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मनुष्य का निर्माण ईश्वरीय नियम, संदेश सद्भावनाओं और श्रेष्ठ विवेक आदि के व्यापक प्रसार तथा सृष्टि में सत्य न्याय और प्रेम के स्थापना के लिये किया गया है। ईश्वर  को मनुष्य ही ऐसा प्राणी मिला, जिसके द्वारा अन्य प्राणियों द्वारा किया हुआ शक्ति का दुरुपयोग रोका जा सकता था। छल, झूठ, कपट, पाखण्ड, निष्ठुरता, स्वार्थ, कपट, शोषण अपहरण और बेईमानी का अन्त हो सकता था। उन्होंने मनुष्य को ऐसी दिव्य शक्तियाँ दीं, जिनके द्वारा सात्विक वृत्तियों की प्रतिष्ठापना हुई, असत्य का अन्त हुआ और धर्म की ध्वजा फहरी। सत्य समानता और सदाचार का व्यापक प्रसार कर मनुष्य ने सृष्टि को रहने योग्य बनाया है। मानवीय अन्तरात्मा की सात्विक वृत्तियों के प्रयोग से ही यह संसार रहने योग्य बना हुआ है। 
मनुष्य के अन्दर ईश्वर का जो केन्द्र है उसे हम ‘आत्मा’ कहते हैं। यह मनुष्य का शक्ति- केन्द्र है, जिसके द्वारा हमें ईश्वर के गुप्त संदेश निरन्तर मिला करते हैं। आत्मा के आदेश से मनुष्य योग्यतम और श्रेष्ठतम कर्तव्य की ओर चलता है, पुण्य- संचय करता है, अन्य प्राणियों से उच्च स्तर पर चढ़ता है। सद्गुणों को बढ़ाता है, आत्म- बल को विकसित करता है, बुद्धि को तीव्र करता है तथा विवेक को जागृत करता है। वास्तव में मनुष्य में अन्य जीवों से अधिक विकसित होने की जो क्रिया चल रही है, उसका प्रधान कारण आत्मा के गुप्त दैवी आदेश ही हैं। 
प्रकृति- वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘योग्यतम का चुनाव’ ही प्रकृति का नियम है। दूसरे शब्दों में प्रकृति स्वयं अच्छे- बुरे, बलवान और निर्बल, योग्य और अयोग्य का चुनाव प्रतिपल, प्रतिक्षण करती रहती है। जो निर्बल और अयोग्य हैं, वे स्वत: नष्टï हो जाते हैं। प्रकृति उन्हें नहीं रखना चाहती है। उसके दरबार में अयोग्य की सजा मौत है। यह बलवान और योग्यतम जीवों को ही जीवित रहने देती है। एक बलवान के लिये वह असंख्य शक्तिहीनों को नष्ट कर देती है। आँधी, ओले तूफानों में कमजोर प्राणी बीमारी, युद्ध, गरीबी में पिसकर समाप्त हो जाते हैं। बड़ी मछलियों की रक्षा के लिये अनेक छोटी मछलियों को उनका ग्रास बनना पड़ता है, वृक्षों को पूरी खुराक देने के लिये छोटे- छोटे पौधों को नष्ट होना पड़ता है। एक पशु को पालने के लिये अनेक छोटे- छोटे कीट- पतंग, घास के तृणों का अन्त हो जाता है। यह ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’निर्बल के लिये नहीं, सबल और सामर्थ्यवान के लिये ही है और मनुष्य वह पूर्ण विकसित प्राणी है, जो संसार के असंख्य पशु- पक्षियों पर राज्य कर रहा है। उसके शरीर से  कई गुने बड़े शरीर वाले प्राणी हैं, जो बात की बात में उसे मसल सकते हैं। परन्तु नहीं ऐसा नहीं होता। मनुष्य अपने बुद्धि- वैभव और बौद्धिक, मानसिक शक्ति से सबको परास्त कर देता है। ईश्वर का वरद हस्त सदा उसके साथ है। हमारा वह शक्तिशाली पिता, गुप्तरूप से शक्ति का स्रोत हमारे पीछे है, तब हम भला कैसे अशक्त, असहाय और अयोग्य बने रह सकते हैं? हम सब जीवों के सिरमौर हैं। सब निम्नतर जीवों के स्वामी है। हम स्रष्टा हैं। शुचि हैं। हम निर्विकार हैं। हमारे कण- कण में ईश्वरीय शक्ति का निवास है। हमें आत्मशक्ति से सर्वत्र राज्य करना है। 
मनुष्यों! तुम सर्वश्रेष्ठ प्राणी हो। तुम्हारी शक्तियों का पाराबार नहीं। जिन अचूक ब्रह्मस्त्रों को लेकर इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हो, उनके मुकाबले में अन्य कोई कदापि नहीं ठहर सकता। सम्राटों के सम्राट परमात्मा के युवराज हो। तुम्हें ऐसे- ऐसे दिव्य गुणों से विभूषित किया गया है कि दूसरा कोई जीव तुम्हारे मुकाबले में न आ सके। तुम्हें अपनी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक सम्पदाओं से युक्त होनाा चाहिये। अनन्त, अखण्ड, सुख- शान्ति का भागी बनना चाहिए। 
  
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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