम भाव पैदा होता है। परिवार प्रणाली में जहाँ जरा- जरा सी बात के ऊपर बार- बार मोह- मालिन्य पैदा होते रहते हैं, वह इससे दूर हो जाते हैं और हमारे बच्चों को ये सीखने का मौका मिलता है कि हमको बड़ों की इज्जत करना चाहिए। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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