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प्रकृति का प्रपंच, जिसमें आम आदमी बेतरह उलझा, उद्विग्न, खिन्न, विपन्न होते देखा जाता है। कभी- कभी तो इसे सिनेमा के पर्दे से प्रभावित होकर चित्र- विचित्र अनुभूतियों में तन्मय होते तक देखा जाता है। यद्यपि यह पूरा कमाल कैमरों का, प्रोजेक्टर का, एक्टर- डायरेक्टर का रचा हुआ जाल- जंजाल भर होता है, पर दर्शक तो दर्शक जो ठहरे, उन्हें पर्दे में रेंगती छाया भी वास्तविक दीखती है और इतने भर से आँसू बहाते, मुस्कराते, आक्रोश व्यक्त करते और आवेश मे आते तक देखे गए हैं। ऐसे विचित्र हैं यह कौतुक- कौतूहल, जिसने समझदार कहे जाने वाले मनुष्यों को भी अपने साथ बेतरह जकड़- पकड़ रखा है। इस दिवा स्वप्न का पता तब चलता है, जब आँखे खुलती हैं, नशे की खुमारी उतरती है और भगवान के दरबार में पहुँचकर सौंपे गए कार्य के संबंध में पूछताछ की बारी आती है। इससे पूर्व यह पता ही नहीं चलता कि कितना गहरा भटकाव सिर पर हावी रहा और वह कराता रहा, जिसे करने के लिए उन्माद ग्रस्तों के अतिरिक्त और कोई कदाचित ही तैयार हो सकता है। यही वह भूल- भुलैयों का भटकाव है, जिसे तत्त्वदर्शी प्राय: मायाजाल कहते और उससे बचने की सलाह देते हैं। पर उस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय, जो मूर्खता छोड़ने और बुद्धिमत्ता अपनाने की समझ को उगने- उठने ही नहीं देता? सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन की दु:ख भरी बर्बादी की यह पृष्ठभूमि है। आश्चर्य यह है कि शिक्षित, अशिक्षित, समझदार, नासमझ सभी अंधी भेड़ों की तरह एक के पीछे एक चलते हुए गहरे गर्त में गिरते और दुर्घटनाग्रस्त स्थिति में कराहते- कलपते अपना दम तोड़ते हैं। 
जरा समझदारी और समझदारों की तरह सोचना आरंभ करें। मनुष्य जीवन, स्रष्टा की बहुमूल्य धरोहर है, जो स्वयं को सुसंस्कृत और दूसरों को समुन्नत करने के दो प्रयोजनों के लिए सौंपा गया है। इसके लिए अपनी योजना अलग बनानी और अपनी दुनिया अलग बसानी पड़ेगी। मकड़ी अपने लिए अपना जाल स्वयं बुनती है। जब उसे बंधन समझती है, तो रोती- कलपती भी है। किन्तु जब वस्तु स्थिति की अनुभूति होती है, तो समूचा मकड़ जाल समेटकर निगल जाती है और वह सोचती है कि सारे बंधन कट गए। 
ठीक इसी तरह हर मनुष्य अपने लिए, अपने स्तर की दुनिया, अपने हाथो आप रचता है। उस घोंसले में वह अपनी जिन्दगी बिताता है। उसमें किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं है। दुनिया की अड़चने और सुविधाएँ तो धूप- छाँव की तरह होती है। उनकी उपेक्षा करते हुए कोई भी राहगीर, अपने अभीष्ट पथ पर निरंतर चलता रह सकता  है। किसी में इतनी हिम्मत नहीं, जो बढऩे वाले के पैर में बेड़ी डाल सकें। भले या बुरे स्तर के आश्चर्यजनक काम कर गुजरने वालों में से प्रत्येक की कथा इसी प्रकार की है।   
मनुष्य बना ही उस वस्तु का है, जिसकी संकल्प भरी साहसिकता के आगे कभी भी कोई अवरोध टिक नहीं सका है और कभी टिक ही सकेगा। इस उक्ति में परिपूर्ण सार्थकता है कि ‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।’ वही अपने हाथों गिरने के लिए खाई खोदता है और चाहे तो उठने के लिए समतल सीढिय़ों वाली मीनार भी चुन सकता है। जिनमें उठने और महानता की मंजिल तक जा पहुँचने की शक्ति है, वे प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल सकने में भी समर्थ होते हैं। उठने में सहायता करने का श्रेय किसी को भी दिया जा सकता है और गिरने- गिराने दोषारोपण भी किसी पर भी किया जा सकता है। पर वस्तुस्थिति यह है कि यदि अपने ही व्यक्तित्व और कर्तव्य को ऊँचा उठाने और गिराने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाय, तो यह मान्यता सबसे अधिक सही होगी। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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