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आदर्श व्यक्तित्व ही किसी देश या समाज की सच्ची सम्पत्ति माने जाते हैं। जमीन में गढ़े धन की चौकसी करने वाले साँपों की तरह तिजोरी में जमा नोटों की रखवाली करने वाले कंजूस तो गली- कूँचों में भरे पड़े हैं। ऐसे लोगों से कोई प्रगति की आशा नहीं की जा सकती। प्रगति के एकमात्र उपकरण प्रतिभाशाली- चरित्रवान व्यक्तित्व ही होते हैं। हमें युग- निर्माण के लिए ऐसी ही आत्माएँ चाहिए। इनके अभाव में अन्य सब सुविधा- साधन होते हुए भी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में तनिक भी प्रगति न हो सकेगी। 
मानव अन्त:करण एवं परिस्थितियाँ को बदलने के लिए लोक- शिक्षण तो आवश्यक है ही, पर साथ ही यह और भी आवश्यक है कि लोक- शिक्षण का आधार व्यक्तिगत जीवन एवं परिवार को आदर्शवादी साँचे में ढाला जाए। अध्यात्म पूजा- पाठ की, कहने- सुनने की वस्तु न रहे वरन् उसे दैनिक जीवन में, नियमित व्यवहार में उतारने को एक अनिवार्य आवश्यकता माना जाए। 
आज कीर्तन, कथा, रामायण, यज्ञ आदि के उत्सव समारोह आये दिन होते रहते हैं। रामलीला जगह- जगह होती हैं, उसमें भी भगवान राम के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देना ही उद्देश्य रहता है। गंगा- स्नान के मेले, कुम्भ आदि पर्व, चारों धामों, तीर्थ आदि में भी ऐसा ही वातावरण बनता है जिसमें यदि मनुष्य चाहे तो बहुत कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। पत्र- पत्रिकाओं में कर्त्वयबोधक लेख बहुत छपते रहते हैं। गीता, रामायण जैसी प्रधान धर्म पुस्तकों की प्रतियाँ लाखों की संख्या में हर साल छपती हैं और लोगों द्वारा खरीदी एवं पढ़ी जाती हैं। 
इन बातों को लोग पढ़ते- सुनते न हों सो बात भी नहीं है, पर देखा यह जाता है कि चिकने घड़े की तरह लोग उससे मनोरंजन मात्र कर लेते हैं, उसे जीवन में उतारने के लिए एक कदम भी बढ़ाने को तैयार नहीं होते। और तो और, धर्म एवं आध्यात्मिकता के प्रवचन कर्ता और लेखक भी अपनी कथनी की अपेक्षा करनी से बहुत पिछड़े रहते हैं। कई बार तो उनका आचरण बिल्कुल उल्टा देखा जाता है। 
व्यक्ति में मूलत: वे तत्व भी होने चाहिए, जिनमें सद्ज्ञान को ग्रहण करने की शक्ति और आदर्श को जीवन में उतारने की साहसपूर्ण सामर्थ्य भी विद्यमान हो। आज धर्म शिक्षा देने वाले लेखक- वक्ता तो बहुत हैं पर उनके पास, कबीर, गुरु गोविन्द सिंह, रामदास, बुद्ध, महावीर, गाँधी जैसा व्यक्तित्व नहीं है। वाणी की शक्ति तो स्वल्प है, प्रभाव वस्तुत: चरित्र का पड़ता है। 
तेजस्वी व्यक्तित्वों के निर्माण के लिए माता- पिता को तप करना होता है। प्राचीनकाल के इतिहास- पुराणों को पढऩे से स्पष्ट होता है कि महापुरुषों को जन्म देने वाले माता- पिताओं ने दीर्घ काल तक अनेक जन्मों तक तप किये थे। उस तप से शरीर और मनों को, रज- वीर्य को ऐसा सुसंस्कारी बनाया था कि उससे तेजस्वी आत्माओं का प्रजनन संभव हो सके। उन बालकों का पालन- पोषण भी उपयुक्त वातावरण में हो सके, ऐसी व्यवस्था करनी होती है तथा शिक्षा- दीक्षा के लिए भी ऐसा प्रबन्ध करना होता है कि जहाँ केवल साक्षरता ही नहीं, वरन् चरित्र तथा व्यक्तित्व का भी विकास हो सके। सुसंस्कृत तथा श्रेष्ठ व्यक्तित्वों के निर्माण का यही मार्ग है। मनस्वी और तपस्वी मनुष्यों का समाज जितना बढ़ता जाएगा, उतना ही इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। उज्ज्वल चरित्र के व्यक्तियों से ही सभ्य- समाज की भव्य- रचना सम्भव होगी। 
  
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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