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प्रस्तुत समय, जिससे हम गुजर रहे हैं- संधिकाल है। यह युगसंधि का समय न चूकने जैसा है। आपत्तिकाल में लोग व्यवसाय छोडक़र दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अग्निकांड, भूकंप, दूर्भिक्ष, महामारी दुर्घटना जैसे अवसरों पर उदार सेवा भावना की परीक्षा होती हैै। जिम्मेदार भावनाशील इस अवसर पर चूकते नहीं। उपेक्षा करने वाले तिरष्कृत जैसे होते और सेवा साधना में जुट पडऩे वाले सदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिकता, महानता की गहरी छाप छोड़ते हैं, जो कालान्तर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्त्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है। 
इतिहास साक्षी है कि आपत्तिकाल में राजपूत घरानों से एक- एक सदस्य सेना में भर्ती होता था। सिख धर्म जिन दिनों चला था, तब भी उस विपन्न वेला में उस प्रभाव क्षेत्र  में आए हर परिवार ने अपने परिवार में से एक को सिख सेना का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था। वर्तमान स्थिति की अपेक्षा तब कम विपन्न नहीं है। नवसृजन में संलग्न होने के लिए हर घर से एक प्रतिभा को आगे आना चाहिए और भारत भूमि की सतयुगी गरिमा को जीवंत रखने का श्रेय लेना चाहिए। इक्कीसवीं सदी  में सतयुग की वापसी वाली संभावनाएँ सुस्पष्ट है। कुछेक चिह्न पहले से ही प्रकट हो रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व उभर रहे हैं, जो लोक निर्वाह में कटौती करके अपनी भाव संवेदनाएँ, आकांक्षाएँ एवं गतिविधियों को सृजन प्रयोजनों में समर्पित कर सकें, जिससे उनका समर्पण अंधकार में जलते मशाल की भूमिका निभाते हुए सबकी आंखों में चमक पैदा कर सके। 
स्वर्ग मुुक्ति, दिव्य दर्शन आदि की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराश भी रहना पड़ सकता है। पर सत्य प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया आदर्शवादी साहस व्यक्तित्व को ऐसा प्रामाणिक प्रखर एवं प्रतिभावान बनाता है, जिसके उपार्जन की दैवी संपदा के रूप में आंका जा सके, जिस पर आज की भौतिक संपदाओं, सुविधाओं को  न्यौछावर किया जा सके। धनाढ्य और विद्वान कुछ लोगों पर ही अपनी धाक जमा पाते हैं, पर महामानव स्तर की प्रतिभाएं इतिहास को- समस्त मानव जाति को कृत- कृत्य करती हैं। 
प्रतिभाओं का प्रयोग जहां कहीं भी जब कभी औचित्य की दिशा में होता है, वहां उन्हें हर प्रकार से सम्मानित- पुरस्कृत किया गया है। अच्छे नम्बर लाने वाले छात्र पुरस्कार जीतते और छात्रवृत्ति के अधिकारी बनते हैं। सैनिकों में विशिष्टता प्रदर्शित करने वाले वीरता पदक पाते हैं। अधिकारी की पदोन्नति होती है। लोकनायकों के अभिनंदन किये जाते हैं। संसार उन्हें महामानव का सम्मान देता है तथा भगवान उन्हें हनुमान, अर्जुन जैसा अपना सघन आत्मीय वरण करता है। 
युग का निर्माण बड़ा काम है। उसका संबंध किसी व्यक्ति, क्षेत्र अथवा देश से नहीं, वरन् विश्वव्यापी समस्त मानव जाति के चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आमूल चूल परिवर्तन करने से है। पतनोन्मुख प्रवृत्तियां तो आंधी तूफान की दिशा में उछाल देना असाधारण दुस्साहस भरा प्रयत्न है। कैंसर के मरीज को रोग मुक्त करना और निरोग होने पर उसे पहलवान स्तर का समर्थ बनाना एक प्रकार से चमत्कारी कायाकल्प है। ऐसे उदाहरण सम्राट अशोक स्तर के अपवाद स्वरूप ही दीख पड़ते हैं। पर जब यही प्रक्रिया सार्वभौम बनानी होती हो, तो कितनी दुरूह होगी, इसका अनुमान वे ही लगा सकते हैं, जिन्हें असंभव को संभव करने का क्रम पूरा हो। जिन्हें कुछ करना न हो, उसकी समीक्षा तो बाल विनोद ही हो सकती है। 
दुस्साहस पर प्रतिभाएं उभरती हैं, विशेषतया जब वे सृजनात्मक हों। कटे हुए अंगों के घाव भरना उसमें दूसरे प्रत्यारोपण जोडक़र पूर्व स्थिति में लाना मुश्किल सर्जरी का ही काम है। युग की समस्याओं को सुलझाने के लिए अनौचित्य को निरस्त करने और सृजन का अभिनव उद्यान खड़ा करने के लिए ऐसे व्यक्तित्व चाहिए, जो परावलम्बन की हीनता से अंत:करण को भाव संवेदनाओं से ओतप्रोत कर सकें। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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