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मानव व सूर्य के आदि काल से ही महान् भावनात्मक संबंध रहे हैं। वैदिक वाङ्मय सूर्य के माहात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा है। सूर्य मानव के लिए प्राणदाता, जीवन रक्षक व सांस्कृतिक विकास का परिचायक है। 
संसार के हर तत्त्व की तरह सूर्य तत्त्व भी त्रिआयामी है। आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक ये उनके तीन आयाम हैं। वैज्ञानिकों ने सूर्य देव के भौतिक रूप से सम्पर्क कर प्रकाश, ऊर्जा एवं काल ज्ञान प्राप्त किया है। प्राचीन भारतीय विचारक मात्र पदार्थ विद्या के जानकार नहीं होते थे, अपितु देवतत्व तथा आत्म- तत्त्व के भी मर्मज्ञ होते थे। उनकी अभिव्यक्ति- प्रणाली एक साथ त्रिस्तरीय थी। स्वाभाविक है कि इसके लिए अनुपम मेधा की आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति वे गायत्री मंत्र के द्वारा करते थे। 
सूर्य का दैविक पक्ष कहीं, अधिक सशक्त और रहस्यमय है। इसकी उपासना से पवित्रता, प्रखरता, वर्चस्, तेजस् प्राप्त होता है। ब्रह्माण्ड के रहस्य जाने जा सकते हैं। लोक- लोकान्तरों के रहस्यों को प्रत्यक्ष किया जा सकता है। सिर्फ भौतिक विज्ञान द्वारा तीनों स्तरों का ज्ञान संभव नहीं होगा। आजकल का विज्ञान आधिभौतिक स्वरूप की ही खोजबीन में जुटा है। आधिदैविक रहस्य को समझने के लिए उपकरण भी आधिदैविक चाहिए। यह भौतिकी से संभव नहीं है। देवता किसी की प्रतिकृति नहीं, वरन् विशिष्ट  गुणों या शक्तियों के रूप में सूक्ष्म जगत् में क्रियाशील हैं। 
सूर्य व सविता के स्वरूप को वेद स्पष्ट करता है। सविता अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्डो  के सूर्यों में समान विराजमान, प्रेरक दिव्य शक्ति रूप परब्रह्म परमात्मा। ऋषि के अनुसार  का प्रत्येक सूर्य सविता है। ऋग्वेद के ‘ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव, यद्ïभद्रं तन्न आसुव’ मन्त्र में श्रेष्ठ विचारों को सूर्य के माध्यम से आमंत्रित किया गया है। सविता अमृत तत्त्व का स्रोत है। आदित्य देवताओं का मधु है। आदित्य का आधिभौतिक रूप हैै परमाणु, आधिदैविक रूप है- ग्यारह प्रमुख देवगणों में से एक आदित्य देव तथा आध्यात्मिक रूप है चेतना। आदित्य- सविता सर्वव्यापी ब्रह्म है। सूर्य जगत् की आत्मा है। यहाँ सूर्य शब्द से विश्व को प्रकाशित करने का व आकाश में उगने वाले सूरज से किसी को अर्थ नहीं लगाना चाहिए और न यह भ्रम पालना चाहिए कि यही विश्वात्मा है। जिस प्रकार शरीर व आत्मा का संबंध है, कुछ इसी प्रकार का संबंध सूर्य और सविता में है। 
सविता वह चेतन सत्ता है, जिससे सूर्य प्रकाशित होता है, जो स्वयं चेतना है। वही प्राण चेतना के रूप में अन्यत्र प्रगट हो सकता है। सविता में ही यह गुण है। यजुर्वेद में कहा गया है ‘ब्रह्म सूर्य समं ज्योति:’ अर्थात् ब्रह्म सूर्य ज्योति के समतुल्य है। जिस प्रकार भौतिक दिनमान संसार को प्रकाशित करता रहता है, उसी प्रकार चैतन्य सविता उसकी ज्योति से जगत् का समस्त जड़ चेतन, कण- कण, अणु- अणु समान रूप से प्रकाशित हो रहा है। यह सविता प्रकाश ही ब्रह्म है। 
मानवीय मन इतना चलायमान है कि उसे ईश्वर व एकाग्र करने के लिए दृश्य माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है। जिसने निराकार ब्रह्म को देखा नहीं, उसे साकार साधनों से काम चलाना पड़ता है। अत: जड़ सूर्य को ब्रह्म का मूर्तिमान प्रकाश मानकर सूर्य की ध्यान साधना का विधान किया गया है। इतने पर भी अंतिम लक्ष्य वह सर्वव्यापी तेजोमय ब्रह्म की उपलब्धि ही होता है। 
सूर्य को त्रयी विद्या कहा गया है तथा पापनाशक माना गया है। उसका भर्ग ब्रह्मतेज व पापनाशिनी शक्ति वाला है। इसलिए पापों से मुक्ति व सद्बुद्धि की याचना वाला गायत्री मंत्र सविता के ध्यान के साथ जपा जाता है। आद्य शंकराचार्य ने संध्या भाष्य में सूर्य माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा है कि चराचर जगत् के उत्पादक सूर्य की आराधना पापों का नाश करती है। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं। प्राचीनकाल में सर्वत्र सूर्योपासना के प्रमाण मिलते हैं। प्राचीनकाल की तरह वर्तमान में भी सूर्य की उपासना करके उनके त्रिस्तरीय आयामों से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए कहा गया है कि नित्य सूर्य का ध्यान करेंगे, अपनी प्रतिभा प्रखर करेंगे। 

 गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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