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समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना। दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी वह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं। फिर जहाँ देश, समाज या विश्व का प्रश्न है, तो कठिनाई का अनुपात असाधारण ही होगा।
प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तद्नुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठा उत्पन्न करनी पड़ती है। साधन जुटाने पड़ते हैं। इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है। इसी प्रकार कठिनाइयों से जूझने, अड़चनों को निरस्त करने और मार्ग रोककर बैठे हुए अवरोधों को किसी प्रकार हटाने के लिए समुचित साहस, शौर्य और सूझबूझ का परिचय देना पड़ता है। अनेक समस्याएँ और कठिनाइयाँ आये दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियाँ ही बनी रहती हैं, जो कठिनाइयों से जूझ सकता है और प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावान कहते हैं।
प्रतिभा की निजी जीवन के विकास में निरंतर आवश्यकता पड़ती है और अवरोधों को निरस्त करने में जो भी आगे बढे-उंचे उठे हैं, उन्हें उत्कर्ष की सूझबूझ और कठिनाइयों से लड़ सकने की हिम्मत जुटाने पड़े हैं। इन दोनों के बिना उन्नतिशील जीवन जी सकना संभव ही नहीं होता। फिर सामुदायिक सार्वजनिक क्षेत्र में सुव्यवस्था बनाने के लिए और भी अधिक प्रखरता चाहिए। यह विशाल क्षेत्र, आवश्यकताओं और गुत्थियों की दृष्टि से तो और भी बढ़ा-चढ़ा होता है। हीन वर्ग अपने साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। इनके उत्थान व पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं। ये परजीवी वर्ग ही मनुष्य में बहुलता के साथ पाया जाता है। अनुकरण और आश्रय ही उनके स्वभाव का अंग बनकर रहता है। निजी निर्धारण कदाचित ही कभी कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं। उनकी नीति अपने मतलब से मतलब रखने की होती है। कृपणता और कायरता के दबाव से वे पुण्य-परमार्थ की बात सोच ही नहीं पाते। अवसर मिलने पर अनुचित कर बैठने से भी नहीं चूकते, महत्व न मिलने पर वे अनर्थ कर बैठते हैं। वे जिस-तिस प्रकार जी तो लेते हैं, पर श्रेय सम्मान जैसी किसी मानवोचित्त उपलब्धि के साथ उनका कोई संबंध ही नहीं जुड़ता। उन्हें जनसंख्या का एक घटक भर माना जाता है। तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। ये भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बंधे रहते हैं। अपनी नाव अपने बलबूते खेते हैं और उसमें बिठाकर अन्य कितनों को ही पार करते हैं। बड़ी योजनाएं बनाते और चलाते हैं। कारखानों के व्यवस्थापक और शासनाध्यक्ष प्राय: इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं। जिनने महत्वपूर्ण सफलताएं पाई, उपलब्धियां हस्तगत कीं, प्रतिस्पर्धाएं जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझबूझ होती है। बोलचाल की भाषा में उन्हें ही प्रतिभावान कहते हैं। अपने वर्ग का नेतृत्व करते हुए गुत्थियां सुलझाते और सफलताओं का पथ प्रशस्त करते हैं। सबसे बडी उंची श्रेणी देवमानवों की है, जिन्हें महापुरूष भी कहते हैं। प्रतिभा तो उनमें भरपूर होती हैं, पर वे उसका उपयोग आत्म परिष्कार से लेकर लोकमंगल तक उच्च स्तरीय प्रयोजनों में लगाते हैं। निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं के बजाय अपनी शक्ति भण्डार को परमार्थ के कार्यों में लगाते हैं। किसी देश की सच्ची संपदा वे ही समझे जाते हैं। अपने कार्य क्षेत्र को नंदनवन जैसा सुवासित करते हैं, वे जहाँ भी बादलों की तरह बरसते हैं, वहीं मखमली हरीतिमा का फर्श बिछा देते हैं और वे वसंत की तरह अवतरित होते हैं। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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