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कुरूपता एक मानसिक रोग है, सुंदरता अच्छे स्वभाव का परिणाम है। स्वास्थ्य और सुंदरता का गहरा संबन्ध है। सुंदरता अच्छे स्वास्थ्य, निश्चिन्त जीवन, हर्ष और उल्लास में छिपी है। इसके अलावा सुंदरता को देर तक स्थिर रखने के लिए मधुर और स्वस्थ मानसिक भावों की भी अतीव आवश्यकता है। जिन व्यक्तियों का मन घरेलू या सामाजिक कलह या विवादों में उलझा रहता है, गुप्त मन में कोई न कोई चिंता या उत्तेजना बनी रहती है, उनके चेहरे पर कर्कशता, क्रोध, आवेश या तनाव छाया रहता है। आन्तरिक दुर्गुणों से कुरूपता उत्पन्न होती है। 
हमारे देवताओं और महापुरुषों के चेहरे के सौन्दर्य का कारण उनके मन में छिपा हुआ है। उनके चेहरे की सरलता, सरसता, हल्की मुस्कान पर मानव मन और उनका जीवन बार- बार निछावर होने लगता है। कितना सुंदर, सुखदायक और आंखों को प्रिय लगता है उनका यह मुखमण्डल। यह उनके ह्दय की सुंदरता को प्रकट करता है। हम सबका मुखमण्डल आंतरिक सदगुणों से आकर्षक बनता है। शील और सदगुणों का प्रकाश चारों ओर फैलता है। प्रेम, दया, सज्जनता,ईमानदारी, भलाई आदि में गजब का आकर्षण है। 
अच्छे भावों का अभिनय कीजिए। मुख पर प्रसन्नता, प्रेम, दया और कोमलता प्रदर्शित कीजिए। वैसे ही भावों की गुप्त तरंगें आपके शरीर में सर्वत्र दौड़ जाएंगी। आत्मा प्रसन्न हो जाएगी और मृुखमुद्रा मोहक बन जावेगी। एक विद्वान लिखते हैं, ‘अच्छे और बुरे विचारों की धारा मानसिक केन्द्र से चारों ओर बिखरकर खून के प्रवाह के साथ चमड़ी की सतह तक एक विद्युत धारा के समान आती और वहां अपना प्रभाव छोड़ जाती है। यदि यह मानसिक विचारधारा निरंतर बनी रहे तो उसका प्रभाव भी स्थायी रह जाता है। दुख का विषय है कि हम केवल अपनी मानसिक दुर्भावनाओं के कारण अपनी मोहनी शक्ति खो देते हैं। 
आजकल सौन्दर्य प्रसाधनों पर करोड़ों रुपए प्रतिदिन व्यय किए जा रहे हैं। बड़ी फैक्ट्रियों पर कृत्रिम सौन्दर्य बढ़ाने के साधन और वस्तुएं बन रही हैं। बाजार में सौन्दर्य प्रसाधनों का बाजार जोरों से चल रहा है। बदसूरत व्यक्ति भी इन साधनों के जरिए खूबसूरत बनना चाहता है, पर इससे वास्तविक सौन्दर्य नहीं बढ़ता। यह उत्तम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर है। 
सुखद और सुन्दर विचारों को मन में रख और उनको चेहरे पर प्रदर्शन कर हम निश्चय ही अधिक आकर्षक बन सकते हैं। आप इस क्रिया का अभ्यास करें। मन एक शक्ति केन्द्र है। उसका समूचे शरीर पर राज्य है। मन में दुख और चिंताएं जमी रहेंगी, तो निश्चय ही वे कुरुपता उत्पन्न करेंगी। हमारा स्वास्थ्य और सौन्दर्य और नष्ट कर देंगी। इसलिए हमारे यहां कल्याणकारी भावों का मन में धारण करने की प्रार्थना की गई है- 
‘हे मन की मौज! तू कल्याणकारी स्वरुप को धारण करके हमारे भीतर प्रवेश कर, ताकि जो कुछ तू चाहे, वह पूरा हो और बुरे विचारों को दूर रख।’ सदा प्रसन्नता और आनन्द के भव्य विचारों में ही रमण कीजिए। जब आत्मा प्रसन्न रहती है तो शरीर भी स्वस्थ और सुंदर रहता है। 
एक मनोविज्ञानवेत्ता कहते हैं- ‘‘प्रसन्नता शक्ति की परिचायिका है। जिस मनुष्य के अंदर आध्यात्मिक शक्ति है, वही प्रसन्न रह सकता है। प्रसन्नता स्वयं उस शक्ति की  उत्पादिका भी है। जो मनुष्य जितना प्रसन्न रहता है, वह अपना आध्यात्मिक बल उतना ही बढ़ा लेता है। मन प्रसन्न रहने पर शरीर की अमृत पैदा करने वाली ग्रन्थियां अपना काम भली प्रकार से करती हैं और शरीर में उन पदार्थों का प्रवाह जारी रखती हैं, जिनसे शरीर अक्षय बना रहता है और बढ़ता है।’’ 
इसलिए अधिक से अधिक आनन्द और प्रसन्नता के सुखद विचारों में निवास कीजिए और सुंदर बनिए। आत्मा की सौन्दर्यता में अक्षय सौन्दर्य निहित है। भव्य विचारों  से सुंदर बनिए।

गायत्री तीर्थ, शांतिकुन्ज हरिद्वार 


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