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प्रसुप्त प्रतिभा को जागरण का अवसर मिले, इसके लिए आवश्यक है कि श्रेष्ठ चिंतन से अंतराल को और दुष्ट आचरण से काय कलेवर को बचाए रहने का प्रयत्न किया जाए। यह तभी बन पड़ेगा जब अवांछनीय महत्त्वाकाँक्षाओं की हथकड़ी- बेड़ी से हाथ पैर खुले रहें। लोगों की उत्कंठा धनाढ्य बनने में रहती है, ताकि विलासिता के साधन जुटाया जा सकें, साथ ही अभावग्रस्तों की बिरादरी में अपने को बढ़ा- चढ़ाकर सिद्ध करने की मुंछे मरोड़ी जा सकें। इतनी छोटी सीमा में जिनका अंतराल केंद्रीभूत होकर रह  गया हैं, वे उन महान् कार्यों के प्रति उन्मुख ही नहीं हो सकते, जो मानवीय गरिमा में चार चाँद लगाते हैं। खूँटे से बँधी हुई नाव चप्पू चलाते रहने पर भी आगे कहाँ बढ़ पाती  है। संकीर्ण स्वार्थपरता से ग्रसित व्यक्ति न तो आदर्शवादिता अपना सकता है और न ऐसा कुछ कर सकता है, जिसे उत्कृष्ट कहा जा सके। सज्जा की विडंबना रचकर तो कुरूप वेश्याएँ भी अपने को परी जैसी सुंदर दिखाने का भ्रम रचती रहती हैं। 
प्रतिभा कहीं बाहर से बटोरनी नहीं पड़ती, उसे सदा भीतर से ही उभारा जाता है। इसके लिए उन अवरोधों को हटाना अनिवार्य हैं, जो भारी चट्टान की तरह उत्कृष्टता के मार्ग में भयानक अवरोध बनकर अड़े होते हैं। इस संदर्भ में स्मरण रखने योग्य यह तथ्य है कि औसत भारतीय नागरिक स्तर का निर्वाह अंगीकार किया जाए, अन्यथा तृष्णा और वासना की लिप्सा इतनी सघनता के साथ छाई रहेगी कि अपनी सामर्थ्य की तुलना में अंकिचन जितना परमार्थ भी करने न बन पड़ेगा। यह खाइयाँ इतनी चौड़ी और इतनी गहरी है कि छोटे- से जीवन का समूचा साधन, श्रम, कौशल खपा देने पर भी उन्हें भरा नहीं जा सकता। फिर वह बन ही कैसे पड़े, जो उत्कृष्टता के साथ अति सघनतापूर्वक जुड़े हुए प्रतिभा- परिष्कार का पुण्य प्रयोजन संतोषजनक मात्रा में उपलब्ध करा सके। 
लालसाजन्य महत्त्वाकाँक्षाओं में कसौटी किए बिना किसी के पास भी इतना समय, श्रम, साधन बच नहीं सकता, जिसके सहारे आत्म कल्याण और लोक कल्याण की दिशा में कुछ कहने लायक कदम उठ सकें। साधु और ब्राह्मणों को भूसुर की, पृथ्वी के देवता की उपमा दी जाती रही है। वह इसलिए कि उसने संयम, अपरिग्रह, संतोष की राह अपनाई। अपने निजी बड़प्पन में जिनकी जितनी अभिरुचि होगी, वह उतना ही अपने को व्यस्त और अभावग्रस्त अनुभव करेगा। सदा यही कहता रहेगा कि अपनी समस्याओं से ही घिरा हुआ हूँ, जबकि वस्तुत: वास्तविक समस्याएँ मनुष्यों के सामने होती ही कितनी है? फिर यदि उन्हें व्यावहारिक बुद्धि द्वारा समझदारी के साथ सुलझाया जाए, तो इतनी सरलतापूर्वक सुलझ जाती हैं, मानो वे वस्तुत: थी ही नहीं। भ्रांतियों के कारण वे बढ़ी या लाद दी गई हैं। 
संयम- नियम के कितने ही अनुबंध हैं, जिनमें आहार- विहार की शुद्धि, सज्जनता, सद्भावना, श्रमशीलता, मितव्ययता, स्वच्छता, सहकारिता, अनुशासन, प्रियता आदि प्रमुख हैं। इनके विपरीत अनेक दोष हैं- असंयम, चटोरपन, आलस्य, प्रमाद, निष्ठुरता, स्वच्छंदता, अपव्यय, व्यसन आदि जो प्रगति में बाधक बनते हैं। यह सब देखने- सुनने में बहुत ही दुष्कर प्रतीत होते हैं, पर वस्तुत: हैं, संकीर्ण स्वार्थपरता और स्वेच्छाचार की पैदा की हुई औलाद ही। इनमें से एक- एक को गिनना और रोकथाम करना मेंढक़ तौलने के समान है। बिस्तर को धूप में डाल देने के उपरांत खटमल और उनके अंडे- बच्चे सभी मर जाते हैं। इसी प्रकार दृष्टिकोण को उदात्त बना लेने के उपरांत अपना स्वरूप, लक्ष्य और कर्तव्य तीनों ही सूझ पड़ते हैं। उस प्रकाश के जलते ही उन भूत- पलीतों से छुटकारा मिल जाता है, जो अंधेरे के कारण सामान्य होते हुए भी, डरावने बनकर भयभीत करते और त्रास देते थे। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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