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कोई भी व्यक्ति जितना कुछ वैभव, उल्लास और साधन सम्पत्ति अर्जित करता है, वह उपार्जन एक ही मूल्य पर होता है। वह मूल्य है- शक्ति। जिसमें जितनी क्षमता है, जितनी शक्ति है, वह उतना ही वैभव और उल्लास अर्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति हो तो विभिन्न भोगों को भोगा जा सकता है और इन्द्रियाँ यदि अशक्त, असमर्थ हो जायें, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय लगते हैं। उनकी ओर देखने का भी जी नहीं करता। नाड़ी संस्थान की क्षमता यदि क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक प्रकार से नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति यदि घट जाय, तो मनुष्य की गणना विक्षिप्त व्यक्तियों में होने लगती है और विक्षिप्तों जैसी नहीं भी हो, तो वह ऐसी हरकतें करने लगता है कि उसकी स्थिति उपहासास्पद बन जाती है। धन की शक्ति में यदि कोई व्यक्ति, शून्य हो तो वह दीन- हीन बना रहता है। अभावग्रस्तता से उसकी स्थिति दयनीयों जैसी बनी रहती है और वह जीवन की सामान्य आवश्यकतायें भी भली प्रकार पूरी नहीं कर पाता। मित्रता को भी शक्ति कहा जा सकता है, जिसका स्वरूप सामाजिक होता है। यदि सच्चा मित्र शक्ति न रहे, तो व्यक्ति अपने आप को एकाकी अनुभव करने लगता है और जीवन निरर्थक- निरीह लगने लगता है। 
इन सभी शक्तियों में प्रधान है- आत्मबल। आत्मबल आध्यात्मिक पक्ष से संबंधित होने के कारण अन्य सभी शक्तियों से उच्च स्तर का समझा जाता है। यदि यह शक्ति पास में न रहे, तो मनुष्य प्रगति के पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिए प्राय: असंभव ही रहती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क्या आध्यात्मिक और क्या भौतिक, सभी क्षेत्रों में अभीष्ट सफलता प्राप्त करने के लिए शक्ति का संपादन नितांत आवश्यक है। शक्ति संपादन के संबंध में यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि इनका स्वरूप चाहे जो हो, स्रोत एक ही है। आभूषण चाहें कान के बने या गले का, सोना का ही उपयोग किया जाता है। पृथ्वी पर व्याप्त समस्त ऊष्माओं का केन्द्र सूर्य ही है, चाहे वह शरीर की गर्मी हो या आग की। भारतीय मनीषियों ने इसी प्रकार समस्त शक्तियों का स्रोत साधन एक ही माना है और उसे गायत्री नाम दिया है। भौतिक जगत में पंचभूतों को प्रभावित करने वाली जितनी भी शक्तियाँ हैं और आध्यात्मिक जगत में जितनी भी विचारात्मक, भावनात्मक तथा संकल्पनात्मक शक्तियाँ हैं, उन सब का मूल उद्गम एवं अजस्र भण्डार एक ही है, जिसे गायत्री नाम से संबोधित किया गया है। इस भण्डार  में शक्ति सागर में जितना भी गहरे उतरा जाय, उतना ही बहुमूल्य रत्न राशि उपलब्ध होने की संभावना बढ़ती चली जाती है। 
मनीषियों ने परब्रह्म परमात्मा की चेतना, प्रेरणा सक्रियता एवं समर्थता को गायत्री कहा है तथा इसे विश्व की सर्वोपरि शक्ति बताया है। विभिन्न देवशक्तियाँ जो अन्यान्य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं और विभिन्न देवनामों से पुकारी जाती हैं, इसी शक्ति के ज्योति स्फुलिंग है। वे समस्त शक्तियाँ उस परम शक्ति की ही किरणें हैं। उत्पादन, विकास एवं संहार में संलग्न ब्राह्मणी, वैष्णवी और शांभवी शक्तियों के प्रतीक प्रतिनिधि ब्रह्म, विष्णु, महेश परमब्रह्म की इसी सर्वोपरि शक्ति से अपना काम चलाते हैं और अभीष्ट कार्यों को पूरा करने के लिए शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। पंचतत्त्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ और अंतरिक्ष कहकर पुकारते हैं। उनकी शक्ति का स्रोत भी परमब्रह्म की वही चेतना है, जिसे गायत्री कहा गया है। 

 गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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