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शिव का अर्थ है ‘शुभ’। शंकर का अर्थ होता है, कल्याण करने वाले। निश्चित रूप से उसे प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को उनके अनुरूप ही बनना पड़ेगा। ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत् अर्थात् शिव बनकर ही शिव की पूजा करें। 
हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित शिव के स्वरूप की प्रलयंकारी रूद्र के रूप में स्तुति की गयी है। ऊँ नमस्ते रुद्र मन्यवऽउतो तऽइषवे नम: बाहुभ्यामुत ते नम:- यजुर्वेद (१६.१) शिव दुष्टों को रुलाने वाले रुद्र हैं तथा सृष्टि का संतुलन बनाने वाले संहारक शंकर है। 
शिव पुराण में शिव महिमा का गान इस प्रकार किया गया है- 
वंदे देव मुमापतिं सुरगुरुं वंदे जगत् कारणं। वंदे पन्नगभूषणं मृगधरं वंदे पशूनाम्पतिम्ï॥ वंदे सूर्य शशांक वह्निनयनं वंदे मुकुंदप्रियं। वंदे भक्त जनाश्रयं च वरदं वंदे शिवं शंकरम्॥ 
शंकर जी के ललाट पर स्थित चंद्र, शीतलता और संतुलन का प्रतीक है। विश्व कल्याण का प्रतीक और चन्द्रमा सुन्दरता का पर्याय है, जो सुनिश्चित ही शिवम् सेसुन्दरम् को चरितार्थ करता है। सिर पर बहती गंगा शिव के मस्तिष्क में अविरल प्रवाहित पवित्रता का प्रतीक है। आज विवेकहीन अदूरदर्शिता के कारण मानव दु:खी है। भगवान् शिव का तीसरा नेत्र विवेक का प्रतीक है। जिसके खुलते ही कामदेव नष्ट हुआ था अर्थात् विवेक से कामनाओं को विनष्ट करके ही शांति प्राप्त की जा सकती है। सर्पों  की माला दुष्टों को भी गले लगाने की क्षमता तथा कानों में बिच्छू, बर्र के कुण्डल अर्थात् कटु एवं कठोर शब्द को सुनने की सहनशीलता ही सच्चे साधक की पहचान है। मृगछाल निरर्थक वस्तुओं का सदुपयोग करना और मुण्डों की माला, जीवन की अंतिम अवस्था की वास्तविकता को दर्शाती है। भस्म लेपन, शरीर के अंतिम परिणति दर्शाती है। भगवान् शिव के अंतस् का वह तत्त्वज्ञान जो शरीर की नश्वरता और आत्मा अमरता की ओर संकेत करता है। 
शिव को नील कंठेश्वर कहते हैं। पुराणों में समुद्र मंथन की कथा आती है। समुद्र से नाना प्रकार के रत्न निकले। जिसको सभी देवताओं ने अपनी इच्छानुसार हथिया लिया। अमृत देवता पी गये, वारूणि राक्षस पी गये। समुद्र से जहर निकला। सारे देवी- देवता समुद्र तट से भाग खड़े हुए। जहर की भीषण ज्वालाओं से सारा विश्व जलने लगा, तब शिव आगे बढ़े और कालकूट प्रलयंकर बन गये और नीलकंठ देवाधिदेव महादेव कहलाने लगे। 
हमारे कुछ धार्मिक कहे जाने वाले व्यक्तियों ने शिव पूजा के साथ नशे की परिपाटी जोड़ रखी है। बड़ा आश्चर्य है, 
जो शिव- हमरे जान सदा शिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥ 
जैसा विराट् पवित्र व्यक्तित्व है, उसने पता नहीं नशा पत्ता कब किया होगा। भांग, धतूरा, चिलम गाँजा जैसे घातक नशे करना मानवता पर कलंक है, अत: शंकर भक्त को ऐसी बुराइयों से दूर रहकर शिव के चरणों में बिल्व पत्र ही समर्पित करना चाहिए। बेल के तीन पत्र हमारे लोभ, मोह, अहंकार को मिटाने में समर्थ है। शंकर जी हाथ में त्रिशूल इसलिए धारण किये रहते हैं, जिससे दु:खदायी इन तीन भूलों को सदैव याद रखा जाय। 
नशेबाजी एक धीमी आत्म हत्या है। इस व्यक्तिगत और सामाजिक बुराई से बचकर नशा निवारण के संकल्पों को उभारना ही शंकर की सच्ची आराधना है। शंकर के सच्चे वीरभद्र बनने की आवश्यकता है। वीरता अभद्र न हो, तो संसार के प्रत्येक व्यक्ति को न्याय मिल सकता है। 

गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज, हरिद्वार 


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